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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 248 में से

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पृष्ठ 121

३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९५
चतुर्थ अध्याय
एकपुरुषाभियोगादि प्रकरण
दर्शिताङ्गिकारां कन्यामुपायैरभियुञ्जीत ॥ १ ॥
उपाय—कन्या के भावों और चेष्टाओं को अपने अनुकूल देखकर उसे उपायों से प्राप्त
करना चाहिये ॥ १ ॥
द्यूते क्रीडनकेषु च विवदमानः साकारमस्याः पाणिमवलम्बेत ॥ २ ॥
साधिकार करग्रहण—शतरंज, द्यूत (ताश आदि) तथा अन्य खेलों में विवाद करता
हुआ नायक, नायिका का हाथ साधिकार पकड़ ले ॥ २ ॥
यथोक्तं च स्पृष्टकादिकमालिङ्गनविधिं विदध्यात् ॥ ३ ॥
आलिङ्गन—स्पृष्टक, विद्धक, उद्घृष्टक और पीड़ितक—इन आलिङ्गन-प्रकारों का
अवसर के अनुरूप विधिपूर्वक उपयोग करे ॥ ३ ॥
पत्रच्छेद्यक्रियायां च स्वाभिप्रायसूचकं मिथुनमस्या दर्शयेत् ॥ ४ ॥
पत्रच्छेद्य से अभिप्रायज्ञापन—पत्रच्छेद्य क्रिया में अपने अभिप्राय को ज्ञापित करने
वाला हंसमिथुन आदि बनाकर नायिका को दिखाये ॥ ४ ॥
एवमन्यद् विरलशो दर्शयेत् ॥ ५ ॥
मिथुनदर्शन—कभी-कभी मिथुन (युगल) चित्र भी दिखाने चाहिये ॥ ५ ॥
जलक्रीडायां तद्दूरतोऽप्सु निमग्नः समीपमस्या गत्वा स्पृष्ट्वा चैनां तत्रैवोन्म-
ज्जेत् ॥ ६ ॥
जलक्रीड़ा में अभिप्रायज्ञापन—जलक्रीड़ा में नायिका से दूर पानी में डुबकी लगाकर,
उसके समीप पहुँचकर और उसे छूकर ही पानी से बाहर निकले ॥ ६ ॥
नवपत्रिकादिषु च सविशेषभावनिवेदनम् ॥ ७ ॥
नवपत्रिका में अभिप्रायज्ञापन—नवपत्रिका आदि देश्य खेलों में अपने अभिप्राय का
निवेदन करना चाहिये ॥ ७ ॥
आत्मदुःखस्यानिवेदेन कथनम् ॥ ८ ॥
दुःखनिवेदन—अपने दुःख को, बिना किसी वेदना के कहना चाहिये ॥ ८ ॥
स्वप्नस्य च भावयुक्तस्यान्यापदेशेन ॥ ९ ॥
स्वप्नकथन—किसी बहाने से भावयुक्त स्वप्न की बातें कहनी चाहिये ॥ ९ ॥
प्रेक्षणके स्वजनसमाजे वा समीपोपवेशनम् । तत्रान्यापदिष्टं स्पर्शनम् ॥ १० ॥
बहाने से अङ्गस्पर्श—खेल आदि देखते समय या स्वजनगोष्ठी में नायक, नायिका के
पास ही बैठे और किसी बहाने से उसका अङ्गस्पर्श करे ॥ १० ॥
अपाश्रयार्थं च चरणेन चरणस्य पीडनम् ॥ ११ ॥
चरणपीड़न—उसके अङ्गों पर अपना अङ्ग रखने के लिये, उसके पैर को अपने पैर से
दबाये ॥ ११ ॥