बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
दर्पणाधिकरण ] [ ५७
पिञ्जलादर्पणश्चैव गुहागर्भव्यदर्पणः ।
रौद्रीदर्पण इत्येते(इत्येतत् ?)सप्तोक्ता यानदर्पणा ॥६॥
तेषु विश्वक्रियादर्श इति यत्सम्प्रकीर्तित ।
तद्यानपीठोर्ध्वमुखस्थाने आवर्तनक्रमात् ॥ ७ ॥
प्रपञ्चे प्राणिभिस्सर्वैर्यत्कर्म कृत भवेत् ।
तत्साक्षाद् वीक्षणार्थ यद् यन्त्रेणा स्थापितो भवेत् ॥८॥
विश्वक्रियादर्श इति तमेवाहुर्मनीषिण ।
विश्वक्रियादर्पण, शक्त्याकर्षणदर्पण, वैरुथ्यदर्पण, कुण्टिणीदर्पण, पिञ्जलादर्पण, गुहागर्भदर्पण,
रौद्रीदर्पण ये सात विमान के दर्पण कहे हैं। उनमें विश्वक्रियादर्श जो कहा है उसे विमान के पीठस्थान
के उपस्थान में आवर्तन क्रम से मनुष्यों द्वारा प्रपञ्च—सहार के निमित्त जो जो कार्य किया गया हो उसे
साक्षात् देखने के लिए चालकों की ओर से स्थापित किया जाना चाहिए, इसे विश्वक्रियादर्श मनीषियों
ने कहा है ॥ १-८ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
सत्त्वद्वय शुण्डिलकद्वय च गृध्रास्थिमेक वरपारपञ्चकम् ।
सिङ्घोरणीपादनखद्वय तथा शुद्धाभ्रषट्क वरशोणपञ्चकम् ॥ ९ ॥
मुक्ताष्टक सौम्यमीननेत्रमष्टादशाङ्गारकसत्त्वमेकम् ।
सर्पत्वगञ्जनिकत्रयं तथा मातृणषट्क वरशर्करा दश ॥ १० ॥
क्षाराष्टक नागचतुष्टय च फेनद्वय गारुडवल्कलत्रयम् ।
वैणव्यक सप्त तथा सुशोधित वैराजश्वेतोदुम्बरपञ्चक च ॥ ११ ॥
एतानि संशोध्य यथाविधि क्रमात् सन्तोप्य चञ्चुपुटमूषिकायाम् ।
सम्पूर्य चण्डोदरकुण्डमध्ये विन्यस्य कव्याष्टशतोष्णवेगत ॥ १२ ॥
सङ्गालयित्वा करदर्पणास्ययन्त्रोर्ध्वनालस्य मुले प्रपूरयेत् ।
एव कृते विश्वक्रियारूपदर्पणो भवेत् सुशुद्धो दृढसूक्ष्मरूप ॥१३॥
सत्त्व ?—क्षार—सज्जीखार ? २ भाग, शुण्डिलक ?—हाथीशुण्डावृत्त २ भाग ?, गृध्रास्थि—
गिद्ध की हड्डी १ भाग, वरपार—शुद्धपारा ५ भाग, सिङ्घोरणी ? के पैर का नाखून २ भाग, शुद्ध अभ्रक
६ भाग, वरशोण—अच्छा सिन्दूर ५ भाग, मोती ८ भाग, सौम्यक मीन नेत्र ? १८ भाग, अङ्गार का
सत्त्व १ भाग, सर्पत्वक्—केंचुली ८ भाग, आञ्जनिक—सुरमा ३ भाग, मातृण ?—काणतृण ?—गन्ध-
तृण ? ६ भाग, अच्छा पाषाण चूरा १० भाग, क्षार—सुहागा ८ भाग, नाग—सीसा ४ भाग, फेन—
समुद्रफेन २ भाग, गरुड वल्कल ?—गरुड़शालि का वल्कल—छिलके ? ३ भाग, वैणव्यकं—वंशलोचन ७
भाग, शोधितवैराज श्वेत उदुम्बर का दूध या गोंद या क्षार ? ५ भाग, इन्हें क्रम से यथाविधि शोध कर
तोल कर चञ्चुपुट मूषिका—बोतल में भर कर चण्डोदर कुण्ड के मध्य रख कर ८ दर्जे की उष्णता के
वेग से गला कर बड़े दर्पण के मुख्ययन्त्र के उपरिनाल के मुख में भर दे। ऐसा करने पर विश्वक्रियादर्पण
सुशुद्ध दृढ़ सूक्ष्म हो जावे ॥ ६-१३ ॥
५८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणनिर्णयः—अथ शक्त्याकर्षण दर्पण का निर्णय देते हैं—
उक्त्वा विश्वक्रियादर्शस्वरूपं शास्त्रतःस्फुटम् ।
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणस्सन्निरूप्यते ॥ १४ ॥
विश्वक्रियादर्श—विश्वक्रियादर्पण का स्वरूप शास्त्र से स्फुट कह कर अथ शक्त्याकर्षण दर्पण
निरूपित किया जाता है ॥ १४ ॥
तदुक्तं दर्पणकल्पे—वह कहा है दर्पणकल्प ग्रन्थ में—
आकाशपरिधिकेन्द्रस्थितयानपथि क्रमात् ।
देहनाशकरा या स्युस्त्रिवर्गविषशक्तयः ॥ १५ ॥
आकृष्य तास्स्वशक्त्या यन्नाशयति स्वभावतः ।
तच्छक्त्याकर्षणादर्श इति शास्त्रान्निरूपितः ॥ १६ ॥
आकाश परिधि के केन्द्र में स्थित विमान के मार्ग में क्रम से देह को नष्ट करने वाली जो
तीन विषशक्तियां हैं उन्हें अपनी शक्ति से स्वभावत खींच कर जो नष्ट करता है वह शक्त्याकर्षण-
दर्पण शास्त्र से निरूपित किया गया है ॥ १५-१६ ॥
धुण्ढिनाथोपि—धुण्ढिनाथ ने भी कहा है—
वातार्काश्वन्यशास्त्रे त्रिवर्गा इति वर्णिताः ।
प्रतिवर्गसमुद्भूता यन्तॄणां देहनाशकाः ॥ १७ ॥
द्वाविंशदुत्तरशतसंख्याका विषशक्तयः ।
तास्समाहृत्यनिशेषं स्वशक्त्या यत् पिवेत् क्रमात् ॥ १८॥
तच्छक्त्याकर्षणादर्श इति नाम्ना प्रकीर्तितः ॥ १६ ॥
वात सूर्यकिरण अग्नि ये तीन वर्ग शास्त्र में कहे हैं । प्रतिवर्ग में उठे हुए चालक यात्रियों के
देह के नाशक हैं । १२२ संख्या वाली विष शक्तियां हैं उन्हें अपनी शक्ति से लेकर सर्वथा क्रम से जिससे
पी लेता है इससे वह शक्त्याकर्षण दर्पण नाम से कहा गया है ॥ १७-१६ ॥
पराङ्कुशोपि—पराङ्कुश में भी कहा है—
आकाशपरिधिकेन्द्रे ऽप्वाताकीश्वग्निसम्भवाः ।
द्वाविंशदुत्तरशतसंख्याका विषशक्तयः ॥ २० ॥
विमानपथसन्मध्यन्तं प्रवहन्ति विशेषतः ।
विमानचारिणां देहमारका इति तास्स्मृताः ॥ २१ ॥
उक्तस्स्यात् तद्विनाशार्थं शक्त्याकर्षणदर्पण इति ।
एवमुक्त्वा तस्य नामनिर्णयंशास्त्रतस्स्फुटम् ॥ २२ ॥
मथैव तत्पाकविधिः किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ २३ ॥
† केन्द्रे ऽपु वातः=केन्द्रे ऽप्वातः—पुरातनसन्धिः ।
