वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
प्रकाशक
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
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The
CHAUKHAMBA SURBHARATI GRANTHAMALA
321
❖*❖
VARIVASYĀRAHASYAM
AND ITS COMMENTARY
PRAKĀŚA
BY
ŚRĪ BHĀSKARARĀYA MAKHIN
WITH SAROJINĪ HINDI COMMENTARY
Edited & Translated by
Dr. SHYAMAKANT DWIVEDI 'ANAND'
M.A., M.Ed., Ph.D., D.Lit.
[मुद्रा: 卐 स्वाध्यायान्मा प्रमदितव्यम् 卐 / चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन • वाराणसी]
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दो शब्द
भारतीय ज्ञानान्तरिक्ष के प्रचण्ड भास्कर, साधना 'नन्दन' के पारिजात,
वैदुष्य के बृहस्पति एवं भारती के वरदान आचार्य भास्करराय मखिन् द्वारा
प्रणीत यह मन्त्रशास्त्रीय ग्रन्थ “वरिवस्यारहस्यम्”' ‘प्रकाश’ एवं ‘सरोजिनी’ के
साथ विद्वान् पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है ।
भारतीय चिन्तन “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” की अचिन्त्य
भावभूमि एवं अज्ञेय 'परमपद' की ओर सदा से आकृष्ट रहा है । वह सदा से
रहस्योन्मुख रहा है । 'वरिवस्यारहस्यम्' भी रहस्य के धाम की तीर्थ यात्रा है ।
यह मन्त्र-जगत के रहस्यों का अन्वेषण है ।
मानवीय मनीषा, धिषणा, तर्क, प्रज्ञा एवं जिज्ञासा, सम्प्राप्त, संदृष्ट,
संश्रुत, सुविज्ञात, अधिगत एवं आगत (वर्तमान) से कभी संतुष्ट नहीं हुई
इसीलिए वह अनादिकाल से अप्राप्त, अदृष्ट, अश्रुत, अज्ञात, अनधिगत एवं
अनागत के संधान में तल्लीन रही है । वह प्राप्त से अप्राप्त, गम्य से
अगम्य, ज्ञात से अज्ञात, चिन्त्य से अचिन्त्य, ग्राह्य से अग्राह्य, दृष्ट से
अदृष्ट, श्रुत से अश्रुत एवं अधिगत से अनधिगत को जानने एवं उसका
साक्षात्कार करने का सतत प्रयास करती रही है । उसमें अदृश्य, अचिन्त्य,
अगम्य, अज्ञेय एवं अतर्क्य परात्पर तत्त्व एवं उसके रहस्यों के प्रति
अनन्तकाल से जिज्ञासा रही है । इसी कारण वह सृष्टि की प्रथम रश्मि के
समय से ही जानना चाहती रही है कि—
‘अविज्ञातं केन विजानीयात् ?’ ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम ?’ “हिरण्य-
गर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम ? यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इन्द्राजा जगतो
बभूव । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम । येन द्यौरुग्रा
पृथिवी च दृढ़ा येन स्व स्तंभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः
कस्मै देवाय हविषा विधेम । 'य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं
यस्य देवाः । यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।”१ वह
जानना चाहती है कि—‘केनेषितं पतति प्रेषितंमनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति
१. यजुर्वेद
६ वरिवस्यारहस्ये
युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उदेवो युनक्ति ॥'१ 'किं
कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन
सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥२ भगवन्कुत एष प्राणो जायते
कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते केनोत्क्रमते कथं
बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ?३ दर्शनशास्त्र इसी 'जिज्ञासा' (Curiosity)
का फल है—निष्पत्ति है—निगमन है । वह 'जिज्ञासा' चाहे 'अथातो ब्रह्म
जिज्ञासा' के रूप में वेदान्तियों के मन में उठे अथवा 'अथातो शक्ति जिज्ञासा'
के रूप में शाक्त दार्शनिकों के हृदय में उठे । वह जिज्ञासा चाहे वेदान्तियों के
'ब्रह्म' की हो चाहे शक्त्योपासकों के 'शक्ति' की हो, चाहे वह मीमांसको के
'कर्म' की हो और चाहे वह भक्तों के 'भक्ति' की हो । 'कार्य' से 'कारण',
'स्थूल से सूक्ष्म', विचार से विचारातीत, मन से मनसातीत, बुद्धि से
बुद्ध्यातीत, ज्ञात से अज्ञात, भौतिक से अभौतिक, इहलोक से परलोक, शब्द
से शब्दातीत, बाह्य से आभ्यन्तर एवं विज्ञात से रहस्य की ओर जाने की
आकांक्षा एवं उसके रहस्यों की जिज्ञासा मानवीय मन की सहज प्रवृत्ति रही है
इसीलिए तो वह जगत के असत्, तम एवं मृत्यु से सत्, ज्योति एवं
अमृतत्व की ओर जाने की आकांक्षा रखता हुआ कह उठता है—'असतो मा
सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय ।।' वह असत् से परे सत्
की ओर, तम से परे ज्योति की ओर एवं मृत्यु से परे अमृतत्व की ओर
बढ़ना चाहता है । इसी प्रकार आचार्य भास्कर भी विज्ञात 'वरिवस्या' से
अविज्ञात 'वरिवस्या रहस्य' की ओर बढ़ना चाहते हैं । आचार्य भास्कर के
मन में भी प्रश्न उठता है कि यदि शङ्कर कहते हैं कि “जपात्
सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्न संशयः” फिर जप करने से सिद्धि क्यों नहीं
होती । 'वरिवस्या' का निष्पादन करने पर भी 'मन्त्र' सिद्ध क्यों नहीं होता ?
