वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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यह सुनकर अपनी पत्नी के साथ अपने घर लौट गए । चन्द्रसेन की भार्या ने भी
यथासमय गर्भधारण किया । भास्करराय के शिष्य नारायणदेव ने भ्रमराम्बिका देवी
को प्रसन्न करके ‘भालकी’ नामक वाक्सिद्धि प्राप्त कर ली थी । चन्द्रसेन एक बार
जब राजधानी आए तो उन्होंने नारायणदेव की कीर्ति सुनी और उनसे पूछा कि मेरे
कौन सन्तान होगी? नारायणदेव ने कहा— ‘पुत्री होगी ।।' चन्द्रसेन ने नारायणदेव
से पूछा— “आपने यह कैसें कहा कि पुत्री होगी? मेरे गुरु श्रीभास्करराय ने तो
कहा था कि 'तुम्हारे पुत्र उत्पन्न होगा?' नारायणदेव ने भास्कर का नाम सुनते हुए
उन्हें अभिवादन करते हुए कहा "मूर्ख! तूने यह क्या किया? मैं भी तो भास्करराय
का शिष्य हूँ और उन्हीं की अनुकम्पा से मुझे वाक्सिद्धि प्राप्त हुई है । चूँकि तुमने
मेरे कथन के द्वारा गुरु के कथन को मिथ्या एवं व्यर्थ करवा दिया अतः तुमको
इस पाप का फल भी भोगना होगा । अब तो गुरु द्वारा 'पुत्र' होने एवं मेरे द्वारा
'पुत्री' होने की इन दोनों की भविष्यवाणियाँ व्यर्थ हो गईं । अतः अब तेरे न पुत्र,
न पुत्री बल्कि इन दोनों के स्थान में नपुंसक सन्तान जन्म लेगी ।' इसी कथन का
प्रभाव था कि चन्द्रसेन के जो रामचन्द्र नामक पुत्र उत्पन्न हुआ वह नपुंसक हुआ ।
लज्जित चन्द्रसेन ने अपनी चपलता के दोष को अपना अपराध स्वीकार करते हुए
नारायणदेव से ही शाप निवृत्ति का उपाय पूछा और नारायणदेव के ही द्वारा बताए
गए उपाय के आधार पर गुरु भास्करराय की पुनः शरण ग्रहण की । भास्करराय
ने कहा कि मेरा वचन अमोघ है । वे रामचन्द्र को लेकर उन्हें पौरुष प्रदान कराने
हेतु कृष्णा नदी के तट पर स्थित पुण्य क्षेत्र में रहने लगे ।। उन्होंने कृष्णा नदी
के तट पर 'तृचार्य्यदानानुष्ठान' प्रारंभ किया । चूँकि कृष्णा नदी भास्कर के निवास
से अत्यन्त दूर थी इसलिए कृष्णा नदी के तट पर प्रतिदिन पैदल यात्रा के कारण
भास्करराय के पैरों में सूजन आ गई । शिष्यों ने कहा 'गुरुदेव! उचित तो यह है
कृष्णा नदी के तट पर ही—उसके निकट—आप निवास करें । यह सुनकर
आचार्य भास्कर ने कहा—शिष्यों! कृष्णा नदी के प्रवाह को ही मेरे निवास स्थान
के निकट लाओ, मैं उसके निकट क्यों जाऊँ?' शिष्यों ने कहा—'गुरुदेव! आप
सर्वसमर्थ हैं अतः आपके लिए कुछ भी दुष्कर नहीं है ।' भास्करराय ने शिष्यों का
प्रतिवचन सुनकर दूसरे दिन प्रातः वहीं आसन लगाकर सूर्यदेव का आवाहनपूर्वक
पूजन किया । और भास्कर से कहा—'भगवन! रामचन्द्राजाधव को पौरुष प्रदान
कराने हेतु मेरे द्वारा कृष्णा नदी के जल-प्रवाह में तृचार्य दान करने का अनुष्ठान
प्रारंभ किया गया है । चूँकि कृष्णा नदी मेरे निवासस्थान से दूर है अतः कृपया
उसके प्रवाह को मेरे निवास के निकट लाने का कष्ट करें । चूँकि आपको प्रसन्न
करने के लिए मैंने यह अनुष्ठान प्रारंभ किया है अतः आप मेरी सहायता
कीजिए ।।' भगवान सूर्य ने कहा— “क्या आप हिरण्यगर्भ का सङ्कल्प नहीं जानते ।
उन्होंने सृष्टि के आदि में सभी का मार्ग (अध्वा) निश्चित कर दिया है । अतः
उनका मार्ग बदलना संभव नहीं है । आप रामचन्द्र को पौरुष दिलाना चाहते हैं
और यह तो मेरे दृक्पात मात्र से हो जाएगा । अतः तृचार्य्यदानानुष्ठान एवं कृष्णा
के प्रवाह को परिवर्त्तित्त करना—दोनों अनुष्ठान अनावश्यक है ।' भास्कराचार्य ने