नेत्रान्तमगलिततद्रस? Wait, let's look at the letter: ने त्रा न्त म ग लि त त द्र स? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look at the letter: नेत्रान्तमगलिततद्रस? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look at the letter: नेत्रान्तमगलिततद्रस? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look at the letter: नेत्रान्तमगलिततद्रस? Yes, it is नेत्रान्तमगलिततद्रस! Wait, let's look at the Sanskrit word: नेत्रान्तमगलिततद्रस? No, नेत्रान्तगलिततद्रस? Let's look
६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सप्तविंशद्विकाराणि शास्त्रोक्तानि यथाक्रमम् ।
तत्स्वरूपप्रबोधार्थं संग्रहेण निरूप्यते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार यथाशास्त्र शक्त्याकर्षण दर्पण कहकर वैरूप्यदर्पण अब यहां यथामति कहूँगा। अपने
विमान को रोकने को परविमान से क्रोध भरे भय मूर्छा आदि नाना उपायों में कुशल शत्रुजन आ गये हों
उनकी विस्मृति को जो देता है वह वैराजित दर्पण—वैरूप्यदर्पण विद्वानों द्वारा कहा गया है। शास्त्रोक्त
२७ विकार यथाक्रम हैं उनके स्वरूप प्रबोधनार्थ संक्षेप से निरूपित किया जाता है ॥ २६--३२ ॥
तदुक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डे—यह कहा है सम्मोहनक्रियाकाण्ड में—
अग्निवाताम्ब्वशनिविद्युद्धूमसागरपर्वता ।
सर्पवृश्चिकभल्लूकसिंहव्याघ्रादयस्तथा ॥ ३३ ॥
भूतप्रेतपिशाचाश्च पक्षिणोति* भयङ्करा ।
इति सप्तदशोक्तानि विकाराणि यथाक्रमम् ॥ ३४ ॥
अग्नि, वायु, जल, अशनि—पतनशील विद्युत्, विद्युत्--चमकने वाली विद्युत्, धूम, सागर,
पर्वत, सर्प, वृश्चिक, रीछ, सिंह, बाघ आदि तथा भूत, प्रेत, पिशाच‡ पक्षी ये १७ विकार यथाक्रम
कहे हैं ॥ ३३-३४ ॥
एवमुक्तवा दर्पणस्य गुणनामादय क्रमात् ।
इदानीं तत्पाकविधिसंग्रहेण निरूप्यते ॥ ३५ ॥
इस प्रकार दर्पण के गुण नाम आदि क्रम से कह कर अब उसकी पकाने की विधि संक्षेप से
निरूपित की जाती है ॥ ३५ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे--यह कहा है दर्पण प्रकरण में--
शल्यक्षारं पञ्चश्विङ्गात्रय च लाक्षात्रय सोमकान्तशरात्रय-
राजकुरण्टिकाद्वयमिङ्गालसाराष्टक टङ्कणत्रयम् ॥ ३६ ॥
नखाष्टकवालुकसप्तक च मातृणणष्टक रविचुम्बकद्वयम् ।
पूरत्रय पारदपञ्चविंशक तालत्रय रोप्यचतुष्टय च ॥ ३७ ॥
क्रव्यादषट्क गरदाष्टक च विष्टत्रय कन्दचतुष्टय च ।
वाराहविष्यत्रयसारपञ्चक गुञ्जातैल पञ्चविंशत् क्रमेण ।
सगृह्य तान् सप्तसस्कारशुद्धान् सम्पूरयेन्मूषकमूषिकाय्याम् ॥ ३८ ॥
मूषास्यकुण्डेष्टशतोष्णकक्ष्यात् सङ्गालयेन्नेत्रनिमीलनान्तम् ॥ ३९ ॥
पश्चाद् गृहीत्वा वरदर्पणास्ययन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखे नियोजयेत् ।
एव कृते वैराजकदर्पणो दृढशुद्धस्सुसूक्ष्मोभवति प्रसिद्ध ॥ ४० ॥
शल्यक्षार-हड्डियों का क्षार ५ भाग, श्विङ्गा-लोहविशेष सम्भवतः जस्ता ३ भाग, लाक्ष ३ भाग,
- पक्षिण इति—पक्षिणेति सन्धिरापं ।
‡ भूत, प्रेत, पिशाच यहा प्राणिविशेष हैं ।
दर्पणाधिकरण ] [ ६१
सोमक?-कपूर या लोहा विशेष ८ भाग, शेश-बोल-गन्धबोल ३ भाग, राजकुटिका-पीलीकटसरिया या
कुटज २ भाग, अङ्गारों का सार-भस्मक्षार ८ भाग, सुहागा ३ भाग, नखी ओषधि ८ भाग, बालू ७ भाग,
मातृएण-कालुण-गन्धतृणं ८ भाग, रवितुम्बक-सूर्यकान्तमणि २ भाग, पूर-दाह अगर या बीजपूर
निम्बु ? ३ भाग, पारा २५ भाग, हरिताल ३ भाग, रौप्य--रूपा धातु ४ भाग, ऋव्याद् ? ८ भाग, गरद्-
वच्छनाग ८ भाग, विष्ट-विष्ठा ३ भाग, कन्द-सूरणकन्द ४ भाग, वाराहपिन्थ--कृष्ण मदन वृक्ष का
क्षार या सूअर पशु का पित्त ३ भाग, सार-वज्रक्षार या यवक्षार या नवसार नौसादर ५ भाग, गुञ्जा-रत्ति
का तैल २५ भाग क्रम से इन्हें लेकर सात संस्कार करके मूषक मूषिका बोतल में भर दे । मूषास्य कुण्ड
में ८०० दर्जे की उष्णता से नेत्र निमीलन तक गलावे पश्चात् लेकर बड़े दर्पणगास्य यन्त्र के ऊपर नाल
के मुख में नियुक्त करे । ऐसा करने पर वैराजदर्पण-वैरूप्यदर्पण शुद्ध सूक्ष्म हो जाता है ॥३६-४०॥
अथ कुण्टिणीदर्पण निर्णय-अब कुण्टिणीदर्पण का निर्णय देते हैं-
इत्युक्त्या वैराजकाख्यदर्पणं शास्त्रतस्स्फुटम् ।
इदानीं कुण्टिणीदर्पणस्वरूपं प्रचक्षते ॥ ४१ ॥
यदशुभासन्निधानात् सर्वबुद्धिविकल्पनम् ।
भवेत् कुण्टिणीदर्पणं इति प्रोच्यते बुधै ॥ ४२ ॥
इस प्रकार वैराजकाख्यदर्पण-वैरूप्यदर्पण शास्त्र से स्फुट कह कर अब कुण्टिणी दर्पण का
स्वरूप कहते हैं। अंशुभा-किरणज्योति के संसर्ग से सब की बुद्धियों का विपर्यास हो जाता है अत
कुण्टिणी दर्पण विद्वानों ने कहा है ॥ ४१-४२ ॥
तदुक्तं पराङ्कुशे--वह कहा है पराङ्कुश में-
आकाशविद्युत्तरङ्गसन्धिमार्गं स्वभावतः ।
सप्तस्रोतावर्तं वातविषसयोगत क्रमात् ॥ ४३ ॥
बुद्धेर्विकल्पदासप्त जायन्ते विषशक्तय ।
तासा निवारणार्थाय यत्कृत शास्त्रवित्तमैः ॥ ४४ ॥
तत्कुण्टिणीदर्पण इत्युक्त नाम्ना विशेषत ।
आकाश की विद्युत्तरङ्गों के सन्धिमार्ग में स्वभावत ७ स्रोतोंवाला आवर्त घुमेर करने वाले
वायु के विषसंयोग से क्रम से बुद्धि का विपर्यास करने वाली ७ विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं। उनके
निवारणार्थ जो शास्त्रों के विशेषज्ञों ने किया है, वह कुण्टिणीदर्पण नाम से विशेषतः कहा है ॥४३-४४॥