उपासकों, भक्तों एवं साधकों के मन में भी ये जिज्ञासाऐं अवश्य उठती होंगी ।
इसी शंका, तर्क, संशय एवं जिज्ञासा के समाधान के लिए आचार्य
भास्करराय ने 'वरिवस्या' नहीं प्रत्युत वरिवस्या के 'रहस्य' पर 'वरिवस्या-
रहस्यम्' नामक ग्रन्थ लिखा ।
भास्कर कहते हैं कि 'मन्त्र' चिद्रश्मिमय हैं—'चिन्मरीचि' हैं—'पूर्णाहन्ता-
नुसंध्यात्मा' हैं इसीलिए कहा गया है— “मन्त्राश्चिन्मरीचयः पूर्णाहन्तानुसंध्यात्मा
स्फूर्जन्मननधर्मतः । संसारक्षयकृत्त्राण धर्मतो मन्त्र उच्यते ।।” वैखरी भूमि में
चिद्भाव गुप्त है । इसीलिए वैखरी वर्णों की मन्त्रमयता स्वीकार नहीं की जाती ।
'मन्त्र' नादात्मा हैं वैखरी वर्णों में नादाभाव है । चूँकि वैखरी में चिदंश एवं
१. केनोपनिषद २. श्वेताश्वतरोपनिषद
३. प्रश्नोपनिषद
दो शब्द ७
नादांश आच्छन्न है अतः इस स्तर पर मन्त्र का उदय ही नहीं होता ।
‘मध्यमा भूमि’ ही मन्त्रमयी भूमि का प्रथम सोपान है क्योंकि ‘मध्यमावाक्’
मन्त्ररूप में ही वाक् को प्रकाशित करता है । ‘स्मृति-परिशुद्धि’ द्वारा साङ्कर्य
का परिहार होने पर ही वैखरी से ‘मध्यमा भूमि’ में प्रवेश होता है—मन्त्रभूमि
में पदार्पण होता है । ‘पश्यन्ती’ दिव्य वाक् है । ‘परावाक्’ चिन्मय एवं
अव्यक्त है । ‘मध्यमा’ का विस्तार हृदय तक, ‘पश्यन्ती’ का नाभि तक एवं
‘परा’ का मूलाधार तक है । शब्द से शब्दातीत की यात्रा ही मन्त्र का लक्ष्य
है और यह यात्रा शब्दब्रह्म से प्रारम्भ होकर निःशब्द (‘अशब्दम-
स्पर्शमरूपमव्ययम्’) तक चलती है । इसके मध्य में इसके अनेक पड़ाव हैं ।
‘वरिवस्यारहस्यम्’ में शब्दराज्य से शब्दातीत एवं इन दोनों के मध्य अवस्थित
विभिन्न पड़ावों के रहस्यों को उद्घाटित किया गया है और मन्त्र-साधना या
वरिवस्या के अगम्य रहस्यों पर प्रकाश डाला गया है । इसीलिए इस ग्रन्थ
का नाम “वरिवस्यारहस्यम्” है । ‘वरिवस्या’ मन्त्र-साधना एवं जप के संदर्भ
में आचार्य भास्कर ने अत्यन्त वैज्ञानिक दृष्टि प्रस्तुत की है । उनकी दृष्टि को
इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—
(१) सर्वोच्च साधना—ब्रह्मसद्भाव ⎤ “उत्तमो ब्रह्मसद्भाव ध्यान-
(२) मध्यम साधना—ध्यानभाव ⎥ भावस्तु मध्यमः । स्तुतिर्जपोधमो
(३) अधम साधना—स्तुति जप ⎦ भावो बाह्यपूजाऽधमाधमा ॥”
(१) उत्तमाअवस्था—सहजावस्था ⎤ “उत्तमा सहजावस्था मध्यमा
(२) मध्यमावस्था—ध्यान-धारणा ⎥ ध्यान धारणा । जपस्तुतिः स्याद-
(३) अधमावस्था—जप-स्तुति ⎥ धमा होमपूजाधमाधमा ॥”
(४) अधमाधमावस्था—होम, पूजा ⎦
‘चिन्ता’
(१) उत्तमा—तत्त्वचिन्ता ⎤
(२) मध्यमा—जप-चिन्ता ⎥ उत्तमा तत्वचिन्तास्याज्जप चिन्ता
(३) अधमा—शास्त्र-चिन्ता ⎥ तु मध्यमा । शास्त्रचिन्ताधमा ज्ञेया
(४) अधमाधमा—लोक-चिन्ता ⎦ लोक चिन्ताधमाधमा ।।'
(१) कोटि पूजा = १ स्तोत्र ⎤
(२) कोटि स्तोत्र = १ जप ⎥ ‘पूजा कोटि समं स्तोत्रं स्तोत्र
(३) कोटि जप = १ ध्यान ⎥ कोटि समो जपः । जपकोटि समं
(४) कोटि ध्यान = १ लय ⎦ ध्यानं ध्यान कोटि समो लयः ॥’
८ वरिवस्यारहस्ये
(१) सर्वोच्च मन्त्र = नाद ┐
(२) सर्वोच्च देव = आत्मा │ 'नहि नादात् परो मन्त्रो न
(३) सर्वोच्च पूजा = परापूजा ┤ देवः स्वात्मनः परः । नानुसंधेः
(४) परम फल = आत्मतृप्ति ┘ परापूजा न हि तृप्तेः परं फलम् ।।'
(१) देवालय — देह ┐ “देहो देवालयो देवि जीवो
(२) जीव — सदाशिव ┘ देवः सदाशिवः ।।”
भास्कराचार्य ने—
'नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ।।
'अर्थमजानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ।।
'एतामुत्सृज्य जडैः क्रियमाणा बाह्याडम्बरोपास्तिः ।
प्राणविहीनेव तनुर्विगलितसूत्रैव पुत्तलिका ।।'
—कहकर उपर्युक्त साधना-सूत्रों की ही पुष्टि की है । आचार्य भास्कर
'वरिवस्या' के सन्दर्भ में आचार्य शङ्कर के 'परापूजा' के इस आदर्श एवं
अनुभूति को ही वरेण्य मानते हैं—
'आत्मा त्वं, गिरिजा मतिः, सहचराः प्राणाः, शरीरं गृहम् ।
पूजा ते विविधोपभोग रचना, निद्रा समाधिस्थितिः ।।'
'सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो ।
यद् यद् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ।।'
क्योंकि—
'पूजा नाम न पुष्पाद्यैर्या मतिः क्रियते दृढा ।
निर्विकल्पे परे व्योम्नि सा पूजा ह्यादराल्लयः ।।
और 'ध्यान' भी शरीराङ्ग-कल्पना नही है—
'ध्यानं हि निश्चला बुद्धिर्निराकारा निराश्रया ।
न तु ध्यानं शरीराक्षि मुख हस्तादि कल्पना ।।'
इसी प्रकार होम भी—
'महाशून्यालये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् ।
हूयते मनसा सार्धं स होमश्चेतना स्रुचा ।।'
दो शब्द ९
मैं सर्वप्रथम भारतीय मनीषा के अद्भुत चमत्कार, प्रतिभा के मूर्त्तिमान
स्वरूप, साधना की निष्पत्ति, ज्ञान के अभ्रंलिह शिखर, सिद्धि के रत्नाकर एवं
वीणापाणि भगवती के वरद आत्मज आचार्य भास्करराय के पाद-पद्मों में
प्रणिपात करता हुआ उनका सश्रद्ध अभिवादन करता हूँ और अन्त में इस
ग्रन्थ के प्रकाशक एवं चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन के सञ्चालक श्रीवल्लभदास
जी एवं श्रीनवनीतदासजी गुप्त के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ
क्योंकि उन्होंने इस ग्रन्थ को प्रकाशित करने के दुर्वह दायित्व को स्वीकार
करते हुए मुझे अनुगृहीत किया।
विद्वद्वशंवद्
बैढन (जमुआ) सीधी म०प्र० श्यामाकान्त द्विवेदी 'आनन्द'
संवत् २०५५
९.९.१९९७
॥ निवेदन ॥
प्रस्तुत 'दुर्गासप्तशती' चित्रमय पुस्तक को सम्पादित करने का अनुष्ठान ...
