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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 248 में से

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पृष्ठ 120

९४ वात्स्यायन-कामसूत्र
तन्मित्रेषु विश्वसिति। वचनं चैषां बहु मन्यते करोति च। तत्परिचारकैः सह
प्रीतिं सङ्कथां द्यूतमिति च करोति। स्वकर्मसु च प्रभविष्णुरिवैतान्नियुङ्क्ते। तेषु च
नायकसङ्कथामन्यस्य कथयत्स्ववहिता तां शृणोति ॥ २९ ॥
नायक के सहचरों एवं अनुचरों के साथ व्यवहार—नायक के मित्रों पर विश्वास
करती है। उनकी बातों का समादर करती है और तदनुकूल ही व्यवहार करती है। उसके नौकरों
के साथ प्रीतिपूर्ण वार्तालाप करती है और उनके साथ ताश, शतरंज आदि खेलती है। उसके
नौकरों को स्वामी के समान आदेश देती है। यदि वे नायकविषयक बातें करते हैं तो उन्हें
एकाग्रचित्त होकर सुनती है ॥ २९ ॥
धात्रेयिकया चोदिता नायकस्योदवसितं प्रविशति। तामन्तरा कृत्वा तेन सह
द्यूतं क्रीडामालापं चायोजयितुमिच्छति। अनलङ्कृता दर्शनपथं परिहरति।
कर्णपत्रमङ्गुलीयकं स्रजं वा तेन याचिता सधीरमेव गात्रादवतार्य सख्या हस्ते
ददाति। तेन च दत्तं नित्यं धारयति। अन्यवरसङ्कथासु विषण्णा भवति। तत्पक्षकैश्च
सह न संसृज्यत इति ॥ ३० ॥
नायक से सम्पर्क की वाञ्छा—धाय की पुत्री या सखी कहने पर नायक के घर चली
जाती है। उस सखी को माध्यम बनाकर नायक के साथ द्यूत, खेल, वार्तालाप आदि करना
चाहती है। नायक के सामने विना श्रृंगार किये नहीं आती। यदि वह कर्णफूल, अँगूठी या माला
माँगता है, तो गम्भीरतापूर्वक शरीर से उतारकर सखी के हाथ पर रख देती है। नायक द्वारा दी
गयी अँगूठी, माला आदि वस्तुओं को नित्य धारण करती है। दूसरे नायकों की कथा से विमुख
हो जाती है और उनके पक्ष वालों के साथ संसर्ग नहीं करती ॥ ३० ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
दृष्टैतान् भावसंयुक्तानाकारानिङ्गितानि च।
कन्यायाः सम्प्रयोगार्थं ताँस्तान् योगान्विचिन्तयेत् ॥ ३१ ॥
उपसंहार—इस प्रकार कन्या के भावसंयुक्त सङ्केतों और चेष्टाओं को देखकर ही, उसके
साथ समागम के लिये समुचित उपायों को प्रयोग में लाना चाहिये ॥ ३१ ॥
बालक्रीडनकैर्बाला कलाभिर्यौवने स्थिता।
वत्सला चापि संग्राह्या विश्वास्यजनसंग्रहात् ॥ ३२ ॥
बाला नायिकाओं को बालक्रीड़ा से, तरुणी को कामकलाओं से और प्रौढ़ा को उसकी
विश्वस्त सखियों से सम्पर्क करके वश में किया जा सकता है ॥ ३२ ॥
बालोपक्रम एवं इंगिताकारसूचन नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