वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 530 में से
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भारतीय ज्ञानान्तरिक्ष के प्रचण्ड भास्कर, साधना 'नन्दन' के पारिजात,
वैदुष्य के बृहस्पति एवं भारती के वरदान आचार्य भास्करराय मखिन् द्वारा
प्रणीत यह मन्त्रशास्त्रीय ग्रन्थ “वरिवस्यारहस्यम्”' ‘प्रकाश’ एवं ‘सरोजिनी’ के
साथ विद्वान् पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है ।
भारतीय चिन्तन “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” की अचिन्त्य
भावभूमि एवं अज्ञेय 'परमपद' की ओर सदा से आकृष्ट रहा है । वह सदा से
रहस्योन्मुख रहा है । 'वरिवस्यारहस्यम्' भी रहस्य के धाम की तीर्थ यात्रा है ।
यह मन्त्र-जगत के रहस्यों का अन्वेषण है ।
मानवीय मनीषा, धिषणा, तर्क, प्रज्ञा एवं जिज्ञासा, सम्प्राप्त, संदृष्ट,
संश्रुत, सुविज्ञात, अधिगत एवं आगत (वर्तमान) से कभी संतुष्ट नहीं हुई
इसीलिए वह अनादिकाल से अप्राप्त, अदृष्ट, अश्रुत, अज्ञात, अनधिगत एवं
अनागत के संधान में तल्लीन रही है । वह प्राप्त से अप्राप्त, गम्य से
अगम्य, ज्ञात से अज्ञात, चिन्त्य से अचिन्त्य, ग्राह्य से अग्राह्य, दृष्ट से
अदृष्ट, श्रुत से अश्रुत एवं अधिगत से अनधिगत को जानने एवं उसका
साक्षात्कार करने का सतत प्रयास करती रही है । उसमें अदृश्य, अचिन्त्य,
अगम्य, अज्ञेय एवं अतर्क्य परात्पर तत्त्व एवं उसके रहस्यों के प्रति
अनन्तकाल से जिज्ञासा रही है । इसी कारण वह सृष्टि की प्रथम रश्मि के
समय से ही जानना चाहती रही है कि—
‘अविज्ञातं केन विजानीयात् ?’ ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम ?’ “हिरण्य-
गर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम ? यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इन्द्राजा जगतो
बभूव । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम । येन द्यौरुग्रा
पृथिवी च दृढ़ा येन स्व स्तंभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः
कस्मै देवाय हविषा विधेम । 'य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं
यस्य देवाः । यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।”१ वह
जानना चाहती है कि—‘केनेषितं पतति प्रेषितंमनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति
१. यजुर्वेद