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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 530 में से

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दो शब्द ७
नादांश आच्छन्न है अतः इस स्तर पर मन्त्र का उदय ही नहीं होता ।
‘मध्यमा भूमि’ ही मन्त्रमयी भूमि का प्रथम सोपान है क्योंकि ‘मध्यमावाक्’
मन्त्ररूप में ही वाक् को प्रकाशित करता है । ‘स्मृति-परिशुद्धि’ द्वारा साङ्कर्य
का परिहार होने पर ही वैखरी से ‘मध्यमा भूमि’ में प्रवेश होता है—मन्त्रभूमि
में पदार्पण होता है । ‘पश्यन्ती’ दिव्य वाक् है । ‘परावाक्’ चिन्मय एवं
अव्यक्त है । ‘मध्यमा’ का विस्तार हृदय तक, ‘पश्यन्ती’ का नाभि तक एवं
‘परा’ का मूलाधार तक है । शब्द से शब्दातीत की यात्रा ही मन्त्र का लक्ष्य
है और यह यात्रा शब्दब्रह्म से प्रारम्भ होकर निःशब्द (‘अशब्दम-
स्पर्शमरूपमव्ययम्’) तक चलती है । इसके मध्य में इसके अनेक पड़ाव हैं ।
‘वरिवस्यारहस्यम्’ में शब्दराज्य से शब्दातीत एवं इन दोनों के मध्य अवस्थित
विभिन्न पड़ावों के रहस्यों को उद्घाटित किया गया है और मन्त्र-साधना या
वरिवस्या के अगम्य रहस्यों पर प्रकाश डाला गया है । इसीलिए इस ग्रन्थ
का नाम “वरिवस्यारहस्यम्” है । ‘वरिवस्या’ मन्त्र-साधना एवं जप के संदर्भ
में आचार्य भास्कर ने अत्यन्त वैज्ञानिक दृष्टि प्रस्तुत की है । उनकी दृष्टि को
इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—
(१) सर्वोच्च साधना—ब्रह्मसद्भाव ⎤ “उत्तमो ब्रह्मसद्भाव ध्यान-
(२) मध्यम साधना—ध्यानभाव ⎥ भावस्तु मध्यमः । स्तुतिर्जपोधमो
(३) अधम साधना—स्तुति जप ⎦ भावो बाह्यपूजाऽधमाधमा ॥”
(१) उत्तमाअवस्था—सहजावस्था ⎤ “उत्तमा सहजावस्था मध्यमा
(२) मध्यमावस्था—ध्यान-धारणा ⎥ ध्यान धारणा । जपस्तुतिः स्याद-
(३) अधमावस्था—जप-स्तुति ⎥ धमा होमपूजाधमाधमा ॥”
(४) अधमाधमावस्था—होम, पूजा ⎦
‘चिन्ता’
(१) उत्तमा—तत्त्वचिन्ता ⎤
(२) मध्यमा—जप-चिन्ता ⎥ उत्तमा तत्वचिन्तास्याज्जप चिन्ता
(३) अधमा—शास्त्र-चिन्ता ⎥ तु मध्यमा । शास्त्रचिन्ताधमा ज्ञेया
(४) अधमाधमा—लोक-चिन्ता ⎦ लोक चिन्ताधमाधमा ।।'
(१) कोटि पूजा = १ स्तोत्र ⎤
(२) कोटि स्तोत्र = १ जप ⎥ ‘पूजा कोटि समं स्तोत्रं स्तोत्र
(३) कोटि जप = १ ध्यान ⎥ कोटि समो जपः । जपकोटि समं
(४) कोटि ध्यान = १ लय ⎦ ध्यानं ध्यान कोटि समो लयः ॥’