विषशक्तिविनिर्णयस्तु-उक्तं हि सम्मोहनक्रियाकाण्डे-विषशक्ति विनिर्णय तो सम्मोहन
क्रियाकाण्ड में कहा है-
मेदोसृङ्मासमज्जास्थित्वग्बुद्धीना विकल्पदाः ।
गालिनी कुण्टिणी कालीस्पिञ्जुला उल्बणामरा ॥ ४५ ॥
६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
आकाशविद्युत्तरङ्गसन्धिमार्गादिषु स्वतः ।
सप्तस्रोतावर्तवातविषसम्बन्धतः क्रमात् ॥ ४५ ॥
एतास्सप्त प्रजायन्ते दुःखदा विषशक्तयः ।
मेद-मास के ऊपर सफेद चिकनी वस्तु, असृक्-रक्त, मांस, मज्जा-चर्बी, अस्थि-हड्डी,
त्वचा, बुद्धि को विपरीत कर देने वाली गालिनी कुण्टिणी काली पिञ्जुला उल्बणा, मरा ये सात स्रोत
वाले आवर्त वायु के विष सम्बन्ध से क्रम से आकाश विद्युत्तरङ्गों के सन्धिमार्ग आदि में स्वतः ७ दुःख-
दायक विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं ॥ ४५-४६ ॥
एवमुक्त्वा कुण्टिणीदर्पणानामाद्यं क्रमात् ॥ ४७ ॥
इदानीं तत्पाकविधिसङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ४८ ॥
इस प्रकार कुण्टिणी दर्पण आदि नाम क्रम से कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप से
कही जाती है ॥ ४७-४८ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—यह कहा है दर्पण प्रकरण में—
मृत्पञ्चकं कञ्चुकसप्तकं च फेनत्रयं षण्मुखसारपञ्चकम् ।
श्वित्राष्टकं खड्गनखत्रयं च क्षाराष्टकं बालुकसप्तकं च ।
पाराष्टकं शङ्कचतुष्टयञ्च मातुलुङ्गाष्टकं वरतालकत्रयम् ॥ ४९ ॥
गजोष्ट्रयोः क्षारचतुष्टयं च सुरन्धिकासप्तक पञ्चतैलम् ॥ ५० ॥
मुक्तात्वगष्टत्रितयं च शुक्ति क्षारं तथेन्दुचतुष्टयं च ।
एतान् शुद्धान् क्रमतो गृहीत्वा सम्पूरयेच्छिङ्गिकमूपमध्ये ॥ ५१ ॥
संस्थाप्य शिञ्जीरककुण्डमध्ये संगालयेत् सप्तशतोष्णकक्ष्ये ।
पूर्वोक्तमार्गेण नियोजयेत् तद्रस यथाशास्त्रविधानतस्तत ॥ ५२ ॥
अत्यन्तसूक्ष्म सुदृढ भवेद् रुच बालार्कवत् कुण्टिणीकाख्य दर्पणम् ॥५३॥
मृत्—सौराष्ट्र मृत्तिका ५ भाग, कञ्चुक—सर्प की केंचुली ७ भाग, समुद्रफेन ३ भाग, षण्मुख-
सार—खरबूजे के बीज ५ भाग, श्वित्रा—लोहविशेष-जस्ता ? ८ भाग, गेण्डे का नाखून खुर ३ भाग, क्षार-
यवखार ८ भाग या आठों क्षार एक एक भाग, रेत ७ भाग, पारा ८ भाग, शङ्ख ४ भाग, मातुलुङ्ग ?—
कातुण-गन्धतृण ? ६ भाग, शुद्ध हरिताल ३ भाग, गज—गजपिप्पली और उष्ट्र—ऊंट कटीला के क्षार
४ भाग या गज—हाथी और उष्ट्र—ऊण्ट की हड्डी का क्षार ४ भाग, सुरन्धिका ?—बड़े नलशर का क्षार
७ भाग, तैल—तिल तेल ५ भाग, मुक्ता त्वक्—मोती की त्वचा ८ भाग, शुक्ति क्षार—सीपी का क्षार ३
भाग, इन्दु—कपूर ४ भाग । इन शुद्ध द्रव्यों को क्रम से लेकर शिङ्गिक मूषा मध्य में भर कर शिञ्जीरक
कुण्ड मध्य में ७०० दर्जे की उष्णता से गलावे । पूर्वोक्त मार्ग से पिघले रस को शास्त्रविधान से नियुक्त
करे, अत्यन्त सूक्ष्म दृढ चमकदार बाल सूर्य की भांति सुदृढ़ कुण्टिणी नामक दर्पण बन जावे ॥४९-५३॥
अथ पिञ्जलादर्पणनिर्णयः—अब पिञ्जुलादर्पण का निर्णय देते हैं—
दर्पणाधिकरण ] [ ६३
अर्कांशुयुद्धसञ्जातशक्तिस्स्यात् पिञ्जुलेति हि ।
सा नेत्रकृष्णताराग्रप्रभाग्राहिति वर्णिता ॥ ५४ ॥
यतो निगृह्य तच्छक्तिं वेगेन स्वीयशक्तितः ।
यन्तॄणां कृष्णताराग्रप्रकाशं पालयत्यत । ॥ ५५ ॥
पिञ्जुलादर्पणं इति नाम शास्त्रे निरूपितं ।
सूर्यकिरणों के युद्ध से उत्पन्न शक्ति पिञ्जुला है वह नेत्र के काले तारे के अग्र की ज्योति
को ले लेने वाली कही है, जिससे अपनी शक्ति से यात्रियों के कृष्णताराम्र प्रकाश को वेग से लेकर
पालन करती है। इसलिए पिञ्जुलादर्पण नाम से शास्त्र में वर्णित है ॥ ५४-५५ ॥
तदुक्तमंशुबोधििन्याम्— यह कहा है अंशुबोधिनी में--
अग्ने पूर्वदिशस्य स्थानमारभ्य संख्यतः ।
उपदिश्यस्य स्थानान्तमष्टधा दिग्विनिर्णय ॥ ५६ ॥
यजुरारण्यके प्रोक्तमंशूनां जातिनिर्णये* ।
एकैकदिशि सञ्जाता रश्मयो भिन्नशक्तयः ॥ ५७ ॥
इति शास्त्रेऽग्निभेदात्प्रवदन्ति मनीषिणः ।
ऋतुकालप्रभेदेन पञ्चवातप्रवेशतः ॥ ५८ ॥
तेषामन्योन्यसंसर्गो वारुणोयोगतो भवेत् ।
अतोऽशूनां भवेद् युद्धं शक्तिभेदत्वकारणात् ॥ ५९ ॥
तस्मिन् परस्परं वेगात् तत्तद्दिशि विशेषतः ।
मघर्षणात् प्रजायन्ते चत्वारि विषशक्तयः ॥ ६० ॥
अन्धान्धकारपिञ्जूरतारपा इति तत् क्रमात् ।
रक्तजाठरताराग्रप्रभाक्षाक्षिक्षयं हनेन् ॥ ६१ ॥ इत्यादि ॥
इस अग्नि के पूर्व दिशा में स्थान को आरम्भ कर संख्या से उपदिशा में इसके स्थान के
अन्त तक ८ प्रकार से निर्णय है, यजुर्वेद के आरण्यक में किरणों के जाति निर्णय में कहा है। एक एक
दिशा में उत्पन्न किरणें भिन्न-भिन्न शक्तिया शास्त्रों में अग्नि के भेद से, ऋतुकाल के भेद से, पांच
वायुओं के प्रवेश से उनका अन्योन्य संसर्ग वारुणी—मेघस्थ वैद्युत शक्ति के योग से होता है अत
किरणों का युद्ध शक्तिभेद के कारण हो जाता है। वहा परस्पर वेग से उस उस दिशा में विशेष संघर्ष
से ४ विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं। अन्ध, अन्धकार, पिञ्जूष, तारपा क्रम से रक्त जाठर ताराम्र प्रभा
दोनों आंखों का नाश कर दे ॥ ५६--६१ ॥
उक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डेऽपि— सम्मोहनक्रियाकाण्ड में भी कहा है—