बड़े समारोह के साथ अपने अभीष्ट के लिए पाठ करते हैं। नित्य ...
ही पाठ करें तो चमत्कारी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इसके अतिरिक्त ...
पाठ भी लाभप्रद और फलदायक सिद्ध होता है। इस ग्रन्थ ...
अनुष्ठानपरक प्रणाली के नियम विस्तारपूर्वक बताये गये हैं। श्रद्धावान् साधक ...
से उचित लाभ उठाकर जीवन को धन्य बना सकते हैं। साधक ...
अपना यह कर्तव्य हेतु से विज्ञापित किया कि इसका नित्य-पाठ ...
...। अपनी कठिनाइयाँ मिट कर ...
"अथर्व शीर्ष" नवार्णमन्त्र ...
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—•—
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भूमिका
भारतीय आध्यात्मिक साधना एवं दर्शन के इतिहास में आचार्य शङ्कर के
अनन्तर यदि किन्हीं अन्य अनुत्तर, अप्रतिम एवं अद्वितीय विभूतियों का नामोल्लेख
किया जा सकता हो तो उनमें आचार्य श्रीभास्करराय मखिन या भासुरानन्दनाथ का
नाम सर्वोपरि होगा । वैदुष्य के इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों से लिखा
जाएगा ।
आचार्य भास्कर बहुश्रुत, बहुज्ञ, अपरिमेय ज्ञान-शाखाओं के अतुल्य विपश्चित,
अद्भुत मनीषी एवं ज्ञान-रत्नाकर थे । आचार्य शङ्कर जो कार्य अपूर्ण छोड़कर चले
गए उसे उन्होंने पूर्ण किया । आचार्य शङ्कर ने ब्रह्माद्वैतवाद की तो प्राण-प्रतिष्ठा की
और 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति', 'सर्वंखल्विदं ब्रह्म', 'अहं ब्रह्मास्मि' 'तत्त्वमसि'
का शङ्खनाद करते हुए इस सत्य सिद्धान्त को बद्धमूल करके उसे पल्लवित,
कुसुमित एवं सुरभित भी किया और डिण्डिम नाद करते हुए कहा—
'श्लोकार्द्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीव ब्रह्मैव नापरः ॥'
किन्तु अपनी इस अनुभूति को रूपायित नहीं कर पाये कि—
'सत्यपि भेदापगमेनाथ तवैवाहं न मामकीनस्त्वं ।
सामुद्रो वै तरङ्गः न तु तारङ्गो वै समुद्रः ॥'
"शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं"—की अद्वैतानुभूति करते हुए भी वे—
"अहं देवी न चान्योस्मि" का शङ्खनाद नहीं कर सके । वे शिवोपासक होकर भी
यह तो कह गए कि—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥१'
किन्तु फिर भी वे शक्त्याद्वैतवाद की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं कर सके । ब्रह्म एवं
शिव की महत्ता के गायक आचार्य शङ्कर ब्रह्म एवं शिव में इतने रमे कि वे शक्ति
की ब्रह्मरूपता, वेदों में शक्तिवाद एवं शक्ति-साधना की दिशा में, अधिक समय दे
ही नहीं पाये । इसी अपूर्ण कार्य को आचार्य भास्करराय ने पूर्ण किया । आचार्य
शङ्कर ने 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' को मूल मन्त्र मानकर उसकी साधना की जबकि
१. सौन्दर्यलहरी
१२ वरिवस्यारहस्ये
आचार्य भास्कर ने—"अथातो शक्ति जिज्ञासा" को अपना मूल मन्त्र स्वीकार करके
इसी दिशा में यावज्जीवन साधना की।
'वरिवस्यारहस्यम्' नामक प्रस्तुत आचार्यश्री की रचना जो कि मूलतः मन्त्र-
शास्त्र की रचना है—मूलतः गायत्री एवं पञ्चदशी मन्त्रों की एकात्मता, उसके पन्द्रह
अर्थों के प्रतिपादन, जीव-ब्रह्मैक्यवाद, परिणामवाद, नादोपासना, उद्गीथो- पासना,
प्रकाश-विमर्शवाद, शब्दशक्तिवाद, सर्वचिन्मयवाद एवं सर्वशक्तिवाद आदि सिद्धान्तों
के प्रतिपादन में ही केन्द्रित हैं। यह मन्त्रशास्त्र के साङ्गोपाङ्ग विवेचन की ओर
उन्मुख नहीं है।
"वरिवस्यारहस्यम्" के रचनाकार आचार्य श्रीभास्करराय एवं उनके इस
ग्रन्थरत्न का परिचय दिये बिना उनके उक्त ग्रन्थ की व्याख्या एवं उसका
रहस्योद्घाटन ग्रन्थकार के प्रति अन्याय होगा। इसी दृष्टि से संक्षेप में इन पर
प्रकाश डाला जा रहा. है।
१. भास्करराय और उनका आविर्भाव-काल
आचार्य भास्करराय या भासुरानन्दनाथ अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में
आविर्भूत श्रीविद्या सम्प्रदाय के ऐसे प्रख्यात एवं सिद्ध शाक्त दार्शनिक थे जिनके
विषय में केवल यही कहा जा सकता है कि—"न भूतो न भविष्यति ॥"
आचार्य भास्करराय तान्त्रिक होते हुए भी श्रौतमार्गी थे, शाक्त होते हुए भी
शैवमार्गी थे, गृहस्थ होते हुए भी सन्यासियों से भी महत्तर थे, निवृत्तिमार्गी होते हुए
भी लोकसंग्रही थे, और साधक होते हुए भी सिद्ध थे और रहस्य-जगत् के महान्
