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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 530 में से

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पृष्ठ 17

भूमिका
भारतीय आध्यात्मिक साधना एवं दर्शन के इतिहास में आचार्य शङ्कर के
अनन्तर यदि किन्हीं अन्य अनुत्तर, अप्रतिम एवं अद्वितीय विभूतियों का नामोल्लेख
किया जा सकता हो तो उनमें आचार्य श्रीभास्करराय मखिन या भासुरानन्दनाथ का
नाम सर्वोपरि होगा । वैदुष्य के इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों से लिखा
जाएगा ।
आचार्य भास्कर बहुश्रुत, बहुज्ञ, अपरिमेय ज्ञान-शाखाओं के अतुल्य विपश्चित,
अद्भुत मनीषी एवं ज्ञान-रत्नाकर थे । आचार्य शङ्कर जो कार्य अपूर्ण छोड़कर चले
गए उसे उन्होंने पूर्ण किया । आचार्य शङ्कर ने ब्रह्माद्वैतवाद की तो प्राण-प्रतिष्ठा की
और 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति', 'सर्वंखल्विदं ब्रह्म', 'अहं ब्रह्मास्मि' 'तत्त्वमसि'
का शङ्खनाद करते हुए इस सत्य सिद्धान्त को बद्धमूल करके उसे पल्लवित,
कुसुमित एवं सुरभित भी किया और डिण्डिम नाद करते हुए कहा—
'श्लोकार्द्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीव ब्रह्मैव नापरः ॥'
किन्तु अपनी इस अनुभूति को रूपायित नहीं कर पाये कि—
'सत्यपि भेदापगमेनाथ तवैवाहं न मामकीनस्त्वं ।
सामुद्रो वै तरङ्गः न तु तारङ्गो वै समुद्रः ॥'
"शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं"—की अद्वैतानुभूति करते हुए भी वे—
"अहं देवी न चान्योस्मि" का शङ्खनाद नहीं कर सके । वे शिवोपासक होकर भी
यह तो कह गए कि—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥१'
किन्तु फिर भी वे शक्त्याद्वैतवाद की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं कर सके । ब्रह्म एवं
शिव की महत्ता के गायक आचार्य शङ्कर ब्रह्म एवं शिव में इतने रमे कि वे शक्ति
की ब्रह्मरूपता, वेदों में शक्तिवाद एवं शक्ति-साधना की दिशा में, अधिक समय दे
ही नहीं पाये । इसी अपूर्ण कार्य को आचार्य भास्करराय ने पूर्ण किया । आचार्य
शङ्कर ने 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' को मूल मन्त्र मानकर उसकी साधना की जबकि
१. सौन्दर्यलहरी