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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 248 में से

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पृष्ठ 125

३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९९
यं वा मन्येत मातापित्रोरसमीक्षया स्वयमप्ययमिन्द्रियदौर्बल्यान्मयि प्रवर्तिष्यत
इति प्रियहितोपचारैरभीक्ष्णसंदर्शनेन च तमावर्जयेत् ॥ ३८ ॥
वर में दर्शनीय गुण—ऐसी युवती जिसको यह समझे कि यह माता-पिता की समीक्षा
(आलोचना) की चिन्ता किये बिना, अपने इन्द्रिय-दौर्बल्य के कारण स्वयं ही मुझसे अनुरक्त हो
जायेगा, उसे प्रिय और हितकर उपचारों से और हाव-भावों से अपनी ओर आकृष्ट करे ॥ ३८ ॥
माता चैनां सखीभिर्धात्रेयिकाभिश्च सह तदभिमुखीं कुर्यात् ॥ ३९ ॥
माता का कर्तव्य—माता को चाहिये कि वह युवती की धाय की पुत्री या सखियों के
साथ उसको उस युवक की ओर अग्रसर करे ॥ ३९ ॥
पुष्पगन्धताम्बूलहस्ताया विजने विकाले च तदुपस्थानम्, कलाकौशल-
प्रकाशने वा सम्वाहने शिरसः पीडने चौचित्यदर्शनम्। प्रयोज्यस्य सात्म्ययुक्ताः
कथायोगाः बालायामुपक्रमेषु यथोक्तमाचरेत् ॥ ४० ॥
बाह्य उपचार—युवती को चाहिये कि एकान्त और कुसमय (रागोद्दीपन या रात्रिकाल)
में पुष्प, गन्ध, ताम्बूल आदि से नायक का सत्कार करे। औचित्यपूर्वक कलाकौशल, अङ्गमर्दन
या शिर दबाने की अपनी कुशलता प्रकटित करे। नायक की रुचि के अनुरूप वार्तालाप करे और
बालोपक्रम प्रकरण (तृतीय अधिकरण, तृतीय अध्याय) में नायक के जो उपाय बताये गये हैं,
उन्हें भी प्रयोग में लाये ॥ ४० ॥
न चैवान्तरापि पुरुषं स्वयमभियुञ्जीत। स्वयमभियोगिनी हि युवतिः सौभाग्यं
जहातीत्याचार्याः ॥ ४१ ॥
सम्भोग के लिए पहल घातक—अत्यधिक कामातुर होने पर भी सम्भोग के लिये स्वयं
पहल न करे, क्योंकि सम्भोग के लिये स्वयं ही अभियोग करने वाली युवती अपना सौभाग्य नष्ट
कर देती है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ४१ ॥
तत्रयुक्तानां त्वभियोगानामानुलोम्येन ग्रहणम् ॥ ४२ ॥
नायक के प्रयासों को स्वीकृति—यदि नायक अभियोगों का प्रयोग करे, अर्थात्
रमणेच्छा प्रकटित करे, तो उन्हें अनुकूलता से स्वीकार करे ॥ ४२ ॥
परिष्वक्ता च न विकृतिं भजेत्। श्लक्ष्णमाकारमजानतीव प्रतिगृह्णीयात्।
वदनग्रहणे बलात्कारः ॥ ४३ ॥
आभ्यन्तर उपचार—नायक के आलिङ्गन-चुम्बन आदि करने पर अपना राग प्रकट न
होने दे। नायक के स्निग्ध व्यवहार को मुग्धभाव वाला (अनजान) बनकर ही स्वीकार करे,
और ऐसा व्यवहार करे कि नायक बलपूर्वक मुखचुम्बन कर ले ॥ ४३ ॥
रतिभावनामभ्यर्थ्यमानायाः कृच्छ्राद् गुह्यसंस्पर्शनम् ॥ ४४ ॥
यदि नायक शिश्न को स्पर्श करने के लिये प्रेरित करे, तो कठिनतापूर्वक उसका स्पर्शमात्र
ही करे ॥ ४४ ॥
अभ्यर्थितापि नातिविवृता स्वयं स्यात्। अन्यत्रानिश्चयकालात् ॥ ४५ ॥
महत्त्वपूर्ण परामर्श—नायक के प्रार्थना करने पर भी नायिका को अपने भाव और अङ्ग