रहस्य थे। आचार्य भास्कर ने जो 'सौभाग्यभास्कर' एवं 'सेतुबंध' टीकाएँ लिखीं वे
तान्त्रिक साधना के विश्वकोष हैं।
उन्होंने शाक्त मत के रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए आजीवन उसका
प्रचार-प्रसार किया, शास्त्रार्थ किया एवं दर्जनों ग्रन्थों की रचना की। आचार्य
भास्करराय का आविर्भाव सत्रहवीं शताब्दी के अवसान एवं अठारहवीं शताब्दी के
पूर्वार्द्ध में हुआ था। उन्होंने अपनी स्व-रचित रचनाओं में (इन रचनाओं का)
रचना-काल भी उल्लिखित किया है। उन्होंने 'ललितासहस्रनाम' पर प्रणीत अपने
भाष्य का समापन सम्वत् १७८५ में कालयुक्त की आश्विन-शुक्ल-नवमी को किया
था और 'सेतुबन्ध' नामक अपनी रचना का समापन शक संवत् १६५५ (ई० सन्
१७३३) के शिवरात्रि को और सप्तशती पर प्रणीत अपनी टीका 'गुप्तावती' की
रचना सम्वत् १७८७ के 'प्रमोद' नामक वर्ष में चिदम्बरम में की थी। 'ललिता
सहस्रनाम' एवं 'सेतुबन्ध' (ई० सन् की दृष्टि से) क्रमशः १७२८ एवं १७४१ में
लिखे गए थे किन्तु 'काल-युक्त' एवं 'प्रमोद' की दृष्टि से इनकी रचना क्रमशः
१७३८-३९ एवं १७५०-५१ में हुई थी। दोनों में दस वर्षों का अन्तर है।
निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित 'ललितासहस्रनाम भाष्य' की भूमिका में कहा
गया है कि यद्यपि भास्करराय ज्ञान की समस्त शाखाओं में निष्णात थे किन्तु वे
भूमिका १३
मूलतः शाक्त दर्शन की वामाचार शाखा से सम्बद्ध थे । वाराणसी के पण्डितों ने
उन्हें वामाचारी होने की भूल को स्वीकार करके उनका परित्याग करने हेतु उनके
आवास पर जाकर उन्हें समझाने का निर्णय लिया ।
'निर्णयसिन्धु' के प्रणेता कमलाकरभट्ट के पितामह नारायण भट्ट के नेतृत्व में
सङ्गठित विरोधियों के दल के उपर्युक्त निर्णय से अवगत होकर भास्करराय ने उन्हें
स्वनिष्पाद्य 'महायाग' में शास्त्रार्थ हेतु आमंत्रित किया । नारायण भट्ट प्रभृति विद्वान
यज्ञशाला में गए किन्तु भास्करराय की अप्रतिम आध्यात्मिक महानता देखकर
प्रतिवाद करने का साहस तो नहीं जुटा सके तथापि उन्होंने उनसे मन्त्रशास्त्र पर
अनेक प्रश्न किए । भास्करराय ने सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर दिया । इसी
समय कुंकुमानन्द नामक सन्यासी ने पण्डितों से कहा कि आप लोग इन्हें शास्त्रार्थ
में पराभूत नहीं कर सकते क्योंकि स्वतः श्रीदेवी भास्करराय के मुख से बोल रही
हैं । नारायणभट्ट ने इसका प्रमाण माँगा । सन्यासी ने देखा कि भास्करराय के
कंधों पर श्रीदेवी समासीन हैं और भास्करराय के मुख से बोल रही हैं । इस
विचित्र घटना को देखकर सभी पण्डित निराश और लज्जित होकर घर लौट गए ।
उपर्युक्त घटना को ऐतिहासिक काल-क्रम की दृष्टि से देखने पर इसकी
प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है क्योंकि कमलाकरभट्ट ने 'निर्णयसिन्धु' की रचना
विक्रम संवत् १६६८ (ई० सन् १६१२) में की । उनके पितामह नारायणभट्ट
१६१२ से पचास वर्ष पूर्व रहे होंगे किन्तु भास्करराय द्वारा प्रणीत पुस्तकों की
तिथियाँ इससे मेल नहीं खातीं ।
इसके अतिरिक्त, भास्करराय के काल-निर्णय की दिशा में निम्न बिन्दु भी
ध्यातव्य हैं—
१. भास्करराय ने अप्पय दीक्षित का नाम ससम्मान उल्लेखित किया है । वे
१५५४ से १५९४ ई० सन् तक—के मध्य वर्तमान थे ।
२. भास्करराय ने वरदराज के 'मध्यसिद्धान्तकौमुदी' पर टीका लिखी थीं ।
वरदराज भट्टोजी दीक्षित के एवं भट्टोजी दीक्षित स्वयमेव अप्पयदीक्षित के
शिष्य थे ।
३. खण्डदेव की 'भाट्टदीपिका' पर भास्करराय ने टीका लिखी । खण्डदेव के
शिष्य शम्भुभट्ट के कथनानुसार खण्डदेव ने बनारस में वि०सं० १७२२
में इह लीला-संवरण किया । वि०सं० १७२२ को ई० सन् की दृष्टि से
देखा जाय तो यह १६६६ पड़ता है ।
४. वैयाकरण नागोजी भट्ट ई० सन् १६८८ से १७५० के मध्य स्थित थे ।
भास्कररायजी ने उनकी पुस्तक 'मञ्जूषा' एवं उनके द्वारा प्रणीत
'दुर्गासप्तशती' की टीका को अनेक स्थलों पर उद्धृत किया है ।
५. भास्करराय के शिष्य उमानन्दनाथ ने 'नित्योत्सव' की रचना ई० सन्
१७७५ में की थी । रामेश्वर सूरि के मतानुसार भास्करराय ने इस रचना
१४ वरिवस्यारहस्ये
का पुनरीक्षण भी किया था । इन समस्त प्रमाणों से निष्कर्ष निकलता है
कि भास्करराय अठारहवीं सदी के प्रारंभ से १७६८ तक विद्यमान रहे ।
श्रीबटुकनाथजी शास्त्री खिस्ते के कथनानुसार भास्करराय सन् १६७० के
