वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 20, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ वरिवस्यारहस्ये
का पुनरीक्षण भी किया था । इन समस्त प्रमाणों से निष्कर्ष निकलता है
कि भास्करराय अठारहवीं सदी के प्रारंभ से १७६८ तक विद्यमान रहे ।
श्रीबटुकनाथजी शास्त्री खिस्ते के कथनानुसार भास्करराय सन् १६७० के
आस-पास आविर्भूत हुए ।
भास्करराय भारतीय मनीषा के भास्कर थे, भारतीय प्रज्ञा के सुधांशु थे,
भारतीय तान्त्रिक-साधना के ध्रुव नक्षत्र थे, वैदुष्य के बृहस्पति थे, सारस्वत-साधना
के अप्रतिम साधक थे और सिद्धान्त और साधना की सङ्गमभूमि के ऊपर
शङ्कराचार्य थे ।
२. भास्करराय की रचनाएँ
भास्करराय ने चालीस से अधिक पुस्तकें लिखी हैं । उनके शिष्य जगन्नाथ ने
'भास्करविलास' नामक अपने ग्रन्थ में इन पुस्तकों का उल्लेख किया है ।१ यथा—
१. ललितानाम साहस्रभाष्यं भाष्यकृतां समः ।
सौभाग्यभास्कराख्यं सभाग्यलब्धं व्यधात्सुधीः ॥
२. कौलोपनिषद्भाष्यं कुलजैः सेव्यो जनैश्चकारासौ ।
त्रैपुरमहोपनिषदं त्रैपुरसिद्धान्तविद्विवव्रे सः ॥ आदि ॥
अनेक विषयों एवं अनेक दर्शनों पर उनकी अनेक पुस्तकें हैं यथा—
१. वेदान्त—(१) 'चण्डभास्कर' (२) 'नीलाचल चपेटिका' (इन दोनों पुस्तकों
की रचना द्वैतवादी ग्रन्थ 'प्रहस्त' के खण्डन हेतु की गई थी ।)
२. मीमांसा—(१) 'वादकौतूहल' (भास्करराय एवं उनके गुरुपुत्र स्वामी शास्त्री
के मध्य हुए शास्त्रार्थ पर आधृत ।) (२) 'भाट्टचन्द्रोदय' (खण्डदेव
विरचित 'भाट्टदीपिका' की टीका)
३. व्याकरण—(१) 'रसिकरंजिनी' (वरदराज के ग्रन्थ 'मध्यसिद्धान्त कौमुदी'
पर प्रणीत ग्रन्थ)
४. न्याय दर्शन—'न्याय मण्डन'
५. छन्दशास्त्र—(१) चण्डभास्कर (छन्दसूत्र पर भाष्य), (२) छन्द कास्तुभ
(३) वृत्तचन्द्रोदय (४) वार्तिकराज (५) मृतसञ्जीवनी ।
६. काव्य—(१) चन्द्रशाला (२) मधुराम्ल (३) भास्कर सुभाषित ।
७. स्मृति—(१) स्मृतितत्त्व (२) सहस्रभोजन खण्ड टीका । (बौधायन के
धर्मसूत्रों पर लिखी गई टीका) (३) 'शङ्खचक्रायन प्रायश्चित्त' (४) एकादशी
निर्णय (५) प्रदोष निर्णय (६) त्रिक भास्कर (७) कुण्ड भास्कर ।
८. स्तोत्र—(१) शिवस्तव (२) देवीस्तव (३) शिव दण्डक (४) शिव स्तोत्र
शतनाम स्तोत्र व्याख्या ।
१. 'भास्करविलास' (भास्कर के शिष्य उमानन्दनाथ 'जगन्नाथ' द्वारा प्रणीत)