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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 530 में से

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पृष्ठ 25

भूमिका १९
आचार्य भास्कर ने शिवदत्तशुक्ल से 'पूर्णाभिषेक' की दीक्षा ग्रहण किया एवं
गुजरात की अपनी यात्रा में वल्लभ संप्रदाय के एक आचार्य को भी पराभूत
किया। आचार्य भास्कर ने बनारस में 'सोमयाग' भी किया ।
इन्होंने अपने प्रिय शिष्य चन्द्रसेन की प्रार्थना पर वाराणसी का त्याग करके
कृष्णा नदी के तट पर रहना प्रारंभ कर दिया । अन्ततः वे कोल प्रदेश गए । वहीं
उनके न्यायशास्त्र के गुरु गङ्गाधरवाजपेयी कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित
तिरुवालङ्गाडु में रहते थे । भास्करराय तञ्जौर के शासक महरथ के द्वारा प्रदत्त एवं
कावेरी के उत्तरी तट पर स्थित “भास्करराजपुरम्” में रहने लगे । वे जीवन के
अन्त में मध्यार्जुन क्षेत्र में रहने लगे थे । यहीं उनका निर्वाण हुआ ।
भास्करराय एवं उनकी पत्नी ने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया एवं अनेक
का जीर्णोद्धार कराया । उन्होंने वाराणसी में 'चक्रेश' नामक मंदिर बनवाया एवं इसे
पाण्डुरङ्ग को दे दिया । उन्होंने अपनी कुलदेवी चन्द्रलाम्बा का श्रीचक्राकार मंदिर
बनवाया । चोलदेश में स्थित 'कहोलेश' मन्दिर के दैनिक, मासिक एवं वार्षिक
उत्सवों को सम्पन्न करने के लिए भी भास्कराचार्य ने व्यवस्था की । कावेरी के तट
पर स्थित भास्करपुर के भास्केश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार इनकी प्रथम पत्नी ने
कराया था ।
आचार्य भास्कर के चमत्कारों के विषय में अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं ।
श्रीभास्करराय संध्या के समय अपने घर के बाहरी बरामदे में स्तंभ पर पैर रखकर
विश्राम करते हुए शिष्यों को उपदेश दिया करते थे । वेप्पट्टूर का एक सन्यासी
संध्या के समय इसी मार्ग से श्रीमहालिङ्ग स्वामिन् के मन्दिर जाया करता था किन्तु
भास्करराय उसकी ओर न तो ध्यान देते थे और न तो उसे अभिवादन ही करते
थे । एक दिन प्रदोष के समय भास्करराय को महालिङ्गम स्वामिन् के मन्दिर में
उसी स्वामी से भेंट हुई । उन सन्यासी ने भास्करराय से ऋण-शोधन के लिए सभी
के सामने यह कहकर उनकी भर्त्सना की कि इन्होंने गृहस्थ होकर भी अपने से
उच्चतर आश्रम में स्थित मुझ सन्यासी के प्रति शिष्टाचार तक का प्रदर्शन नहीं
किया । भास्करराय ने शान्तभाव से कहा कि यदि मैं इनको दण्डवत कर लेता तो
इनका जीवन सङ्कट में पड़ जाता । उस सन्यासी ने इसका प्रमाण माँगा तो
भास्करराय ने कहा कि आप अपना दण्ड कमण्डल पृथ्वी पर रख दें । सन्यासी
द्वारा दण्ड-कमण्डल पृथ्वी पर रख देने पर जैसे ही भास्करराय ने उस
दण्ड-कमण्डल को दण्डवत किया वैसे ही वह टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ।
उन सन्यासी महोदय ने इसे देखकर भास्करराय से क्षमा-प्रार्थना की ।
शिवाजी के पौत्र (शाहूजी) के सेनापति धनाजीजाधव भास्करराय के प्रिय
शिष्य थे । धनाजी के पुत्र चन्द्रसेनजाधव भी भास्करराय के प्रिय पात्र थे । एक
बार चन्द्रसेनजाधव ने भास्करराय के पास सपत्नीक जाकर उनसे पुत्र सन्तान-न
होने का कष्ट सुनाकर उन्हें पुत्र-प्राप्ति हेतु निवेदन किया । आचार्य भास्करराय ने
आशीर्वाद देते हुए कहा—'मेरे आशीर्वाद से तुम्हारे पुत्र सन्तान जन्म लेगी ।'—