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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 530 में से

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भूमिका १३

मूलतः शाक्त दर्शन की वामाचार शाखा से सम्बद्ध थे । वाराणसी के पण्डितों ने
उन्हें वामाचारी होने की भूल को स्वीकार करके उनका परित्याग करने हेतु उनके
आवास पर जाकर उन्हें समझाने का निर्णय लिया ।
'निर्णयसिन्धु' के प्रणेता कमलाकरभट्ट के पितामह नारायण भट्ट के नेतृत्व में
सङ्गठित विरोधियों के दल के उपर्युक्त निर्णय से अवगत होकर भास्करराय ने उन्हें
स्वनिष्पाद्य 'महायाग' में शास्त्रार्थ हेतु आमंत्रित किया । नारायण भट्ट प्रभृति विद्वान
यज्ञशाला में गए किन्तु भास्करराय की अप्रतिम आध्यात्मिक महानता देखकर
प्रतिवाद करने का साहस तो नहीं जुटा सके तथापि उन्होंने उनसे मन्त्रशास्त्र पर
अनेक प्रश्न किए । भास्करराय ने सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर दिया । इसी
समय कुंकुमानन्द नामक सन्यासी ने पण्डितों से कहा कि आप लोग इन्हें शास्त्रार्थ
में पराभूत नहीं कर सकते क्योंकि स्वतः श्रीदेवी भास्करराय के मुख से बोल रही
हैं । नारायणभट्ट ने इसका प्रमाण माँगा । सन्यासी ने देखा कि भास्करराय के
कंधों पर श्रीदेवी समासीन हैं और भास्करराय के मुख से बोल रही हैं । इस
विचित्र घटना को देखकर सभी पण्डित निराश और लज्जित होकर घर लौट गए ।
उपर्युक्त घटना को ऐतिहासिक काल-क्रम की दृष्टि से देखने पर इसकी
प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है क्योंकि कमलाकरभट्ट ने 'निर्णयसिन्धु' की रचना
विक्रम संवत् १६६८ (ई० सन् १६१२) में की । उनके पितामह नारायणभट्ट
१६१२ से पचास वर्ष पूर्व रहे होंगे किन्तु भास्करराय द्वारा प्रणीत पुस्तकों की
तिथियाँ इससे मेल नहीं खातीं ।
इसके अतिरिक्त, भास्करराय के काल-निर्णय की दिशा में निम्न बिन्दु भी
ध्यातव्य हैं—
१. भास्करराय ने अप्पय दीक्षित का नाम ससम्मान उल्लेखित किया है । वे
१५५४ से १५९४ ई० सन् तक—के मध्य वर्तमान थे ।
२. भास्करराय ने वरदराज के 'मध्यसिद्धान्तकौमुदी' पर टीका लिखी थीं ।
वरदराज भट्टोजी दीक्षित के एवं भट्टोजी दीक्षित स्वयमेव अप्पयदीक्षित के
शिष्य थे ।
३. खण्डदेव की 'भाट्टदीपिका' पर भास्करराय ने टीका लिखी । खण्डदेव के
शिष्य शम्भुभट्ट के कथनानुसार खण्डदेव ने बनारस में वि०सं० १७२२
में इह लीला-संवरण किया । वि०सं० १७२२ को ई० सन् की दृष्टि से
देखा जाय तो यह १६६६ पड़ता है ।
४. वैयाकरण नागोजी भट्ट ई० सन् १६८८ से १७५० के मध्य स्थित थे ।
भास्कररायजी ने उनकी पुस्तक 'मञ्जूषा' एवं उनके द्वारा प्रणीत
'दुर्गासप्तशती' की टीका को अनेक स्थलों पर उद्धृत किया है ।
५. भास्करराय के शिष्य उमानन्दनाथ ने 'नित्योत्सव' की रचना ई० सन्
१७७५ में की थी । रामेश्वर सूरि के मतानुसार भास्करराय ने इस रचना