सूर्याशुयुद्धात् (द्ध ?) सञ्जाताश्चत्वारि विषशक्तयः ।
अन्धान्धकारपिञ्जूषनेत्रघ्ना इति वर्णिता ॥ ६२ ॥
- "धनु न जातमष्टरोदसी" (तै० ब्रा० १।७।५।)
६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अन्धशक्तिर्हन्ति रक्तमन्धकारा तु जाठरम् ।
पिञ्जूषा कृष्णताराग्रप्रभा नेत्रद्वय तथा ॥ ६३ ॥
निहन्ति तारपा शक्तिस्स्वकीयविषवेगत ॥ ६४ ॥ इत्यादि ॥
सूर्य किरणों के युद्ध से चार विषशक्तियां उत्पन्न हुई हुईं अन्ध, अन्धकार, पिञ्जूष, नेत्रघ्ना
कही गई हैं । अन्ध शक्ति रक्त को नष्ट करती है, अन्धकारा तो जठराग्नि को, पिञ्जूषा कृष्णताराम की
ज्योति को और तारपा शक्ति अपने विष वेग से दोनों आंखों को नष्ट करती है ॥ ६२-६४ ॥
पि(म ?) ञ्जुलादर्पणस्यैवमुक्त्वा नामविनिर्णयं ।
इदानी तत्पाकविधिसङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६५ ॥
पिञ्जुलादर्पण का नाम निर्णय इस प्रकार कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप से कही
जाती है ॥ ६५ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पण प्रकरण में—
वार्ध्वीकपटकं वरशोणपञ्चकं क्षाराष्टकं वालुकसप्तक च ।
निर्यासमुत्पञ्चकटङ्कणाष्टकं दम्भोलिसारद्वयमष्टपारदम् ॥ ६६ ॥
शुद्धाभ्रकं पञ्चक रवित्रिपुद्वयं सुरोलिकासत्त्वचतुष्टय च ।
त्वगष्टकं वार्धुधिकत्रय तथा कन्दत्रय पिष्टचतुष्टय च ॥ ६७ ॥
तालत्रय माक्षिकसप्तकं च वृकोदरीवीतचतुष्टय क्रमात् ।
अष्टादशैतान् वरशुद्धवस्तून संगृह्य सम्यक् परिशोधयेत् क्रमात् ॥ ३८ ॥
सम्पूर्य पश्चात् सुकपालमूषामुखे न्यसेद् व्यामटिकान्तरे दृढम् ।
संगालयैत् सप्तशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो नेत्रनिमीलनान्तम् ॥ ६६ ॥
संगृह्य संगालितद्रस शनैर्यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखात् प्रपूरयेत् ।
पश्चाद् दृढ सूक्ष्ममतीवशुद्ध मनोहर पिञ्जुलदर्पण भवेन् ॥ ७० ॥ इत्यादि ॥
वार्ध्वीक—सृष्टिका—भेड़ का दूध ? ६ भाग, वरशोण—अच्छा सिन्दूर ५ भाग, क्षार—यवक्षार
८ भाग या आठों क्षार एक एक भाग, रेत ७ भाग, निर्यासमुत्—वृक्ष का दूध जमा हुआ ? ५ भाग, सुहागा
८ भाग, दम्भोलि—लोह विशेष का चूरा २ भाग, पारा ८ भाग, शुद्ध अभ्रक और ताम्बा ५ भाग, त्रपु—सीसा
२ भाग, सुरोलिका सत्त्व ?—सुन्दर शूण्ड या हल्दी का सत्त्व ? ४ भाग, त्वक्—दारचीनी ८ भाग, वार्धु-
षिक ? वार्द्धय—द्रोणीलवण ? ३ भाग, कन्द—सूरणकन्द ३ भाग, पिष्ट—तिलखल ४ भाग, हरिताल
३ भाग, सोनामाखी ७ भाग, वृकोदरीवीत ? ४ भाग । इन १८ शुद्ध वस्तुओं को लेकर सुकपालमूषा मुख
में भर कर व्यासटिका के अन्दर रख दे । ७०० दर्जे की उष्णता के प्रमाण से नेत्र खुलने तक गलावे,
गलाये हुए पिघले रस को यन्त्र के उपरिनाल के—मुख से धीरे से भर देवे फिर सूक्ष्म अधिक शुद्ध
मनोहर पिञ्जुल दर्पण हो जावे ॥ ६६-७० ॥
अथ गुहागर्भदर्पणनिर्णयः—अब गुहागर्भ दर्पण का निर्णय देते हैं—
वारुणीवातकिरणशक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
जायन्ते रोगदा नॄणा गुहाद्या विशेषशक्तय ॥ ७१ ॥
दर्पणाधिकरण ] [ ६५
तास्समाहृत्य वेगेन विद्युत्संयोगत पुन ।
प्रसार्य परयानस्थजनोपरि विशेषत ॥ ७२ ॥
य प्रयच्छति दुखानि विषरोगादिभिस्त्वत ।
स गुहादर्पण इति प्रवदन्ति मनीषिण ॥ ७३ ॥
बारुणी-अश्रविद्युच्छक्ति वायु किरण शक्तियों के संघर्ष के कम से मनुष्यों को रोग देने
वाली गुहादि विषशक्तिया उत्पन्न हो जाती हैं। उन्हें विद्युत् के संयोग से वेग से लेकर दूसरे शत्रु के
विमान के ऊपर प्रसारित करके-डाल कर जो विषरोग आदि से दुःखों को देती है। अत गुहादर्पण-
गुहागर्भदर्पण मनीषी कहते है ॥ ७१-७३ ॥
तदुक्त प्रपञ्चसारे-वह कहा है प्रपञ्चसार ग्रन्थ में-
कश्यपोर्ध्वकपालाभ्या मध्ये तिष्ठति वारुणी ।
कपालवारुणीमध्ये वाता पञ्चसहस्रका ॥ ७४ ॥
तथैव कश्यपारोगकिरणाश्चाष्टकोटय ।
तत्तद्वातसमायोगात् प्रभिन्ना किरणा पुन ॥ ७५ ॥
अनुलोमविलोमाभ्या वहन्ति विशेषत ।
शक्तिवाताशुसंयोगो यदा स्यात् खे परस्परम् ॥ ७६ ॥
महादु खकरास्तत्र गुहाद्या विषशक्तय ।
जायन्ते वेगसयुक्ता जले बुद्बुदवत्स्वयम् ॥ ७७ ॥ इति
कश्यपो के ऊपर दो कपालों के मध्य वारुणी शक्ति रहती है, कपाल और वारुणी के मध्य
पाच सहस्र वायुए हैं तथा कश्यप ओर रोगकिरण आठ करोड़ हैं, उस उस वायु के सम्मेल से फिर
किरणें पृथक् पृथक् अनुलोम और विलोम के द्वारा विशेषत चलती हैं। जब शक्ति-वारुणी शक्ति वायु
और किरणो का सयोग आकाश में परस्पर हो जावे तो वहां महादु ख करने वाली गुहा आदि शक्तिया
वेगवश जल में बुद्बुद की भांति स्वयं उत्पन्न हो जाती है ॥ ७४ -७७ ॥
लल्लोपि- लल्ल ने भी कहा है-
दशोत्तरशतन्यायमनुसृत्य यथाक्रमम् ।
शक्तिवाताशुसंयोगो यदा भवति वेगत ॥ ७८ ॥
तदा सघर्षण तेषामतिवेगाद् भविष्यति ।
जायन्ते तेन विविधा गुहाद्या विषशक्तय ॥ ७६ ॥
तत्प्रयोगान्नृणा लोके ॐभवेन्नानाविधामया ॥ इत्यादि ।
११० न्याय ? को अनुसरण कर यथाक्रम शक्ति-वारुणी शक्ति वायु और किरणों का सयोग
जब वेग से होता है तब उनका संघर्ष वेग से होगा-हो जाता है, उससे विविध गुहादि विषशक्तिया