आस-पास आविर्भूत हुए ।
भास्करराय भारतीय मनीषा के भास्कर थे, भारतीय प्रज्ञा के सुधांशु थे,
भारतीय तान्त्रिक-साधना के ध्रुव नक्षत्र थे, वैदुष्य के बृहस्पति थे, सारस्वत-साधना
के अप्रतिम साधक थे और सिद्धान्त और साधना की सङ्गमभूमि के ऊपर
शङ्कराचार्य थे ।
२. भास्करराय की रचनाएँ
भास्करराय ने चालीस से अधिक पुस्तकें लिखी हैं । उनके शिष्य जगन्नाथ ने
'भास्करविलास' नामक अपने ग्रन्थ में इन पुस्तकों का उल्लेख किया है ।१ यथा—
१. ललितानाम साहस्रभाष्यं भाष्यकृतां समः ।
सौभाग्यभास्कराख्यं सभाग्यलब्धं व्यधात्सुधीः ॥
२. कौलोपनिषद्भाष्यं कुलजैः सेव्यो जनैश्चकारासौ ।
त्रैपुरमहोपनिषदं त्रैपुरसिद्धान्तविद्विवव्रे सः ॥ आदि ॥
अनेक विषयों एवं अनेक दर्शनों पर उनकी अनेक पुस्तकें हैं यथा—
१. वेदान्त—(१) 'चण्डभास्कर' (२) 'नीलाचल चपेटिका' (इन दोनों पुस्तकों
की रचना द्वैतवादी ग्रन्थ 'प्रहस्त' के खण्डन हेतु की गई थी ।)
२. मीमांसा—(१) 'वादकौतूहल' (भास्करराय एवं उनके गुरुपुत्र स्वामी शास्त्री
के मध्य हुए शास्त्रार्थ पर आधृत ।) (२) 'भाट्टचन्द्रोदय' (खण्डदेव
विरचित 'भाट्टदीपिका' की टीका)
३. व्याकरण—(१) 'रसिकरंजिनी' (वरदराज के ग्रन्थ 'मध्यसिद्धान्त कौमुदी'
पर प्रणीत ग्रन्थ)
४. न्याय दर्शन—'न्याय मण्डन'
५. छन्दशास्त्र—(१) चण्डभास्कर (छन्दसूत्र पर भाष्य), (२) छन्द कास्तुभ
(३) वृत्तचन्द्रोदय (४) वार्तिकराज (५) मृतसञ्जीवनी ।
६. काव्य—(१) चन्द्रशाला (२) मधुराम्ल (३) भास्कर सुभाषित ।
७. स्मृति—(१) स्मृतितत्त्व (२) सहस्रभोजन खण्ड टीका । (बौधायन के
धर्मसूत्रों पर लिखी गई टीका) (३) 'शङ्खचक्रायन प्रायश्चित्त' (४) एकादशी
निर्णय (५) प्रदोष निर्णय (६) त्रिक भास्कर (७) कुण्ड भास्कर ।
८. स्तोत्र—(१) शिवस्तव (२) देवीस्तव (३) शिव दण्डक (४) शिव स्तोत्र
शतनाम स्तोत्र व्याख्या ।
१. 'भास्करविलास' (भास्कर के शिष्य उमानन्दनाथ 'जगन्नाथ' द्वारा प्रणीत)
भूमिका १५
९. मन्त्रशास्त्र—(१) खद्योत (गणपति सहस्रनाम की टीका) (२) चन्द्रलाम्बा
माहात्म्य टीका (३) नाथनवरत्नमाला मञ्जूषा (अपने दीक्षा गुरु की प्रशंसा
में एक स्तोत्र) (४) 'भावनोपनिषद्भाष्य' (शरीर के विभिन्न भागों में
श्रीचक्र का पूजन) (५) 'श्रीसूक्तभाष्य' (६) कौलोपनिषद् भाष्य (७)
त्रिपुरोपनिषद् भाष्य (८) सौभाग्य भास्कर (ललिता सहस्रनाम पर रचित
भाष्य) (९) सौभाग्य चन्द्रोदय (विद्यानन्द नाथ पर प्रणीत 'सौभाग्यरत्नाकर'
पर प्रणीत टीका) (१०) वरिवस्यारहस्य ('प्रकाश' नामक टीका) (११)
त्रिपुरसुन्दरी बाह्य 'वरिवस्या' (त्रिपुरसुन्दरी की बाह्य पूजा का वर्णन) (१२)
रत्नालोक ('परशुरामकल्पसूत्र' की टीका) (१३) गुप्तवती (दुर्गा सप्तशती
पर टीका) (१४) शत श्लोकी (सप्तशती में विद्यमान मन्त्रों के विषय में
प्रणीत) (१५) सेतुबंध (वामकेश्वरतन्त्र की टीका) ।
१०. कोश—'वैदिककोश'
भास्कराचार्य ने लिखा है कि मै 'तन्त्रराज' एवं 'ललितास्तुति' पर टीका
लिखूँगा ।
३. भास्करराय का जीवन परिचय
आचार्य भास्कर ने स्वयमेव अपना परिचय “सौभाग्यभास्कर” में इस प्रकार
दिया है—
“श्रीगंभीर विपश्चितः पितुरभूद्यः कोनमाम्भोदरे
विद्याष्टादशकस्य मर्मभिद्यः श्रीनृसिंहाद् गुरोः ।
यश्च श्रीशिवदत्तशुक्लचरणैः पूर्णाभिषिक्तोऽभवत्
स त्रेता त्रिपुरा त्रयीति मनुते तामेव नाथत्रयीम् ॥” (सौभाग्यभास्कर)
आचार्य भास्कर का ही परवर्तीनाम भासुरानन्दनाथ भी है—“गुरुचरणासनाथो
भासुरानन्दनाथो । विवृतिमति रहस्यां वीरवृन्दैर्नमस्याम् ।। (सौभाग्यभास्कर)
आचार्य भास्करराय शास्त्रोद्धार सत्सम्प्रदायप्रथन एवं तान्त्रिक रहस्यों के
उद्घाटन तथा आगम-निगम में समन्वय-स्थापन के देवदूत थे—
'स्वोपासनासिद्धिरहस्यसारसत्सम्प्रदायप्रथनाय नूनम् ।
आविर्भवन्ति गुरुभास्कराख्या पायादपायात्परदेवतामाम् ॥'
आचार्य भास्कर यथा नाम स्वयं भास्कर थे । वे भास्कर थे—तान्त्रिक साधना
के रहस्यों के अज्ञानान्धकार के; वे भास्कर थे रहस्यपथ की कादम्बरी को विध्वस्त
करने वाली शक्ति के ।
भास्कररायमखिन भारतीय मनीषा के भास्कर थे, भारतीय प्रज्ञा के सुधांशु थे,
भारतीय तान्त्रिक साधना के ध्रुव नक्षत्र थे, वैदुष्य के बृहस्पति थे, सारस्वत साधना
के अप्रतिम अंशुमाली थे, सिद्धान्त और सिद्ध साधना तथा साधना और सिद्धि के
ज्योतिर्मयलोक के द्वितीय शङ्कराचार्य थे ।
२ वरि. भू.
