सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 18

१२ वरिवस्यारहस्ये
आचार्य भास्कर ने—"अथातो शक्ति जिज्ञासा" को अपना मूल मन्त्र स्वीकार करके
इसी दिशा में यावज्जीवन साधना की।
'वरिवस्यारहस्यम्' नामक प्रस्तुत आचार्यश्री की रचना जो कि मूलतः मन्त्र-
शास्त्र की रचना है—मूलतः गायत्री एवं पञ्चदशी मन्त्रों की एकात्मता, उसके पन्द्रह
अर्थों के प्रतिपादन, जीव-ब्रह्मैक्यवाद, परिणामवाद, नादोपासना, उद्गीथो- पासना,
प्रकाश-विमर्शवाद, शब्दशक्तिवाद, सर्वचिन्मयवाद एवं सर्वशक्तिवाद आदि सिद्धान्तों
के प्रतिपादन में ही केन्द्रित हैं। यह मन्त्रशास्त्र के साङ्गोपाङ्ग विवेचन की ओर
उन्मुख नहीं है।
"वरिवस्यारहस्यम्" के रचनाकार आचार्य श्रीभास्करराय एवं उनके इस
ग्रन्थरत्न का परिचय दिये बिना उनके उक्त ग्रन्थ की व्याख्या एवं उसका
रहस्योद्घाटन ग्रन्थकार के प्रति अन्याय होगा। इसी दृष्टि से संक्षेप में इन पर
प्रकाश डाला जा रहा. है।
१. भास्करराय और उनका आविर्भाव-काल
आचार्य भास्करराय या भासुरानन्दनाथ अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में
आविर्भूत श्रीविद्या सम्प्रदाय के ऐसे प्रख्यात एवं सिद्ध शाक्त दार्शनिक थे जिनके
विषय में केवल यही कहा जा सकता है कि—"न भूतो न भविष्यति ॥"
आचार्य भास्करराय तान्त्रिक होते हुए भी श्रौतमार्गी थे, शाक्त होते हुए भी
शैवमार्गी थे, गृहस्थ होते हुए भी सन्यासियों से भी महत्तर थे, निवृत्तिमार्गी होते हुए
भी लोकसंग्रही थे, और साधक होते हुए भी सिद्ध थे और रहस्य-जगत् के महान्
रहस्य थे। आचार्य भास्कर ने जो 'सौभाग्यभास्कर' एवं 'सेतुबंध' टीकाएँ लिखीं वे
तान्त्रिक साधना के विश्वकोष हैं।
उन्होंने शाक्त मत के रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए आजीवन उसका
प्रचार-प्रसार किया, शास्त्रार्थ किया एवं दर्जनों ग्रन्थों की रचना की। आचार्य
भास्करराय का आविर्भाव सत्रहवीं शताब्दी के अवसान एवं अठारहवीं शताब्दी के
पूर्वार्द्ध में हुआ था। उन्होंने अपनी स्व-रचित रचनाओं में (इन रचनाओं का)
रचना-काल भी उल्लिखित किया है। उन्होंने 'ललितासहस्रनाम' पर प्रणीत अपने
भाष्य का समापन सम्वत् १७८५ में कालयुक्त की आश्विन-शुक्ल-नवमी को किया
था और 'सेतुबन्ध' नामक अपनी रचना का समापन शक संवत् १६५५ (ई० सन्
१७३३) के शिवरात्रि को और सप्तशती पर प्रणीत अपनी टीका 'गुप्तावती' की
रचना सम्वत् १७८७ के 'प्रमोद' नामक वर्ष में चिदम्बरम में की थी। 'ललिता
सहस्रनाम' एवं 'सेतुबन्ध' (ई० सन् की दृष्टि से) क्रमशः १७२८ एवं १७४१ में
लिखे गए थे किन्तु 'काल-युक्त' एवं 'प्रमोद' की दृष्टि से इनकी रचना क्रमशः
१७३८-३९ एवं १७५०-५१ में हुई थी। दोनों में दस वर्षों का अन्तर है।
निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित 'ललितासहस्रनाम भाष्य' की भूमिका में कहा
गया है कि यद्यपि भास्करराय ज्ञान की समस्त शाखाओं में निष्णात थे किन्तु वे