उत्पन्न हो जाती हैं उनके प्रयोग से मनुष्यों के लोक में नानाविध रोग हो जावे ॥ ७८- ७६ ॥
- भवेत्-बचनव्यत्यय-आर्ष ।
६६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्वतस्सिद्धन्यायमुक्तं वशिष्टेन—स्वत सिद्धन्याय कहा है वशिष्ठ ने—
विजातीयशक्तिसाङ्कर्यात् सजातीयविषशक्तिप्रवाहस्स्यात् कूर्माण्डवत् ॥ इति ॥
विजातीय शक्ति के साङ्कर्य—मेल से सजातीय विषशक्ति का प्रवाह कछवे के अण्डे के
समान हो जावे ॥
तदुक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डे—वह कहा है सम्मोहन क्रियाकाण्ड में—
त्रिलक्षपञ्चसहस्रस्तथा पञ्चोत्तर शतम् ।
शक्तिवातांशुशक्तीना परस्परविघटनात् ॥ ८० ॥
रोगप्रदा प्रजायन्ते गुहाद्या विषशक्तयः ।
कुष्ठापस्मारग्रह (हि ?) णीका (सा ?) सशूलप्रदा क्रमात् ॥८१॥
तासु मुख्या पञ्च इति शक्तय परिकीर्तिता ।
तस्मान्नामानि विधिवत्संग्रहेण निरूप्यन्ते ॥ ८२ ॥
गृध्री गोधा कुजा रौद्री गुहा इति पञ्चधा ।
एतत्प्रचोदनाद्रोगप्रदानार्थ तु यत्कृतम् ॥ ८३ ॥
तद्गुहागर्भदर्पण इत्युक्त शास्त्रवित्तमै ॥ इत्यादि ॥
तीन लाख पांच सहस्र एक सौ पांच शक्ति—वारुणी शक्ति वायु किरणों के परस्पर सघर्ष से
रोग देने वाली गुहा आदि विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं जो कि कुष्ठ-कोढ़, अपस्मार—मृगी, संग्रहणी,
खांसी, शूल—पीड़ा देनेवाली हैं । उनमें मुख्य पांच शक्तियां कही हैं । उनके नाम विधिवत् संक्षेप से कहे
जाते हैं । वे गृध्री, गोधा, कुजा, रौद्री, गुहा पांच हैं । इनके प्रेरण से रोगप्रदानार्थ जो किया है वह
गुहागर्भ दर्पण शास्त्रवेत्ताओं ने कहा है ॥ ८०-८३ ॥
एवमुक्त्वा गुहादर्शदर्पण शास्त्रतस्फुटम् ॥ ८४ ॥
तस्येदानी पाकविधिसंग्रहेण प्रकीर्त्यते ।
इस प्रकार गुहादर्शदर्पण शास्त्रानुसार स्फुटरूप से कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप
से कही जातो है ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पणप्रकरण में—
वराटिकासप्तक मञ्जुलत्रय डिम्भीरषट्क रजकाष्टक तथा ।
मण्डूरषट्क वरपारदाष्टक तालत्रय ब्राह्मिकसप्तक तत ॥ ८५ ॥
नागद्वय चाञ्जनिकाष्टक तथा मातृणषट्क वरबालुकाष्टकम् ।
किशोरषट्क मुतुकुन्दपञ्चक तैलद्वय लोहिकपञ्चविंशति ॥ ८६ ॥
मृडाणिगर्भोद्भवसत्त्वपञ्चक मृदष्टक स्फाटिकपञ्चक तथा ।
शल्यत्रय पञ्चदशेन्दुसत्त्वक दम्बोलिटाकाद्वयसत्त्वपञ्चकम् ॥ ८७ ॥
एतान् क्रमाद् द्वाविंशतिवस्तुवर्गान् शुद्धान् समादाय यथाविधि क्रमात् ।
सम्पूयं चञ्चूपुटमूषमध्ये चञ्चूपुटभ्यासटिकान्तरे न्यसेत् ॥ ८८ ॥
दर्पणाधिकरण ] [ ६७
संगालयेत् सप्तोष्णकक्ष्यैश्शास्त्रोक्तमार्गेण निमीलनान्तान् ।
पश्चात् समाहृत्य शनेश्शने क्रमाद् यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखे नियोजयेत् ॥ ५९ ॥
ततो गुहागर्भकदर्पणो भवेच्छुद्ध सुसूक्ष्म सुदृढ मनोहरम् ॥ ६० ॥
वराटिका—कौड़ी ७ भाग, मञ्जुल—मजीठ ३ भाग, डिम्भीर ?—डिण्डीर—समुद्रफेन ६ भाग,
रजक—रञ्जक—शिंगरफ ८ भाग, मण्डूर—लोहमल ६ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग, ताल—हरिताल ३ भाग,
ब्राह्मिका—भारङ्गी ७ भाग, नाग—सीसा २ भाग, आञ्जनिक—सुरमा ८ भाग, मातृण्ण—कातृण—गन्ध-
तृणण ६ भाग, अच्छा रेत ८ भाग, किशोर-तैलपर्णी या घोटक शिग्रु ( सोंजना ) ६ भाग, मुचुकुन्द—
मुचुकुन्द पुष्प ४ भाग, तिलतैल २ भाग, लोह्निक—सफेद सुहागा २५ भाग, मुडाणिगर्भोद्भव सत्त्व ?
५ भाग, मृत्—सौराष्ट्रमृत्तिका ८ भाग, स्फटिकमणि या फिटकरी ५ भाग, शल्य—हड्डी या लालखैर-कत्था
३ भाग, इन्दुसत्त्व—चन्द्रकान्त का सत्त्व या कपूर १५ भाग, दग्धोलिटाका ?—लोहा विशेष ५ भाग ।
इन २२ वस्तुओं को शुद्ध लेकर चक्रपुट मूषामध्य में चक्रपुट व्यासटिका के अन्दर डाल दे । ७०० दर्जे
की उष्णता से शास्त्रोक्त मार्ग से निमीलन तक गलावै, पश्चात् लेकर धीरे धीरे यन्त्र के उपरिनाल के मुख
में डाल दे फिर गुहागर्भ दर्पण शुद्ध सूक्ष्म सुदृढ़ मनोहर बन जावे ॥ ८५--६० ॥
अथ रौद्रीदर्पण निर्णय.—अब रौद्रीदर्पण का निर्णय देते हैं—
दर्शनादेव सर्वेषां द्रावणं येन जायते ।
तद्रौद्रीदर्पणं इति प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ६१ ॥
दर्शन से ही सब का द्रावण जिससे होता है वह रौद्रोदर्पण है ऐसा मनीषी कहते हैं ॥६१॥
तदुक्त पराङ्कुशे—वह पराङ्कुश में कहा है—
रुद्राण्योपराभ्रलिङ्गो यत्र सम्मेलनं भवेत् ।
रौद्रीनाम भवेत् काचिच्छक्तिस्तत्रोग्ररूपिणी ॥ ६२ ॥
अर्कशुयोगतस्सा तु सर्वान् सम्द्रावयेत् स्वयम् ।
यद् रुद्राण्योषराभ्रलिङ्गाभ्यां क्रियते क्रमात् ॥ ६३ ॥
तद् रुद्राणीदर्पण इत्युक्तं शास्त्रविदां वरै ।
रुद्राण्योषरा ? और अभ्रलिङ्ग ? जहां मिलें वहां रौद्री नामक कोई शक्ति उग्ररूपी प्रकट हो
जाती है । सूर्यकिरणों के योग से वह सब को द्रवित कर दे, जो कि रुद्राण्योषरा और अभ्रलिङ्ग से क्रम
से किया जाता है वह रुद्राणीदर्पण शास्त्रज्ञ विद्वानों ने कहा है ॥ ६२--६३ ॥
उक्तं च सम्मोहनक्रियाकाण्डे—कहा है सम्मोहनक्रियाकाण्ड में—
रौद्री भान्वंशसंयोगाज्जायते मारिकाभिधा ।
विषशक्तिस्तया सूर्यकिरणाशनिसम्भव ॥ ६४ ॥
तत्सदर्शनमात्रेण परयानविनाशनम् ।