१६ वरिवस्यारहस्ये
भास्करराय सत्रहवीं सदी के अन्त में आविर्भूत हुए । इनका जन्मस्थान भागा
नगरी (हैदराबाद) है । इनके पिता श्रीगंभीरराय भारती थे जो कि अनेक शास्त्रों के
प्रकाण्ड विद्वान, आहिताग्नि एवं बीजापुर राज्य के दीवान थे । बीजापुर के यवन
राजा ने श्रीगंभीररायजी से महाभारत का आख्यान सुना एवं उनके अनुरोध पर
गंभीररायजी ने संपूर्ण महाभारत का फारसी में अनुवाद कर डाला । इसी महनीय
कार्य के कारण उनको 'भारती' कहा जाने लगा । श्रीगंभीररायजी ने अपने
‘विष्णुनाम प्रसूनाञ्जलि” नामक ग्रन्थ में अपना वंश-परिचय दिया है । इसके
अनुसार वे विश्वामित्र गोत्रीय थे और इनके मूलपुरुष का नाम था—एकनाथ ॥
उनके पुत्र पण्डित तुकदेव एवं पौत्र यमाजि पण्डित थे । यमाजि पण्डित की भार्या
चन्द्रमाम्बा से गंभीरराय उत्पन्न हुए । यद्यपि गंभीरराय भागवत संप्रदाय के अनुवर्ती
थे तथापि श्रीवत्सगोत्रीय अपने मामा श्रीआगमाचार्य नारायण पण्डित से इन्होंने
आगमशास्त्र का सम्यक् अध्ययन करके उनसे दीक्षा ली थी । गंभीरराय बीजापुर में
रहा करते थे । वे किसी कार्यवश सपत्नीक हैदराबाद गए । वहीं कोणमाम्बा के
गर्भ से भास्करराय का द्वितीय पुत्र के रूप में जन्म हुआ । चूँकि गंभीरराय का
प्रथम पुत्र तीव्र बुद्धि का नहीं था अतः कोणमाम्बा ने भगवान भास्कर की
तीव्रोपासना की । इसी तपस्या के फलस्वरूप भास्करराय जैसा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न
हुआ । गंभीरराय ने भास्कर को बाल्यावस्था में ही 'सारस्वतकल्प' के अनुसार
सरस्वतीमन्त्रपूत ब्राह्मीलता का सेवन कराया जिससे उनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी हो
गई । उनका यज्ञोपवीत संस्कार काशी में हुआ । इसके अनन्तर उन्होंने पाँच वर्षों
की अवस्था से ही अपनी ऋक् शाखा का अभ्यास एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन
किया ।१
अत्यन्त तेजस्वी एवं मेधावी होने के कारण भास्कर से (बाल्यकाल से ही)
जो भी बातें करता वह प्रभावित हो जाता था । इसी मध्य आंध्रप्रदेश के अशेष
शास्त्र-निष्णात, मूर्धन्य विद्वान श्रीनृसिंहाध्वरि गंभीरराय के घर पधारे । नृसिंहाध्वरि ने
भास्कर की प्रतिभा देखकर उन्हें अध्ययन करने के लिए अपने पास भेजने का
परामर्श दिया जिसे कि पिता ने स्वीकार कर लिया । भास्कर ने इनके घर रहकर
अशेष विद्याओं का सम्यक् अध्ययन किया । उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है—
“विद्याष्टदशकस्य मर्मविदभूद्यः श्रीनृसिंहो गुरोः ॥”
भास्कर अष्टादश विद्याओं के पारगामी विद्वान हुए । भास्कर ने अन्य आचार्यों
से भी अध्ययन किया, यथा—रूक्मण्णा पण्डित से छन्द एवं अलङ्कार शास्त्र एवं
गङ्गाधर वाजपेयी से नव्यन्यायशास्त्र का अध्ययन किया । उन्होंने १७-१८ वर्ष की
अवस्था तक अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर डाला । यथा—आयुर्वेद, धनुर्वेद एवं
गणित आदि का ॥ आचार्य गङ्गाधर बाजपेयी ने उन्हें गौड़ तर्कशास्त्र में निष्णात
कर दिया ।
१. कृष्णास्वामी शास्त्री—'वरिवस्यारहस्यम्' की भूमिका
भूमिका १७
गंभीरराय ने भास्कर को राजकार्य में लगाना चाहा किन्तु किसी सिद्ध महात्मा
का ओदश मानकर उन्होंने भास्करराय को मनोनुकूल अध्ययन एवं धर्मरक्षा में ही
प्रवृत्त रहने की प्रेरणा दी ।
जगद्गुरु भगवान् शङ्कराचार्य की सांप्रदायिक परम्परा में द्विविध शिष्य-प्रणाली
थी—१. संन्यासी २. गृहस्थ । भास्करराय ने गृहस्थ शिष्य परम्परा में सम्प्रदाय की
रक्षा करने का बीड़ा उठाया । चूँकि आचार्य शङ्कर अल्पजीवी थे अतः उनके द्वारा
दो कार्य पूर्ण नहीं हो पाये—१. शिवोपासना, एवं २. शक्त्योपासना का दृढ़ता से
प्रतिपादन ।। आचार्य भास्कर ने शङ्कर परम्परा एवं शक्ति-दर्शन दोनों को अभूतपूर्व
रूप में उपस्थापित किया । शिवोपासना का प्रतिपादन एवं उसकी प्राणप्रतिष्ठा का
महनीय कार्य तो श्रीअप्पय दीक्षित ने किया किन्तु शक्त्योपासना की सशक्त
प्राणप्रतिष्ठा आचार्य भास्कर ने की ।
गुरु नृसिंहाध्वरि के पुत्र महामीमांसक श्रीस्वामी शास्त्री (गुरुबंधु) एवं भास्कर
दोनों ने मिलकर, आंध्रप्रदेश के राजा मल्लिकार्जुन की इच्छानुसार 'पूर्व मीमांसावाद
कुतूहलम्' नामक ग्रन्थ की रचना की ।
भास्कर के गुरु श्रीनृसिंहाध्वरि ने भास्करराय को, तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ श्रीविद्या
के उपासक एवं अविच्छिन्न शाङ्कर परम्परा के आचार्य (नागर ब्राह्मण, आहिताग्नि
एवं सूरत के निवासी) श्रीशिवदत्तजी शुक्ल के पास श्रीविद्या का अध्ययन करने हेतु
भेजा । श्रीशिवदत्तजी उच्चकोटि के साधक एवं तपस्वी थे । भास्करराय उनके पास
जाकर उनसे अध्ययन करने लगे । इसी बीच वल्लभ सम्प्रदाय का कोई आचार्य
वहाँ आकर शाङ्कर मत के विरुद्ध प्रचार-प्रसार करने लगा । स्थानीय पण्डितों ने
उनसे शास्त्रार्थ करने हेतु शुक्लजी को आमंत्रित किया किन्तु वे वृद्ध होने के
कारण नहीं जा सके किन्तु भास्कर के निवेदन पर उन्हें आशीर्वाद देकर शास्त्रार्थ
करने भेज दिया । भास्कर ने उस आचार्य को पराजित करके शाङ्करमत की
विजयपताका फहरायी । इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीशुक्लजी ने भास्कर को
सर्वोच्च दीक्षाएँ देकर कृतार्थ किया । यह घटना भास्कर के शिष्य जगन्नाथशुक्ल
(उमानन्दनाथ) ने अपने ग्रन्थ—'भाष्करविलास' में इस प्रकार उल्लेखित किया है—
“शिवदत्तशुक्लचरणासादितपूर्णाभिषेकसाम्राज्यः ।
