सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 127

३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण १०१
प्रायेण धनिनां दारा बहवो निरवग्रहाः ।
बाह्ये सत्युपभोगेऽपि निर्विस्त्रम्भा बहिःसुखाः ॥ ५२ ॥
धनवान् की पत्नी बनने में दोष—धनवानों के घरों में प्रायः अनेक पत्नियाँ होती हैं,
किन्तु वे प्रायः सभी स्वच्छन्द हुआ करती हैं; क्योंकि उन्हें भौतिक सुखों के साधन (भवन,
वाहन, वस्त्राभूषण आदि) तो प्राप्त होते हैं, लेकिन सुरतरूप आन्तरिक सुख प्राप्त नहीं
होता ॥ ५२ ॥
नीचो यस्त्वभियुञ्जीत पुरुषः पलितोऽपि वा।
विदेशगतिशीलश्च न स संयोगमर्हति ॥ ५३ ॥
नीच, वृद्ध और प्रवासी वरणीय नहीं—यदि नीच जाति या अधम स्वभाववाला
व्यक्ति, वृद्ध व्यक्ति या निरन्तर प्रवास में रहने वाला व्यक्ति भी विवाह के लिये आमन्त्रित करे तो
उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसे व्यक्ति ही सम्प्रयोग के योग्य नहीं होते ॥ ५३ ॥
यदृच्छयाभियुक्तो यो दम्भद्यूताधिकोऽपि वा।
सपत्नीकश्च सापत्यो न स संयोगमर्हति ॥ ५४ ॥
बलात्कारी, कपटी, जुआरी वरणीय नहीं—जो स्त्री की इच्छा न होने पर भी केवल
अपनी इच्छा से सम्भोग करता है, जो कपटी और जुआरी है, और जो पत्नी और बच्चों वाला
है, उससे कदापि विवाह नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसा व्यक्ति सम्प्रयोग के योग्य नहीं
होता ॥ ५४ ॥
गुणसाम्येऽभियोक्तृणामेको वरयिता वरः।
तत्राभियोक्तरि श्रैष्ठ्यमनुरागात्मको हि सः ॥ ५५ ॥
अवरणीयों में अनुरागशील ही उत्तम—यदि कन्या को प्राप्त करने का प्रयास करने
वाले कई व्यक्ति हों, तो कन्या उसी का वरण करे जो उससे सच्चा अनुराग रखता हो। प्रयास
करने वालों में निश्छल अनुराग रखने वाला ही श्रेष्ठ होता है ॥ ५५ ॥
एकपुरुषाभियोगादि प्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न ॥
पञ्चम अध्याय
विवाहयोगप्रकरण
प्राचुर्येण कन्याया विविक्तदर्शनस्यालाभे धात्रेयिकां प्रियहिताभ्यामुपगृह्योप-
सर्पेत् ॥ १ ॥
कन्यासिद्धि की विधि—यदि कन्या का एकान्त में अधिक दर्शन सम्भव न हो, तो धाय
की पुत्री या उसकी सखी को प्रिय और हितकर कार्यों द्वारा उपकृत करके उसके समीप
भेजे ॥ १ ॥