यत् करोति विशेषेण तद्रौद्रीदर्पणो भवेदिति ॥ ६५ ॥
रौद्रीदर्पणनामादीनेवमुक्त्वा यथाविधि ।
तत्पाकविधिमद्यात्र सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६६ ॥
६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
रौद्री सूर्यकिरणों के संयोग से मारिका नाम की विषशक्ति उत्पन्न हो जाती है उससे सूर्यकिरण-
विघ्नू की उत्पत्ति हो जाती है। उसके दर्शनमात्र से परविमान का विनाश जो कर देता है वह रौद्री-
दर्पण हो जाता है। रौद्री दर्पण नाम आदि यथाविधि कह कर उसके पकाने की विधि अब संक्षेप से
कही जाती है ॥ ६४-६६ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे-वह कहा है दर्पण प्रकरण में-
नागाष्टक शाल्मलिकत्रय तथा दुर्वारषट्क कुरुपिञ्जराष्टकम् ।
द्रोण्ये कविशद्रविचुम्बकाष्टक रुद्राणिग्रावोत्तरसप्तविंशति ॥ ६७ ॥
शल्याकषट्क बरकौटिलाष्टक वीराभ्रलिङ्गत्रिशतिकस्तथैव ।
क्षाराष्टक सैकतसपाक तथा मातृणषट्क वरडिम्बिकात्रयम् ॥६८॥
छि्वङ्गाष्टक मञ्चुकमृत् त्रयोदश निर्यासषटक वरकुम्भिनीत्रयम् ।
तैलत्रय माक्षिकसप्तविंशतिर्गोधाम्लषट्क वरपिञ्जुलाष्टकम् ॥ ६६ ॥
वैरञ्जसत्त्वाष्टकन्दपञ्चक तालत्रय कार्मुकसप्तक तथा ।
षड्विंशदेतान् विधिवत् सुशोधितान् सम्पूरयेत् कूष्माण्डकमूषिकायाम् ॥१००॥
कूष्माण्डकुण्डे सुदृढ निधाय संगालयेद्दशतोष्णकथ्यै ।
उन्मीलिताक्षान्तसुगालित रस यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखे निसिञ्चेत् ॥ १०१ ॥
एव कृते रौद्रिकदर्पणो भवेत् सूक्ष्मस्सुशुद्धस्सुदृढो मनोहर ॥ १०२ ॥
नाग-सीसा धातु या हाथी दान्त ८ भाग, शाल्मलिक-रोहेडा ३ भाग, दुर्वार-दुर्वरा-भारगी
६ भाग, कुरुपिञ्जर-कटेली का सूखा पेड़ ? ८ भाग, द्रोणी-द्रोणीलवण २१ भाग, रविचुम्बक-सूर्यकान्त
८ भाग, रुद्राणि-रुद्रजटा ७ भाग, मोवोषर-पाषाणक्षार २० भाग, शल्याक-रक्तखैर या नागवल्ली ६ भाग,
कौटिल-शंखसार ८ भागवीराभ्रलिङ्ग? ३० भाग, क्षार ८ या सब ८ क्षार एक एक भाग, सैकतसपाक-पकारेत
८ भाग, मातृण ? कातृण-गन्धतृण ६ भाग, वरडिम्बिका-श्योनाक वृक्ष या बड़ी जल मक्खी ३ भाग, छि्वङ्गा
लोहविशेष ८ भाग, कञ्चुकमृत्-केंचुलीमिट्टी १३ भाग, निर्यास-गोन्द ६ भाग, वरकुम्भिनी-श्वेत-
इन्द्रवारुणी-सौधिनी ३ भाग, माक्षिक-सोना माखी २७ भाग, गोधाम्ल-मन शिलाद्राव ६ भाग, वरपिञ्जुला
अच्छी रुई ? ८ भाग वैरञ्ज - विरञ्जि-कोआ का सत्त्व ८ भाग, कन्द-सूरणकन्द ५ भाग, ताल-हरिताल
३ भाग, कार्मुक-श्वेतखदिर या महानिम्ब ७ भाग। इन विधिवत् शोधी हुई २६ वस्तुओं को कूष्माण्डमूषक
में भर दे फिर कूष्माण्ड कुण्ड में सुदृढ़ रखकर १०० दर्जे की उष्णता से गलावे आंख खोलने तक
गलाया हुआ रसयन्त्र के ऊर्ध्व नाल के मुख में सींच दे-डाल दे ऐसा करने पर रौद्रीदर्पण सूक्ष्म शुद्ध
दृढ़ मनोहर हो जावे ॥ ६७-१०२ ॥
शक्त्यधिकरणम् ।
शक्ति का अधिकरण प्रस्तुत है ।
शक्तयस्सप्त ॥ अ० ४ सू० १ ॥
बो० गृ०
शक्त्यधिकरणम् ] [ ६९
एवमुक्त्वा विमानस्य दर्पणान् शास्त्रतस्स्फुटम् ।
इदानीं तच्छक्तिभेदनिर्णयस्सम्प्रचक्षते ॥ १०३ ॥
पदद्वयं भवेदस्मिन् शक्तिभेदप्रबोधकम् ।
तत्रादिमपदाच्छक्तिस्वरूपस्सम्प्रदर्शित ॥ १०४ ॥
संख्यातस्तत्प्रभेदस्तु द्वितीयपदत स्मृत ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ १०५ ॥
उद्गमा पञ्जरा तद्वत् सूर्यशक्त्यपकर्षिणी ।
परशक्त्याकर्षिणी च तथा द्वादश शक्तय ॥ १०६ ॥
कुण्टिणी मूलशक्तिश्चेत्येतास्स्यूस्सप्त शक्तय ।
इमा विमानकार्येषु प्रधानत्वेन वर्णिता ॥ १०७ ॥
इस प्रकार विमान के दर्पणो को शास्त्र से स्पष्ट कहकर अब उनके शक्तिभेद का निर्णय कहते
है। इस सूत्र में शक्तिभेद के बोधक दो पद है उनमे आदिम पद से शक्ति का स्वरूप प्रदर्शित किया
दूसरे पद से उसके भेद गिनाए है। पदों के अर्थ इस प्रकार कहे अब विशेषार्थ कहा जाता है। उद्गमा
पञ्जरा, सूर्यशक्त्यपकर्षिणी, परशक्त्यपकर्षिणी, द्वादशशक्तिया, कुण्टिणी, मूलशक्ति ये ७ शक्तियां हैं, ये
विमानकार्यों में प्रधानरूप से कही हैं ॥ १०३—१०७ ॥
विमानस्योक्तस्थानेषु तत्तद्यन्त्राण्यथाविधि ।
सकीलकान् तन्त्रियुक्तानतिशुद्धान् सचक्रकान् ॥ १०८ ॥
स्थापयेत् केन्द्ररेखासख्यामार्गानुसारत ।
विमान के उक्त स्थानों मे उन उन चक्रों को यथाविधि कीलसहित और तारयुक्त चक्रसहित
केन्द्ररेखा की संख्या के अनुसार स्थापित करे ॥ १०८ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्वग्रन्थ में—
तुन्दिलो पञ्जरस्तद्वदंशुपाश्चापकर्षक ।
सन्धानिको दार्पणिकश्शक्तिप्रभवक क्रमात् ॥ १०९ ॥
सज्जैते † यानशक्तीना यन्त्राणीति विनिर्मिता ।
तत्तद्यन्त्रमुखादेव तत्तच्छक्तिक्रियादय ॥ ११० ॥
तुन्दिलादुद्गमा शक्ति पञ्जरात् पञ्जराभिधा ।
अंशुपात् सूर्यशक्त्यपकर्षिणी शक्तिरीरिता ॥ १११ ॥
अपकर्षकयन्त्रेण परशक्त्यपकर्षिणी ।
सन्धानयन्त्राद् द्वादशशक्तयस्सन्निरूपिता ॥ ११२ ॥
कुण्टिणीनामिका शक्तिरुक्ता दार्पणिकादित ।
† 'एते—एतानि' लिङ्गव्यत्यय ।
७० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिप्रसवयन्त्रेण मूलशक्तिरुदीरिता ॥ ११३ ॥
एवं क्रमात् सप्त यन्त्रशक्तय परिकीर्तिताः ।