गुर्जरदेशे विदधे जर्जरस्थैर्यं स वल्लभाचार्यम् ॥”
मध्व सम्प्रदाय के एक आचार्य ने भास्करराय को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती
दी । भास्कराचार्य ने एक शर्त रक्खी कि “जो पक्ष हारेगा वह विजयी पक्ष को
अपनी कन्या प्रदान करेगा ।।” पराजित होकर मध्व संप्रदाय के उस आचार्य ने
अपने भाई की पुत्री के साथ भास्कर का विवाह करा दिया । इस घटना का भी
उल्लेख 'भास्कर-विलास' में किया गया है—
“वादेमस्करिणं माध्वं व्याधूयामुष्य बंधुजाम् ।
पार्वतीं व्यवहृत कीर्त्या समं सत्यप्रतिभवः ॥”
१८ वरिवस्यारहस्ये
वाराणसी के पण्डितों ने भास्कर की परीक्षा ली । उन लोगों ने भास्करराय से
चतुःषष्टि योगिनी-चरित्र के विषय में प्रश्न किया । इस प्रश्न का उत्तर भास्कर के
समीप किसी देवता ने उपस्थित होकर दिया ।
आचार्य शङ्कर की ही भाँति भास्कर भी भारत का भ्रमण करते रहे । उनके
तीन लक्ष्य थे—१. शक्ति की उपासना २. वेद एवं आगमों में समन्वय स्थापना
३. मीमांसादर्शन के अनुसार तन्त्र-ग्रन्थों की व्याख्या करना एवं देवस्थानों का
जीर्णोद्धार ।। इन्होंने अनेक वैदिक यज्ञ भी किए । ये श्रौत यज्ञ थे । 'गणेश
सहस्रनाम' के खद्योत भाष्य में काशी के त्रिलोचन घाट के निकट भास्कर द्वारा
किसी यज्ञ करने या कराने का उल्लेख मिलता है—
गंभीर बुध यज्वनस्तनुभवोऽधि वाराणसीं ।
त्रिलोचन पदानुगः कृतमखोऽग्निचिद्भास्करः ॥
आचार्य भास्कर ने गोवा प्रदेश में 'नित्याषोडशिकार्णव' पर 'सेतुबंध' नामक
टीका लिखी । उन्होंने अपनी कुलदेवी 'चन्द्रकला' देवी का श्रीचक्र के आकार का
मन्दिर बनवाया । उनकी पत्नी ने तञ्जौर के निकट भास्करपुर नामक अग्रहार (दान
मे दिया गया गाँव) में शिव और पार्वती की स्थापना की । इन्हें अन्नभण्डार एवं
वैभव की कमी नहीं थी । इसीलिए उनका सत्र-समर्पण, दान आदि सतत् चलता
रहता था ।
राजा चन्द्रसेन जाधव (भोंसले राजाओं का सेनापति) भास्कर का शिष्य था ।
उसके पुत्र के असाध्य रोग को नष्ट करने हेतु सूर्य की आराधना की गई । भास्कर
ने इसी प्रसङ्ग में 'तत्वभास्कर' लिखा ।
भास्कराचार्य बहुत ही अध्ययनशील थे इसीलिए उनके ग्रन्थों में सहस्रों ग्रन्थों
का उल्लेख मिलता है । मीमांसा दर्शन उनका प्रधानविषय या तन्त्रग्रन्थों की
व्याख्या में भास्कर ने उसी शैली का प्रधानतः उपयोग किया है । इनके शिष्य
जगन्नाथशुक्ल तञ्जौर राज्य के सभापण्डित थे । इन्होंने 'भास्कर-विलास' में भास्कर
द्वारा विरचित लगभग चालिस ग्रन्थों का उल्लेख किया है । भास्कर ने जैमिन-सूत्र
के सङ्कर्षण काण्ड की व्याख्या भी की थी । भास्कर ने वेदान्त के अन्तर्गत—
'चण्डभास्कर' । न्यायशास्त्र के अन्तर्गत—'न्याय मण्डन' एवं मीमांसा दर्शन के
अन्तर्गत—'भाट्टचन्द्रोदय' आदि. ग्रन्थों का प्रणयन किया । इनके ग्रन्थो में—
'सेतुबंध' ('नित्याषोडशिकार्णव' की व्याख्या) एवं 'ललितासहस्रनाम' पर लिखी गई,
टीका 'सौभाग्यभास्कर' प्रमुख हैं । अन्य ग्रन्थों में मन्त्रशास्त्र पर उनकी लिखी
रचना—'वरिवस्यारहस्यम्' एवं 'प्रकाश' (टीका) है ।
इनकी पत्नी आनन्दी से पाण्डुरङ्ग नामक पुत्र भी उत्पन्न हुआ । उन्होंने
अपनी पत्नी को भी दीक्षा दी, (श्रीविद्या की दीक्षा दी) एवं उनको
“पदमावत्यम्बिका” नामक नया दीक्षा नाम दिया । उनकी पत्नी का. नाम 'पार्वती'
आता है । (भास्करविलास)
भूमिका १९
आचार्य भास्कर ने शिवदत्तशुक्ल से 'पूर्णाभिषेक' की दीक्षा ग्रहण किया एवं
गुजरात की अपनी यात्रा में वल्लभ संप्रदाय के एक आचार्य को भी पराभूत
किया। आचार्य भास्कर ने बनारस में 'सोमयाग' भी किया ।
इन्होंने अपने प्रिय शिष्य चन्द्रसेन की प्रार्थना पर वाराणसी का त्याग करके
कृष्णा नदी के तट पर रहना प्रारंभ कर दिया । अन्ततः वे कोल प्रदेश गए । वहीं
उनके न्यायशास्त्र के गुरु गङ्गाधरवाजपेयी कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित
तिरुवालङ्गाडु में रहते थे । भास्करराय तञ्जौर के शासक महरथ के द्वारा प्रदत्त एवं
कावेरी के उत्तरी तट पर स्थित “भास्करराजपुरम्” में रहने लगे । वे जीवन के
अन्त में मध्यार्जुन क्षेत्र में रहने लगे थे । यहीं उनका निर्वाण हुआ ।
भास्करराय एवं उनकी पत्नी ने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया एवं अनेक
का जीर्णोद्धार कराया । उन्होंने वाराणसी में 'चक्रेश' नामक मंदिर बनवाया एवं इसे
पाण्डुरङ्ग को दे दिया । उन्होंने अपनी कुलदेवी चन्द्रलाम्बा का श्रीचक्राकार मंदिर
बनवाया । चोलदेश में स्थित 'कहोलेश' मन्दिर के दैनिक, मासिक एवं वार्षिक
उत्सवों को सम्पन्न करने के लिए भी भास्कराचार्य ने व्यवस्था की । कावेरी के तट
पर स्थित भास्करपुर के भास्केश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार इनकी प्रथम पत्नी ने
कराया था ।
आचार्य भास्कर के चमत्कारों के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं ।
श्रीभास्करराय संध्या के समय अपने घर के बाहरी बरामदे में स्तंभ पर पैर रखकर
विश्राम करते हुए शिष्यों को उपदेश दिया करते थे । वेप्पट्टूर का एक सन्यासी
संध्या के समय इसी मार्ग से श्रीमहालिङ्ग स्वामिन् के मन्दिर जाया करता था किन्तु
भास्करराय उसकी ओर न तो ध्यान देते थे और न तो उसे अभिवादन ही करते
थे । एक दिन प्रदोष के समय भास्करराय को महालिङ्गम स्वामिन् के मन्दिर में
उसी स्वामी से भेंट हुई । उन सन्यासी ने भास्करराय से ऋण-शोधन के लिए सभी
के सामने यह कहकर उनकी भर्त्सना की कि इन्होंने गृहस्थ होकर भी अपने से
