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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

११० वात्स्यायन-कामसूत्र
पशुपालनचिन्तावाहनविधानयोगाः। मेषकुक्कुटलावकशुकशारिकापरभृतमयूर-
वानरमृगाणामवेक्षणम्। दैवसिकायव्ययपिण्डीकरणमिति च विद्यात् ॥ ३३ ॥
व्यवस्थाविषयक निर्देश— भोजन से बचे गोरस (दही, मक्खन) से घी, ईख (गन्ना)
से गुड़ एवं सरसों आदि से तेल निकालना, कपास से सूत कातना और सूत से कपड़ा बुनवाना,
छींके, रस्सी, फन्दे एवं वल्कल आदि सहेजकर रखना, दासियों द्वारा अनाजों एवं दालों को
छड़ते, फटकते, दलते एवं कूटते समय ध्यान रखना, भात (चावल) का माँड़, धान की भूसी,
चावल की किनकी, पशुओं का अवशिष्ट चारा (कुट्टी) और जले हुए कोयलों का पुनः उपयोग
करना, नौकरों के वेतन एवं भोजन का ध्यान रखना, कृषि एवं पशुपालन की चिन्ता करना,
गाड़ी, रथ आदि वाहनों की व्यवस्था (रखरखाव) करना; भेड़, मुर्गा, लवा, तोता, मैना, कोयल,
मोर, बन्दर, मृग आदि पालतू पशु-पक्षियों की देखभाल और दिनभर के आय-व्यय का लेखा-
जोखा रखना—इन बातों का भार्या को सदैव ध्यान रखना चाहिये ॥ ३३ ॥
तज्जघन्यानां च जीर्णवाससां सञ्चयस्तैर्विविधरागैः शुद्धैर्वा कृतकर्मणां
परिचारकाणामनुग्रहो मानार्थेषु च दानमन्यत्र वोपयोगः ॥ ३४ ॥
पुरातन वस्त्रों का उपयोग— पति के पुराने वस्त्रों को एकत्र कर धुलवा दे। उनमें जो
रँगने योग्य हों, उन्हें रंगवा दे और अच्छा काम करने वाले नौकरों को देकर अपना अनुग्रह
(कृपा) एवं सम्मान प्रकट करे। जो वस्त्र अधिक जर्जर हों, देने योग्य न हों, उन्हें दूसरे कामों
में प्रयोग करे ॥ ३४ ॥
सुराकुम्भीनामासवकुम्भीनां च स्थापनं तदुपयोगः क्रयविक्रयावायव्यया-
ववेक्षणम् ॥ ३५ ॥
पेय की व्यवस्था—सुरा और आसव के घड़ों (पात्रों) को छिपाकर रखना और समय
पर उनका उपयोग करना, आवश्यकतानुसार उनका क्रय-विक्रय और उससे प्राप्त हानि-लाभ
को देखना भी भार्या का दायित्व है ॥ ३५ ॥
नायकमित्राणां च स्त्रगनुलेपनताम्बूलदानैः पूजनं न्यायतः ॥ ३६ ॥
पति के मित्रों से व्यवहार— पति के मित्रों का पुष्पमाला, चन्दन, ताम्बूल आदि से
समुचित स्वागत-सत्कार करना चाहिये ॥ ३६ ॥
श्वश्रूश्वशुरपरिचर्या तत्पारतन्त्र्यमनुत्तरवादिता परिमिताप्रचण्डालापकरण-
मनुच्चैर्हासः तत्प्रियाप्रियेषु स्वप्रियाप्रियेष्विव वृत्तिः ॥ ३७ ॥
सास-ससुर से व्यवहार— सास-ससुर की सेवा करना, उनकी आज्ञा मानना, उन्हें
पलटकर उत्तर न देना, उनके समक्ष शान्तभाव से सीमित बोलना और धीरे से हंसना चाहिये।
उनके प्रिय व्यक्तियों के साथ प्रिय और अप्रिय व्यक्तियों के साथ अप्रिय व्यवहार करना
चाहिये ॥ ३० ॥
भोगेष्वनुत्सेकः ॥ ३८ ॥
सुखभोगों के विषय में कदापि अभिमान नहीं करना चाहिये ॥ ३८ ॥
परिजने दाक्षिण्यम् ॥ ३९ ॥