तुन्दिल, पञ्जर, अं'शुप, अपकर्षक, सान्धानिक, दार्पणिक, शक्तिप्रसवक, ये ७ विमान शक्तियों
के यन्त्र निर्णय किये गए हैं । उन यन्त्रों के मुख से ही उनकी शक्ति की किया आदि होती है जो कि
तुन्दिल से उद्गमा शक्ति, पञ्जर से पञ्जरा, शक्तिर से सूर्य्यशक्त्यपकर्षिणी शक्ति, अपकर्षक यन्त्र से पर-
शक्त्यपकर्षिणी, सन्धान यन्त्र से द्वादश शक्तियां, दार्पणिक से कुण्टिणी नामक शक्ति, शक्तिप्रसवयन्त्र
से मूलशक्ति कही है इस प्रकार क्रम से ७ यन्त्रशक्तियां कही हैं ॥ १०६—११३ ॥
प्रथम रजिस्टर कापी संख्या ३ वस्तुत कापी संख्या ५ —
तत्र तावच्छौनकसूत्रम्—विमानस्थ यन्त्र की शक्तियों के सम्बन्ध में शौनक सूत्र है—
अदिनिक्ष्मावाय्वर्केन्द्वमृताम्बरशक्तयस्सप्त वैमानिका इति तासा नामान्य-
नुक्रमिष्याम । उद्गमा पञ्जरा सूर्यशक्त्यपकर्षिणी विद्युद्द्वादशका परशक्त्यप-
कर्पिणी† कुण्टिणी मूलशक्तिश्चेति ॥
अदिति-अग्नि, क्ष्मा—पृथिवी, वायु, सूर्य, इन्दु-चन्द्रमा, अमृत-जल, अम्बर—आकाश, ये
७ शक्तियां है जिन के नाम कहेंगे—कहते हैं जो कि उद्गमा, पञ्जरा, सूर्यशक्त्यपकर्षिणी,विद्युद्द्वादशका
परशक्त्यपकर्षिणी, कुण्टिणी, मूलशक्ति ॥
सौदामिनीकलायामपि—सौदामिनीकला में भी कहा है—
सू० मलयसवनशक्तयो वैमानिका इति ॥
बो० गृ०
मकारोदितिशक्तिस्स्यादुद्गमेति प्रचक्षते ।
लकार पृथिवीशक्ति पञ्जरेत्यभिधीयते ॥ १ ॥
यकरो वायुशक्तिस्स्यात्सूर्यशक्त्यपकर्षिणी ।
रकारस्सूर्यशक्तिस्स्याद् विद्युद्द्वादशकस्मृत ॥२॥
सकारस्त्विन्दुशक्तिस्स्यात् परशक्त्यपकर्षिणी ।
जलशक्तिर्वकारस्स्यात् कुण्टिणीत्यभिधीयते ॥ ३ ॥
नकारोम्बरशक्तिस्स्यान्मूलशक्तिरिति स्मृत । इत्यादि ।
म, ल, य, र, स, व, न शक्तियां विमान की है । म अदिति—उद्गमा है ऐसा कहते हैं ल
पृथिवी-पञ्जरा कही जाती है, य वायु--सूर्यशक्त्यपकर्षिणी, र सूर्य—विद्युद्द्वादशक शक्ति कही है, स
इन्दु-परशक्त्यपकर्षिणी, व जलशक्ति—कुण्टिणी कही जाती है, न अम्बर-मूलशक्ति कही है॥१-३।
एवमुक्त्वा सप्तशक्तिस्वरूप शास्त्रत स्फुटम् ।
तत्तत्कृत्य यथाशास्त्र सग्रहेण निरूप्यते ॥ ४ ॥
इस प्रकार ७ शक्तियों के स्वरूप को शास्त्र से स्फुट कहकर उनके कार्य शास्त्र से संक्षेप से कहे
जाते हैं ।
† 'परशक्त्यपकर्षिणी' शब्द छूट गया हस्तपाठ में ।
७२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासारग्रन्थ में कहा है—
विमानस्योर्ध्वगमनमुद्गमा शक्तिस्स्मृता ।
अधस्ताद्गमनं तस्य पञ्जराशक्तितो भवेत् ॥ ५ ॥
अ्रर्का शूष्णापहारी स्याद् घृष्टिशक्त्यपकर्षिणी ।
परशक्त्यपकर्षण्या सर्वशक्तिविरोघनम् ॥ ६ ॥
विद्युद्द्वादशकाद् यानविचित्रगमनं स्मृतम् ।
मूलशक्त्या सर्वशक्तिचलनाद्या प्रकीर्तिता ॥ ७ ॥
सप्तशक्तिक्रिया एवमुक्त्वा यानस्य शास्त्रतः ॥ ८ ॥
अथ विद्युद्द्वादशकविचारः क्रियतं क्रमात् ।
विमान का ऊपर जाना उद्गमा शक्ति से कहा, उसका नीचे गमन पञ्जरा शक्ति से, घर्षणा-
शक्त्यपकर्षिणी-सूर्यशक्त्यपकर्षिणी सूर्यकिरणों की उष्णता को हटानेवाली, परशक्त्यपकर्षिणी से सब
शक्तियों को रोक देना होता है, विद्युद्द्वादशक शक्ति से विमान का विचित्रगमन कहा, मूलशक्ति से
सब शक्तियों का दूर हो जाना आदि, इस प्रकार विमान की ७ शक्तियों की क्रियाएं शास्त्र से
कहकर—॥ ५-८ ॥
तदुक्तं सौदामिनीकलायाम्—वह कहा है सौदामिनीकला पुस्तक में—
विमानगतिवैचित्र्यभेदा द्वादश स्मृताः ।
तत्क्रियाकरणे विद्युच्छक्तयस्तावदेव हि ॥ ६ ॥
तासां नामानि यानस्य गतिभेदान्यपि क्रमात् ।
समुच्चयान्निरूप्यन्ते सप्रहेणात्र शास्त्रतः ॥ १० ॥
चलना कम्पनाथोर्ध्वा अधरा मण्डला तथा ।
वेगिनी अनुलोमा च तिर्यञ्ची च पराङ्मुखी ॥ ११ ॥
विलोमा स्तम्भना चित्रा चेति द्वादशशक्तयः ।
विमानचालनं विद्युच्चलनाशक्तितस्स्मृतम् ॥ १२ ॥
तत्कम्पन विशेषेण कम्पनाशक्तितो भवेत् ।
विमानस्योर्ध्वगमनमूर्ध्वासञ्चोदनाद् भवेत् ॥ १३ ॥
यानाधोगमनं विद्यादधराशक्तितः क्रमात् ।
विमानमण्डलगनिमण्डलाशक्तितस्स्मृता (त ?) ॥१४॥
विमान की विचित्र गति के १२ भेद कहे हैं उन विचित्र गतियों में क्रिया करने के निमित्त
उतनी ही अर्थात् १२ विद्युत् शक्तियां है। उन विद्युत् शक्तियो और विमान के गति के भेदों के नाम
क्रम से एकत्र रूप में संक्षेप से यहां शास्त्र से निरूपित किए जाते हैं। चलना, कम्पना, ऊर्ध्वा, अधरा,
मण्डला, वेगिनी, अनुलोमा, तिर्यञ्ची, पराङ्मुखी, विलोमा, स्तम्भना, चित्रा ये विद्युत् शक्तियां हैं।
विमान का चालन तो चलना विद्युत्शक्ति से कहा, उसका कम्पनविशेष कम्पना विद्युत् शक्ति से होता है,
शक्त्यधिकरण ] [ ७३
विमान का ऊर्ध्वगमन तो ऊर्ध्वा विद्युत् शक्ति की प्रेरणा से होता है, विमान का अधोगमन—
अधोगमन-नीचे आना अधरा विद्युत् शक्ति से, विमान की मण्डलगति-चक्रगति मण्डला विद्युत्
शक्ति से कहा-॥६ १४॥
वेगिनीशक्तितो यानगतिवैचित्र्यमुच्यते ।
अनुलोमाद् विमानस्य प्रादक्षिण्यगतिस्स्मृता ॥ १५ ॥
तिर्यग्गमनमित्याहुस्तिर्यञ्चीशक्तियोगत ।
पराङ्मुखीशक्तितस्स्याद् विमानस्य पराङ्मुखम् ॥ १६ ॥
विलोमशक्त्या यानस्यापसव्यगतिस्स्मृता ।
