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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 530 में से

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१८ वरिवस्यारहस्ये
वाराणसी के पण्डितों ने भास्कर की परीक्षा ली । उन लोगों ने भास्करराय से
चतुःषष्टि योगिनी-चरित्र के विषय में प्रश्न किया । इस प्रश्न का उत्तर भास्कर के
समीप किसी देवता ने उपस्थित होकर दिया ।
आचार्य शङ्कर की ही भाँति भास्कर भी भारत का भ्रमण करते रहे । उनके
तीन लक्ष्य थे—१. शक्ति की उपासना २. वेद एवं आगमों में समन्वय स्थापना
३. मीमांसादर्शन के अनुसार तन्त्र-ग्रन्थों की व्याख्या करना एवं देवस्थानों का
जीर्णोद्धार ।। इन्होंने अनेक वैदिक यज्ञ भी किए । ये श्रौत यज्ञ थे । 'गणेश
सहस्रनाम' के खद्योत भाष्य में काशी के त्रिलोचन घाट के निकट भास्कर द्वारा
किसी यज्ञ करने या कराने का उल्लेख मिलता है—
गंभीर बुध यज्वनस्तनुभवोऽधि वाराणसीं ।
त्रिलोचन पदानुगः कृतमखोऽग्निचिद्भास्करः ॥
आचार्य भास्कर ने गोवा प्रदेश में 'नित्याषोडशिकार्णव' पर 'सेतुबंध' नामक
टीका लिखी । उन्होंने अपनी कुलदेवी 'चन्द्रकला' देवी का श्रीचक्र के आकार का
मन्दिर बनवाया । उनकी पत्नी ने तञ्जौर के निकट भास्करपुर नामक अग्रहार (दान
मे दिया गया गाँव) में शिव और पार्वती की स्थापना की । इन्हें अन्नभण्डार एवं
वैभव की कमी नहीं थी । इसीलिए उनका सत्र-समर्पण, दान आदि सतत् चलता
रहता था ।
राजा चन्द्रसेन जाधव (भोंसले राजाओं का सेनापति) भास्कर का शिष्य था ।
उसके पुत्र के असाध्य रोग को नष्ट करने हेतु सूर्य की आराधना की गई । भास्कर
ने इसी प्रसङ्ग में 'तत्वभास्कर' लिखा ।
भास्कराचार्य बहुत ही अध्ययनशील थे इसीलिए उनके ग्रन्थों में सहस्रों ग्रन्थों
का उल्लेख मिलता है । मीमांसा दर्शन उनका प्रधानविषय या तन्त्रग्रन्थों की
व्याख्या में भास्कर ने उसी शैली का प्रधानतः उपयोग किया है । इनके शिष्य
जगन्नाथशुक्ल तञ्जौर राज्य के सभापण्डित थे । इन्होंने 'भास्कर-विलास' में भास्कर
द्वारा विरचित लगभग चालिस ग्रन्थों का उल्लेख किया है । भास्कर ने जैमिन-सूत्र
के सङ्कर्षण काण्ड की व्याख्या भी की थी । भास्कर ने वेदान्त के अन्तर्गत—
'चण्डभास्कर' । न्यायशास्त्र के अन्तर्गत—'न्याय मण्डन' एवं मीमांसा दर्शन के
अन्तर्गत—'भाट्टचन्द्रोदय' आदि. ग्रन्थों का प्रणयन किया । इनके ग्रन्थो में—
'सेतुबंध' ('नित्याषोडशिकार्णव' की व्याख्या) एवं 'ललितासहस्रनाम' पर लिखी गई,
टीका 'सौभाग्यभास्कर' प्रमुख हैं । अन्य ग्रन्थों में मन्त्रशास्त्र पर उनकी लिखी
रचना—'वरिवस्यारहस्यम्' एवं 'प्रकाश' (टीका) है ।
इनकी पत्नी आनन्दी से पाण्डुरङ्ग नामक पुत्र भी उत्पन्न हुआ । उन्होंने
अपनी पत्नी को भी दीक्षा दी, (श्रीविद्या की दीक्षा दी) एवं उनको
“पदमावत्यम्बिका” नामक नया दीक्षा नाम दिया । उनकी पत्नी का. नाम 'पार्वती'
आता है । (भास्करविलास)