उच्चतर आश्रम में स्थित मुझ सन्यासी के प्रति शिष्टाचार तक का प्रदर्शन नहीं
किया । भास्करराय ने शान्तभाव से कहा कि यदि मैं इनको दण्डवत कर लेता तो
इनका जीवन सङ्कट में पड़ जाता । उस सन्यासी ने इसका प्रमाण माँगा तो
भास्करराय ने कहा कि आप अपना दण्ड कमण्डल पृथ्वी पर रख दें । सन्यासी
द्वारा दण्ड-कमण्डल पृथ्वी पर रख देने पर जैसे ही भास्करराय ने उस
दण्ड-कमण्डल को दण्डवत किया वैसे ही वह टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ।
उन सन्यासी महोदय ने इसे देखकर भास्करराय से क्षमा-प्रार्थना की ।
शिवाजी के पौत्र (शाहूजी) के सेनापति धनाजीजाधव भास्करराय के प्रिय
शिष्य थे । धनाजी के पुत्र चन्द्रसेनजाधव भी भास्करराय के प्रिय पात्र थे । एक
बार चन्द्रसेनजाधव ने भास्करराय के पास सपत्नीक जाकर उनसे पुत्र सन्तान-न
होने का कष्ट सुनाकर उन्हें पुत्र-प्राप्ति हेतु निवेदन किया । आचार्य भास्करराय ने
आशीर्वाद देते हुए कहा—'मेरे आशीर्वाद से तुम्हारे पुत्र सन्तान जन्म लेगी ।'—
२० वरिवस्यारहस्ये
यह सुनकर अपनी पत्नी के साथ अपने घर लौट गए । चन्द्रसेन की भार्या ने भी
यथासमय गर्भधारण किया । भास्करराय के शिष्य नारायणदेव ने भ्रमराम्बिका देवी
को प्रसन्न करके ‘भालकी’ नामक वाक्सिद्धि प्राप्त कर ली थी । चन्द्रसेन एक बार
जब राजधानी आए तो उन्होंने नारायणदेव की कीर्ति सुनी और उनसे पूछा कि मेरे
कौन सन्तान होगी? नारायणदेव ने कहा— ‘पुत्री होगी ।।' चन्द्रसेन ने नारायणदेव
से पूछा— “आपने यह कैसें कहा कि पुत्री होगी? मेरे गुरु श्रीभास्करराय ने तो
कहा था कि 'तुम्हारे पुत्र उत्पन्न होगा?' नारायणदेव ने भास्कर का नाम सुनते हुए
उन्हें अभिवादन करते हुए कहा "मूर्ख! तूने यह क्या किया? मैं भी तो भास्करराय
का शिष्य हूँ और उन्हीं की अनुकम्पा से मुझे वाक्सिद्धि प्राप्त हुई है । चूँकि तुमने
मेरे कथन के द्वारा गुरु के कथन को मिथ्या एवं व्यर्थ करवा दिया अतः तुमको
इस पाप का फल भी भोगना होगा । अब तो गुरु द्वारा 'पुत्र' होने एवं मेरे द्वारा
'पुत्री' होने की इन दोनों की भविष्यवाणियाँ व्यर्थ हो गईं । अतः अब तेरे न पुत्र,
न पुत्री बल्कि इन दोनों के स्थान में नपुंसक सन्तान जन्म लेगी ।' इसी कथन का
प्रभाव था कि चन्द्रसेन के जो रामचन्द्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ वह नपुंसक हुआ ।
लज्जित चन्द्रसेन ने अपनी चपलता के दोष को अपना अपराध स्वीकार करते हुए
नारायणदेव से ही शाप निवृत्ति का उपाय पूछा और नारायणदेव के ही द्वारा बताए
गए उपाय के आधार पर गुरु भास्करराय की पुनः शरण ग्रहण की । भास्करराय
ने कहा कि मेरा वचन अमोघ है । वे रामचन्द्र को लेकर उन्हें पौरुष प्रदान कराने
हेतु कृष्णा नदी के तट पर स्थित पुण्य क्षेत्र में रहने लगे ।। उन्होंने कृष्णा नदी
के तट पर 'तृचार्य्यदानानुष्ठान' प्रारंभ किया । चूँकि कृष्णा नदी भास्कर के निवास
से अत्यन्त दूर थी इसलिए कृष्णा नदी के तट पर प्रतिदिन पैदल यात्रा के कारण
भास्करराय के पैरों में सूजन आ गई । शिष्यों ने कहा 'गुरुदेव! उचित तो यह है
कृष्णा नदी के तट पर ही—उसके निकट—आप निवास करें । यह सुनकर
आचार्य भास्कर ने कहा—शिष्यों! कृष्णा नदी के प्रवाह को ही मेरे निवास स्थान
के निकट लाओ, मैं उसके निकट क्यों जाऊँ?' शिष्यों ने कहा—'गुरुदेव! आप
सर्वसमर्थ हैं अतः आपके लिए कुछ भी दुष्कर नहीं है ।' भास्करराय ने शिष्यों का
प्रतिवचन सुनकर दूसरे दिन प्रातः वहीं आसन लगाकर सूर्यदेव का आवाहनपूर्वक
पूजन किया । और भास्कर से कहा—'भगवन! रामचन्द्राजाधव को पौरुष प्रदान
कराने हेतु मेरे द्वारा कृष्णा नदी के जल-प्रवाह में तृचार्य दान करने का अनुष्ठान
प्रारंभ किया गया है । चूँकि कृष्णा नदी मेरे निवासस्थान से दूर है अतः कृपया
उसके प्रवाह को मेरे निवास के निकट लाने का कष्ट करें । चूँकि आपको प्रसन्न
करने के लिए मैंने यह अनुष्ठान प्रारंभ किया है अतः आप मेरी सहायता
कीजिए ।।' भगवान सूर्य ने कहा— “क्या आप हिरण्यगर्भ का सङ्कल्प नहीं जानते ।
उन्होंने सृष्टि के आदि में सभी का मार्ग (अध्वा) निश्चित कर दिया है । अतः
उनका मार्ग बदलना संभव नहीं है । आप रामचन्द्र को पौरुष दिलाना चाहते हैं
और यह तो मेरे दृक्पात मात्र से हो जाएगा । अतः तृचार्य्यदानानुष्ठान एवं कृष्णा
के प्रवाह को परिवर्त्तित्त करना—दोनों अनुष्ठान अनावश्यक है ।' भास्कराचार्य ने
or १? It has a vertical stem and a loop at the top, but wait, look at line 16:
It is ॥ followed by a space and then a raised १ or a quote?
Wait, in line 15: ॥ followed by ’ and another ’? Wait, or is line 15: ॥' and line 16: ॥१?
Wait, look at line 16 again: after मेनिरे ॥, there is a character: it has a vertical line, a curve... wait, is that '१?
Wait, look at line 15 again:
भास्कराः ॥' -> wait! In line 15, after भास्कराः, there is ॥ then ’? No, wait, look at line 15:
भास्कराः ॥ then double prime ''?
Wait, could line 15 end with ॥' and line 16 end with ॥१?
Wait, let's look at the quotes:
The quote started where?
Line 13 ends with a dash: पुरुषत्व-हीनता का सारा रोग दूर हो गया—
There is NO opening quote before दशमे!
Wait, is there an opening quote? No.
Then why would there be closing quotes at line 15?
Wait, look