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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 530 में से

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पृष्ठ 23

भूमिका १७
गंभीरराय ने भास्कर को राजकार्य में लगाना चाहा किन्तु किसी सिद्ध महात्मा
का ओदश मानकर उन्होंने भास्करराय को मनोनुकूल अध्ययन एवं धर्मरक्षा में ही
प्रवृत्त रहने की प्रेरणा दी ।
जगद्गुरु भगवान् शङ्कराचार्य की सांप्रदायिक परम्परा में द्विविध शिष्य-प्रणाली
थी—१. संन्यासी २. गृहस्थ । भास्करराय ने गृहस्थ शिष्य परम्परा में सम्प्रदाय की
रक्षा करने का बीड़ा उठाया । चूँकि आचार्य शङ्कर अल्पजीवी थे अतः उनके द्वारा
दो कार्य पूर्ण नहीं हो पाये—१. शिवोपासना, एवं २. शक्त्योपासना का दृढ़ता से
प्रतिपादन ।। आचार्य भास्कर ने शङ्कर परम्परा एवं शक्ति-दर्शन दोनों को अभूतपूर्व
रूप में उपस्थापित किया । शिवोपासना का प्रतिपादन एवं उसकी प्राणप्रतिष्ठा का
महनीय कार्य तो श्रीअप्पय दीक्षित ने किया किन्तु शक्त्योपासना की सशक्त
प्राणप्रतिष्ठा आचार्य भास्कर ने की ।
गुरु नृसिंहाध्वरि के पुत्र महामीमांसक श्रीस्वामी शास्त्री (गुरुबंधु) एवं भास्कर
दोनों ने मिलकर, आंध्रप्रदेश के राजा मल्लिकार्जुन की इच्छानुसार 'पूर्व मीमांसावाद
कुतूहलम्' नामक ग्रन्थ की रचना की ।
भास्कर के गुरु श्रीनृसिंहाध्वरि ने भास्करराय को, तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ श्रीविद्या
के उपासक एवं अविच्छिन्न शाङ्कर परम्परा के आचार्य (नागर ब्राह्मण, आहिताग्नि
एवं सूरत के निवासी) श्रीशिवदत्तजी शुक्ल के पास श्रीविद्या का अध्ययन करने हेतु
भेजा । श्रीशिवदत्तजी उच्चकोटि के साधक एवं तपस्वी थे । भास्करराय उनके पास
जाकर उनसे अध्ययन करने लगे । इसी बीच वल्लभ सम्प्रदाय का कोई आचार्य
वहाँ आकर शाङ्कर मत के विरुद्ध प्रचार-प्रसार करने लगा । स्थानीय पण्डितों ने
उनसे शास्त्रार्थ करने हेतु शुक्लजी को आमंत्रित किया किन्तु वे वृद्ध होने के
कारण नहीं जा सके किन्तु भास्कर के निवेदन पर उन्हें आशीर्वाद देकर शास्त्रार्थ
करने भेज दिया । भास्कर ने उस आचार्य को पराजित करके शाङ्करमत की
विजयपताका फहरायी । इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीशुक्लजी ने भास्कर को
सर्वोच्च दीक्षाएँ देकर कृतार्थ किया । यह घटना भास्कर के शिष्य जगन्नाथशुक्ल
(उमानन्दनाथ) ने अपने ग्रन्थ—'भाष्करविलास' में इस प्रकार उल्लेखित किया है—
“शिवदत्तशुक्लचरणासादितपूर्णाभिषेकसाम्राज्यः ।
गुर्जरदेशे विदधे जर्जरस्थैर्यं स वल्लभाचार्यम् ॥”
मध्व सम्प्रदाय के एक आचार्य ने भास्करराय को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती
दी । भास्कराचार्य ने एक शर्त रक्खी कि “जो पक्ष हारेगा वह विजयी पक्ष को
अपनी कन्या प्रदान करेगा ।।” पराजित होकर मध्व संप्रदाय के उस आचार्य ने
अपने भाई की पुत्री के साथ भास्कर का विवाह करा दिया । इस घटना का भी
उल्लेख 'भास्कर-विलास' में किया गया है—
“वादेमस्करिणं माध्वं व्याधूयामुष्य बंधुजाम् ।
पार्वतीं व्यवहृत कीर्त्या समं सत्यप्रतिभवः ॥”