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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 248 में से

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पृष्ठ 123

३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९७
गृह-आमन्त्रण—नायिका को इच्छुक जान लेने के पश्चात् सिरदर्द आदि का बहाना
करके वार्तालाप के लिये उसे अपने घर पर बुलवाये ॥ २२ ॥
आगतायाश्च शिरःपीडने नियोगः। पाणिमवलम्ब्य चास्याः साकारं नयन-
योर्ललाटे च निदध्यात् ॥ २३ ॥
आयी हुई नायिका को सिर दबाने में लगा दे। उसका हाथ अपने हाथों में पकड़कर अपने
मस्तक और नेत्रों से लगाये ॥ २३ ॥
औषधापदेशार्थं चास्याः कर्म विनिर्दिशेत् ॥ २४ ॥
जब सिर दबा दे, तो दर्द-निवारक औषधि लगाने के लिये कहे ॥ २४ ॥
इदं त्वया कर्तव्यम्। नह्येतदृते कन्याया अन्येन कार्यमिति गच्छन्ती पुनरा-
गमनानुबन्धमेनां विसृजेत् ॥ २५ ॥
यह कार्य तुम्हें ही करना है, क्योंकि इसे कुमारिका के अतिरिक्त किसी अन्य से नहीं
कराया जाता। यदि वह जाने लगे तो पुनः आने का वचन लेकर ही जाने दे ॥ २५ ॥
अस्य च योगस्य त्रिरात्रं त्रिसन्ध्यं च प्रयुक्तिः ॥ २६ ॥
कन्यासाध्य इस योग को तीन बार रात्रि या सन्ध्या के समय ही प्रयोग करना
चाहिये ॥ २६ ॥
अभीक्ष्णदर्शनार्थमागतायाश्च गोष्ठीं वर्धयेत् ॥ २७ ॥
इस प्रपञ्च का उद्देश्य—बार बार देखने के लिये आयी हुई नायिका के साथ रोचक
वार्ताएँ करनी चाहिये ॥ २७ ॥
अन्याभिरपि सह विश्वासानार्थमधिकमधिकं चाभियुञ्जीत। न तु वाचा
निर्वदेत् ॥ २८ ॥
नायिका को विश्वास दिलाने के लिये अन्यान्य वार्ताएँ करता रहे, किन्तु अपने मुख से
उद्देश्य स्पष्ट न करे ॥ २८ ॥
दूरगतभावोऽपि हि कन्यासु न निर्वेदेन सिध्यतीति घोटकमुखः ॥ २९ ॥
युवतियों का प्रेम और विश्वास कितना भी ऊँचा पहुँच जाये, किन्तु विरक्ति से उनकी
सिद्धि नहीं होती, अतएव उनकी प्राप्ति के लिये निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिये—यह आचार्य
घोटकमुख का मत है ॥ २९ ॥
यदा तु बहुसिद्धां मन्येत तदैवोपक्रमेत् ॥ ३० ॥
जब अनेक उपायों द्वारा नायिका को सिद्ध समझ ले, तभी उसके साथ सम्भोग के लिये
तत्पर होना चाहिये ॥ ३० ॥
प्रदोषे निशि तमसि च योषितो मन्दसाध्वसाः सुरतव्यवसायिन्यो रागवत्यश्च
भवन्ति। न च पुरुषं प्रत्याचक्षते। तस्मात्तत्कालं प्रयोजयितव्या इति
प्रायोवादः ॥ ३१ ॥
समागमकाल—प्रदोष काल में, रात्रि में और अन्धकार में स्त्रियों में भय कम रहता है,