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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 530 में से

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पृष्ठ 12

६ वरिवस्यारहस्ये
युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उदेवो युनक्ति ॥'१ 'किं
कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन
सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥२ भगवन्कुत एष प्राणो जायते
कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते केनोत्क्रमते कथं
बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ?३ दर्शनशास्त्र इसी 'जिज्ञासा' (Curiosity)
का फल है—निष्पत्ति है—निगमन है । वह 'जिज्ञासा' चाहे 'अथातो ब्रह्म
जिज्ञासा' के रूप में वेदान्तियों के मन में उठे अथवा 'अथातो शक्ति जिज्ञासा'
के रूप में शाक्त दार्शनिकों के हृदय में उठे । वह जिज्ञासा चाहे वेदान्तियों के
'ब्रह्म' की हो चाहे शक्त्योपासकों के 'शक्ति' की हो, चाहे वह मीमांसको के
'कर्म' की हो और चाहे वह भक्तों के 'भक्ति' की हो । 'कार्य' से 'कारण',
'स्थूल से सूक्ष्म', विचार से विचारातीत, मन से मनसातीत, बुद्धि से
बुद्ध्यातीत, ज्ञात से अज्ञात, भौतिक से अभौतिक, इहलोक से परलोक, शब्द
से शब्दातीत, बाह्य से आभ्यन्तर एवं विज्ञात से रहस्य की ओर जाने की
आकांक्षा एवं उसके रहस्यों की जिज्ञासा मानवीय मन की सहज प्रवृत्ति रही है
इसीलिए तो वह जगत के असत्, तम एवं मृत्यु से सत्, ज्योति एवं
अमृतत्व की ओर जाने की आकांक्षा रखता हुआ कह उठता है—'असतो मा
सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय ।।' वह असत् से परे सत्
की ओर, तम से परे ज्योति की ओर एवं मृत्यु से परे अमृतत्व की ओर
बढ़ना चाहता है । इसी प्रकार आचार्य भास्कर भी विज्ञात 'वरिवस्या' से
अविज्ञात 'वरिवस्या रहस्य' की ओर बढ़ना चाहते हैं । आचार्य भास्कर के
मन में भी प्रश्न उठता है कि यदि शङ्कर कहते हैं कि “जपात्
सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्न संशयः” फिर जप करने से सिद्धि क्यों नहीं
होती । 'वरिवस्या' का निष्पादन करने पर भी 'मन्त्र' सिद्ध क्यों नहीं होता ?
उपासकों, भक्तों एवं साधकों के मन में भी ये जिज्ञासाऐं अवश्य उठती होंगी ।
इसी शंका, तर्क, संशय एवं जिज्ञासा के समाधान के लिए आचार्य
भास्करराय ने 'वरिवस्या' नहीं प्रत्युत वरिवस्या के 'रहस्य' पर 'वरिवस्या-
रहस्यम्' नामक ग्रन्थ लिखा ।
भास्कर कहते हैं कि 'मन्त्र' चिद्रश्मिमय हैं—'चिन्मरीचि' हैं—'पूर्णाहन्ता-
नुसंध्यात्मा' हैं इसीलिए कहा गया है— “मन्त्राश्चिन्मरीचयः पूर्णाहन्तानुसंध्यात्मा
स्फूर्जन्मननधर्मतः । संसारक्षयकृत्त्राण धर्मतो मन्त्र उच्यते ।।” वैखरी भूमि में
चिद्भाव गुप्त है । इसीलिए वैखरी वर्णों की मन्त्रमयता स्वीकार नहीं की जाती ।
'मन्त्र' नादात्मा हैं वैखरी वर्णों में नादाभाव है । चूँकि वैखरी में चिदंश एवं
१. केनोपनिषद २. श्वेताश्वतरोपनिषद
३. प्रश्नोपनिषद