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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 530 में से

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पृष्ठ 22

१६ वरिवस्यारहस्ये
भास्करराय सत्रहवीं सदी के अन्त में आविर्भूत हुए । इनका जन्मस्थान भागा
नगरी (हैदराबाद) है । इनके पिता श्रीगंभीरराय भारती थे जो कि अनेक शास्त्रों के
प्रकाण्ड विद्वान, आहिताग्नि एवं बीजापुर राज्य के दीवान थे । बीजापुर के यवन
राजा ने श्रीगंभीररायजी से महाभारत का आख्यान सुना एवं उनके अनुरोध पर
गंभीररायजी ने संपूर्ण महाभारत का फारसी में अनुवाद कर डाला । इसी महनीय
कार्य के कारण उनको 'भारती' कहा जाने लगा । श्रीगंभीररायजी ने अपने
‘विष्णुनाम प्रसूनाञ्जलि” नामक ग्रन्थ में अपना वंश-परिचय दिया है । इसके
अनुसार वे विश्वामित्र गोत्रीय थे और इनके मूलपुरुष का नाम था—एकनाथ ॥
उनके पुत्र पण्डित तुकदेव एवं पौत्र यमाजि पण्डित थे । यमाजि पण्डित की भार्या
चन्द्रमाम्बा से गंभीरराय उत्पन्न हुए । यद्यपि गंभीरराय भागवत संप्रदाय के अनुवर्ती
थे तथापि श्रीवत्सगोत्रीय अपने मामा श्रीआगमाचार्य नारायण पण्डित से इन्होंने
आगमशास्त्र का सम्यक् अध्ययन करके उनसे दीक्षा ली थी । गंभीरराय बीजापुर में
रहा करते थे । वे किसी कार्यवश सपत्नीक हैदराबाद गए । वहीं कोणमाम्बा के
गर्भ से भास्करराय का द्वितीय पुत्र के रूप में जन्म हुआ । चूँकि गंभीरराय का
प्रथम पुत्र तीव्र बुद्धि का नहीं था अतः कोणमाम्बा ने भगवान भास्कर की
तीव्रोपासना की । इसी तपस्या के फलस्वरूप भास्करराय जैसा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न
हुआ । गंभीरराय ने भास्कर को बाल्यावस्था में ही 'सारस्वतकल्प' के अनुसार
सरस्वतीमन्त्रपूत ब्राह्मीलता का सेवन कराया जिससे उनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी हो
गई । उनका यज्ञोपवीत संस्कार काशी में हुआ । इसके अनन्तर उन्होंने पाँच वर्षों
की अवस्था से ही अपनी ऋक् शाखा का अभ्यास एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन
किया ।१
अत्यन्त तेजस्वी एवं मेधावी होने के कारण भास्कर से (बाल्यकाल से ही)
जो भी बातें करता वह प्रभावित हो जाता था । इसी मध्य आंध्रप्रदेश के अशेष
शास्त्र-निष्णात, मूर्धन्य विद्वान श्रीनृसिंहाध्वरि गंभीरराय के घर पधारे । नृसिंहाध्वरि ने
भास्कर की प्रतिभा देखकर उन्हें अध्ययन करने के लिए अपने पास भेजने का
परामर्श दिया जिसे कि पिता ने स्वीकार कर लिया । भास्कर ने इनके घर रहकर
अशेष विद्याओं का सम्यक् अध्ययन किया । उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है—
“विद्याष्टदशकस्य मर्मविदभूद्यः श्रीनृसिंहो गुरोः ॥”
भास्कर अष्टादश विद्याओं के पारगामी विद्वान हुए । भास्कर ने अन्य आचार्यों
से भी अध्ययन किया, यथा—रूक्मण्णा पण्डित से छन्द एवं अलङ्कार शास्त्र एवं
गङ्गाधर वाजपेयी से नव्यन्यायशास्त्र का अध्ययन किया । उन्होंने १७-१८ वर्ष की
अवस्था तक अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर डाला । यथा—आयुर्वेद, धनुर्वेद एवं
गणित आदि का ॥ आचार्य गङ्गाधर बाजपेयी ने उन्हें गौड़ तर्कशास्त्र में निष्णात
कर दिया ।
१. कृष्णास्वामी शास्त्री—'वरिवस्यारहस्यम्' की भूमिका