वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका १५
९. मन्त्रशास्त्र—(१) खद्योत (गणपति सहस्रनाम की टीका) (२) चन्द्रलाम्बा
माहात्म्य टीका (३) नाथनवरत्नमाला मञ्जूषा (अपने दीक्षा गुरु की प्रशंसा
में एक स्तोत्र) (४) 'भावनोपनिषद्भाष्य' (शरीर के विभिन्न भागों में
श्रीचक्र का पूजन) (५) 'श्रीसूक्तभाष्य' (६) कौलोपनिषद् भाष्य (७)
त्रिपुरोपनिषद् भाष्य (८) सौभाग्य भास्कर (ललिता सहस्रनाम पर रचित
भाष्य) (९) सौभाग्य चन्द्रोदय (विद्यानन्द नाथ पर प्रणीत 'सौभाग्यरत्नाकर'
पर प्रणीत टीका) (१०) वरिवस्यारहस्य ('प्रकाश' नामक टीका) (११)
त्रिपुरसुन्दरी बाह्य 'वरिवस्या' (त्रिपुरसुन्दरी की बाह्य पूजा का वर्णन) (१२)
रत्नालोक ('परशुरामकल्पसूत्र' की टीका) (१३) गुप्तवती (दुर्गा सप्तशती
पर टीका) (१४) शत श्लोकी (सप्तशती में विद्यमान मन्त्रों के विषय में
प्रणीत) (१५) सेतुबंध (वामकेश्वरतन्त्र की टीका) ।
१०. कोश—'वैदिककोश'
भास्कराचार्य ने लिखा है कि मै 'तन्त्रराज' एवं 'ललितास्तुति' पर टीका
लिखूँगा ।
३. भास्करराय का जीवन परिचय
आचार्य भास्कर ने स्वयमेव अपना परिचय “सौभाग्यभास्कर” में इस प्रकार
दिया है—
“श्रीगंभीर विपश्चितः पितुरभूद्यः कोनमाम्भोदरे
विद्याष्टादशकस्य मर्मभिद्यः श्रीनृसिंहाद् गुरोः ।
यश्च श्रीशिवदत्तशुक्लचरणैः पूर्णाभिषिक्तोऽभवत्
स त्रेता त्रिपुरा त्रयीति मनुते तामेव नाथत्रयीम् ॥” (सौभाग्यभास्कर)
आचार्य भास्कर का ही परवर्तीनाम भासुरानन्दनाथ भी है—“गुरुचरणासनाथो
भासुरानन्दनाथो । विवृतिमति रहस्यां वीरवृन्दैर्नमस्याम् ।। (सौभाग्यभास्कर)
आचार्य भास्करराय शास्त्रोद्धार सत्सम्प्रदायप्रथन एवं तान्त्रिक रहस्यों के
उद्घाटन तथा आगम-निगम में समन्वय-स्थापन के देवदूत थे—
'स्वोपासनासिद्धिरहस्यसारसत्सम्प्रदायप्रथनाय नूनम् ।
आविर्भवन्ति गुरुभास्कराख्या पायादपायात्परदेवतामाम् ॥'
आचार्य भास्कर यथा नाम स्वयं भास्कर थे । वे भास्कर थे—तान्त्रिक साधना
के रहस्यों के अज्ञानान्धकार के; वे भास्कर थे रहस्यपथ की कादम्बरी को विध्वस्त
करने वाली शक्ति के ।
भास्कररायमखिन भारतीय मनीषा के भास्कर थे, भारतीय प्रज्ञा के सुधांशु थे,
भारतीय तान्त्रिक साधना के ध्रुव नक्षत्र थे, वैदुष्य के बृहस्पति थे, सारस्वत साधना
के अप्रतिम अंशुमाली थे, सिद्धान्त और सिद्ध साधना तथा साधना और सिद्धि के
ज्योतिर्मयलोक के द्वितीय शङ्कराचार्य थे ।
२ वरि. भू.