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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 248 में से

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पृष्ठ 133

४. भार्याधिकारिक अधिकरण १०७
पातालिका—इन्हें गृहवाटिका में लगाये और इन लता-पादपों के मध्य बैठने के लिये वेदिका
(बेंच) बनवाये ॥ ७ ॥
मध्ये कूपं वापीं दीर्घिकां वा खानयेत् ॥ ८ ॥
गृहवाटिका के मध्य में कुआँ, बावड़ी या चौकोर दीर्घिका खुदवाये ॥ ८ ॥
भिक्षुकीश्रमणाक्षपणाकुलटाकुहके-
क्षणिकामूलकारिकाभिर्नसंसृज्येत ॥ ९ ॥
त्याज्य स्त्रियाँ—भिखारिनों, बौद्ध एवं जैन साध्वियों (संवासिनियों), कुलटाओं, नाच-
गान-तमाशा दिखाने वाली नटनियों, शकुन एवं प्रश्न बताने वाली और जादू-टोना या वशीकरण
करने वाली स्त्रियों से कदापि संसर्ग न करे ॥ ९ ॥
भोजने च रुचितमिदमस्मै द्वेष्यमिदं पथ्यमिदमपथ्यमिदमिति च
विन्द्यात् ॥ १० ॥
भोजन की व्यवस्था—भोजन बनाते (या बनवाते) समय यह सदैव ध्यान रखे कि यह
पदार्थ इनको रुचिकर लगता है और यह अरुचिकर, यह इन्हें पथ्य (कल्याणकारी) है और यह
अपथ्य ॥ १० ॥
स्वरं बहिरुपश्रुत्य भवनमागच्छतः किं कृत्यमिति ब्रुवती सज्जा भवनमध्ये
तिष्ठेत् ॥ ११ ॥
पति का स्वागत—बाहर से घर में प्रवेश करते हुए पति की आवाज सुनते ही 'क्या कार्य
है ?' ऐसा मन में विचारते हुए कार्य-सम्पादन के लिये भवन के मध्य आँगन में आकर प्रस्तुत हो
जाये ॥ ११ ॥
परिचारिकामपनुद्य स्वयं पादौ प्रक्षालयेत् ॥ १२ ॥
पाद-प्रक्षालन—परिचारिका को हटाकर स्वयं पति के पैर धुलवाये ॥ १२ ॥
नायकस्य च न विमुक्तभूषणं विजने सन्दर्शने तिष्ठेत् ॥ १३ ॥
अलंकृत दिखे—एकान्त में पति के समक्ष अलंकारविहीन होकर न जाये ॥ १३ ॥
अतिव्ययमसद्व्ययं वा कुर्वाणं रहसि बोधयेत् ॥ १४ ॥
पति के अधिक व्यय करने या अनावश्यक व्यय करने पर उसे एकान्त में समझाये,
सार्वजनिक रूप में लज्जित न करे ॥ १४ ॥
आवाहे विवाहे यज्ञे गमनं सखीभिः सह गोष्ठीं देवताभिगमनमित्यनुज्ञाता
कुर्यात् ॥ १५ ॥
बहिर्गमन के लिए अनुमति—विवाह के समय वर या कन्या के घर जाने, यज्ञादि
अनुष्ठानों में सम्मिलित होने, सखियों के साथ खानपान या वार्तागोष्ठी और देवदर्शन के लिये
जाने हेतु पति की अनुमति प्राप्त कर ले ॥ १५ ॥
सर्वक्रीडासु च तदानुलोम्येन प्रवृत्तिः ॥ १६ ॥
उत्सवों में सम्मिलित होने के लिये अनुमति—लोक में आयोजित होने वाले सभी
खेलों (समारोहों) में पति की इच्छा के अनुकूल ही सम्मिलित हो ॥ १६ ॥
काम० ९