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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 248 में से

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पृष्ठ 130

१०४ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोभ देकर और मध्यस्थ बनाकर, किसी बहाने से उसके साथ नायिका को निर्धारित स्थान पर
बुलाये ॥ १९ ॥
ततः श्रोत्रियागारादग्निमिति समानं पूर्वेण ॥ २० ॥
तत्पश्चात् किसी वेदपाठी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अग्नि मँगाकर पूर्वोक्त रीति से
विवाह कर ले ॥ २० ॥
आसन्ने च विवाहे मातरमस्यास्तदभिमतदोषैरनुशयं ग्राहयेत् ॥ २१ ॥
माता की सहमति से गुप्त विवाह—यदि नायिका का सम्बन्ध कहीं निश्चित हो गया हो,
तो विवाह-तिथि के निकट आने पर निश्चित वर के दुर्गुणों का वर्णन कर, कन्या की माता के मन
मस्तिष्क को विकृत कर दे, और जब वह उस वर को अपनी पुत्री देने को मना कर दे, तो नायक
की प्रशंसा करके उसके लिए तैयार कर ले ॥ २१ ॥
ततस्तदनुमतेन प्रातिवेश्याभवने निशि नायकमानीय श्रोत्रियागारादग्निमिति
समानं पूर्वेण ॥ २२ ॥
इसके पश्चात् उसकी माता की अनुमति से, पड़ोसी के घर पर, रात्रि के समय नायक को
बुलाकर और वेदपाठी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अग्नि लाकर पूर्ववत् विवाह कर ले ॥ २२ ॥
भ्रातरमस्या वा समानवयसं वेश्यासु परस्त्रीषु वा प्रसक्तमसुकरेण
साहाय्यदानेन प्रियोपग्रहैश्च सुदीर्घकालमनुरञ्जयेत् । अन्ते च स्वाभिप्रायं
ग्राहयेत् ॥ २३ ॥
भाई की सहमति से विवाह—वेश्या या परस्त्री पर पूर्णतः आसक्त, समान अवस्था वाले
कन्या के भाई को दुर्लभ सहायता और प्रिय उपहारों से दीर्घकाल तक आकृष्ट और अनुरक्त करे
और अन्त में अपना अभिप्राय प्रकट कर दे ॥ २३ ॥
प्रायेण हि युवानः समानशीलव्यसनवयसां वयस्यानामर्थे जीवितमपि
त्यजन्ति। ततस्तेनैवान्यकार्यात् तामानाययेत्। विषह्यं सावकाशमिति समानं
पूर्वेण ॥ २४ ॥
यह सुनिश्चित तथ्य है कि प्रायः युवक समान शील, व्यसन और अवस्था वाले युवकों के
लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर डालते हैं। अतएव भाई को ही माध्यम बनाकर किसी बहाने
से नायिका को बुला ले और किसी निरापद स्थान पर पूर्ववत् अग्नि की साक्षी में विवाह कर
ले ॥ २४ ॥
अष्टमीचन्द्रिकादिषु च धात्रेयिका मदनीयमेनां पाययित्वा किञ्चिदात्मनः
कार्यमुद्दिश्य नायकस्य विषह्यं देशमानयेत्। तत्रैनां मदात् संज्ञामप्रतिपद्यमानां
दूषयित्वेति समानं पूर्वेण ॥ २५ ॥
पैशाचविवाह—अष्टमी, चन्द्रिका आदि उत्सवों पर धाय की पुत्री या सखी नायिका को
मदिरा आदि पिलाकर, अपने किसी कार्य के बहाने निरापद स्थान पर ले आये। वहाँ मदिरापान
के कारण स्थिति न समझ पाने वाली नायिका को नायक से दूषित कराकर उसके बन्धु-बान्धवों
से प्रकट कर दिया जाये ॥ २५ ॥