स्तम्भनाशक्तितो यानस्तम्भन परिकीर्तितम् ॥ १७ ॥
चित्राख्यशक्त्या यानस्य नानाविधगतिस्स्मृता ।
इति विद्युद्द्वादशकशक्तिकार्याण्यथाक्रमम् ॥ १८ ॥
उक्तानि विमानगतीरनुसृत्य यथाविधि ॥ १६ ॥ इत्यादि
वेगिनीशक्ति से विमान की विचित्र गति कही जाती है, विमान के अनुलोम से प्रादाक्षिण्य अर्थात्
अनुलोम गति, विमान की तिर्यक्—तिरछी गति तिर्यक् शक्ति के सम्बन्ध से, पराङ्मुखीशक्ति से विमान
की पराङ्मुखगति हो, विलोम शक्ति से विमान की अपसव्य—विलोमगति कही है, स्तम्भनाशक्ति से
यान की स्तम्भनगति कही है, चित्रानामक शक्ति से विमान की नानाविध गति कही जाती है। इस
प्रकार विद्युत् को १२ शक्तियों के कार्य यथाक्रम कहे हैं, विमान की गतियों का यथाविधि अनुसरण
करके ॥ १५—१६ ॥
शक्तयः पञ्चेति नारायणाः ॥ अ० ४ सू० २ ॥
बो० वृ०
मतान्तरविचारार्थं सूत्रोय परिकीर्तित ।
तदर्थबोधकपदान्युक्तान्यस्मिन् चतु * क्रमात् ॥ २० ॥
विमानगतिवैचित्र्यक्रियाकरणशक्तय ।
सयोजाताद्यप्रयन्त्रेण सञ्जाता पञ्च एव हि ॥ २१ ॥
इति नारायणमुनिस्स्वानुभूत्याब्रवीत् स्वयम् ।
तन्मताभिप्रायमेव सूत्रेऽस्मिन् सम्प्रदर्शित ॥ २२ ॥
तत्रादिमपदाच्छक्तिस्वरूपसन्निदर्शित ।
सङ्ख्या तत्प्रभेदस्तु द्वितीयपदतस्स्मृतः ॥ २३ ॥
मतान्तरप्रकटन तृतीयपदतस्स्मृतम् ।
मतप्रवर्तकमुनि तुरीयात् सम्प्रदर्शितम् ॥ २४ ॥
पदार्थमेव कथित विशेषाथोधुनोच्यते ।
सद्यो जातसमुद्भू ताश्शक्तय पञ्चधा स्मृता ॥ २५ ॥
विमानगतिवैचित्र्यक्रिया स्यादेभिरेव हि ॥ इत्यादि ।
- विभक्तिलोप आर्षं ।
७४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
मतान्तर विचारार्थ इस सूत्र में चार पद कहे, विमान की विचित्र गतियों के करने वाली
शक्तिया सद्योजातात्मकयन्त्र से उत्पन्न हुई ५ हैं यह नारायण मुनि ने अपने अनुभव से कहा है । उसके
मत के अभिप्राय को इस सूत्र में प्रदर्शित किया है उनमें आदिम पद से शक्तिस्वरूप दिखलाया,
संख्या से भेद दूसरे पद से कहा, मतान्तर—अन्य मत का प्रकाश तीसरे पद से, प्रवर्तकमुनि चतुर्थ
पद से दिखलाया, इस प्रकार पदार्थ कहे विशेषार्थ अब कहा जाता है, सद्योजातयन्त्र से उत्पन्न हुई पांच
प्रकार की शक्तिया कही हैं इन से विमान की विचित्र गति क्रियाएं होवें ॥ २०-२५ ॥
तदुक्तं शक्तिसर्वस्वे—वह कहा है शक्तिसर्वस्व ग्रन्थ में—
चालनगालनपञ्जरस्फोरणवक्रापसर्पणाञ्चेति ।
गतिवैचित्र्यविधान यानस्योक्ता महर्षिभिशास्त्रे ॥२६॥ इत्यादि
चालन, गालन, पञ्जरप्रेरण, वक्रापसर्पण, विचित्रगति करना ये पाच बातें विमान की महर्षियों
ने कही हैं
चित्रिण्येवेति स्फोटायनः ॥ अ० ४, सू० ३ ॥
बो० वृ०
स्फोटायनमतं वक्तु सूत्रोय परिकीर्तित ।
तदर्थबोधकपदान्युक्तान्यस्मिन् चतु ❋ क्रमात् ॥२७॥
तत्रादिमपदाच्छक्तिनिर्णयस्सम्प्रदर्शित ।
द्वितीयपदतश्शक्तेर्निर्धारणमुदाहृतम् ॥२८॥
तथेत्थम्भावमुक्त स्यात् तृतीयपदत क्रमात् ।
मतप्रवर्तकमुनिश्चतुर्थपदत स्मृत ॥२६॥
एष पदार्थ कथितो विशेषार्थ प्रकीर्त्यते ।
विमानगतिवैचित्र्यकार्यनिर्वहणक्रिया ॥३०॥
एकया चित्रिणीशक्त्या भवत्येवेति विनिर्णय ।
यह सूत्र स्फोटायन के मत को कहने के लिये कहा गया है, उसके बोधक पद क्रम से चार
कहे हैं। उनमें आदिम पद से शक्ति का निर्णय दिखलाया दूसरे पद से शक्ति का निर्धारण बतलाया,
तीसरे पद से इत्थम्भाव कहा गया, चौथे पद से मतप्रवर्तक मुनि कहा है। इस प्रकार पदार्थ कह दिया
विशेषार्थ कहा जाता है, विमान की विचित्र गति कार्य करने वाली क्रिया केवल एक चित्रिणी शक्ति से
होती है ऐसा निश्चय है ॥ २७–३०॥
तदुक्तं शक्तिसर्वस्वे—वह कहा है शक्तिसर्वस्व में—
वैमानिकगतिवैचित्र्याद्विद्वात्रिंशत्क्रियायोगे ।
एकैव चित्रिणीशक्त्यलमिति शास्त्रे विनिर्णित भवति ।
इत्यनुभवतश्शास्त्राच्च मन्यते स्फोटायनाचार्य. ॥६१॥ इत्यादि ॥
❋ विभक्ते लुक् आर्षं ।
शक्त्यधिकरणम् ] [ ७५
विमान की विचित्र गति आदि ३२ क्रियाओं के सम्बन्ध में एक ही चित्रिणी शक्ति पर्याप्त है
यह शास्त्र में निर्णय है । इस प्रकार अनुभव से और शास्त्र से स्फोटायन आचार्य मानता है ॥३१॥
क्रियासारेपि-क्रियासार में भी कहा है—
चित्रिणी नामिका विद्युच्छक्तिस्सप्तदशात्मिका ।
एकैव यानद्वात्रिंशत्कार्यनिर्वहणक्षमा ॥३२॥ इत्यादि ॥
चित्रिणी नामक विद्युत्-शक्ति १७ रूप में है या १७ वीं है वह अकेली ही विमान के ३२
कार्यों के निर्वाहार्थ समर्थ है ॥३२॥
तदन्तर्भावात् सप्तैवेति भरद्वाजः ॥ अ० ४, सू० ४॥
बो० वृ०
उक्त्वा सूत्रद्वयैरेव † मतान्तरमत परम् ।
स्वसिद्धान्तद्योतनार्थं सूत्रोयं परिकीर्तित ॥३३॥
तदर्थबोधकपदान्यस्मिन् पञ्च भवन्ति हि ।
तत्रादिमपदादन्तर्भावित्व सप्त शक्तिषु ॥३४॥
पूर्वसूत्रोक्तशक्तीना सम्यक् सन्दर्शित भवेत् ।
तथैव सप्तशक्तीना प्रधानत्वं द्वितीयत ॥३५॥
उक्तार्थनिर्धारणं तु तृतीयपदत कृत ‡ ।
चतुर्थपदतस्सम्यगित्थम्भाव प्रदर्शित ॥३६॥
तथैव पञ्चमपदाद् भरद्वाजमहामुनिम् ।
स्वसिद्धान्तप्रवक्तार सूचित ❄ भवति क्रमात् ॥३७॥
पदार्थमेव कथित विशेपार्थोधुनोच्यते ।
सद्योजातसमुद्भूतपञ्चशक्तिषु शास्त्रत ॥३८॥
प्रधानत्वेन सम्प्रोक्ता पञ्चराशक्तिरेव हि ।
अग्नेस्सकाशादुत्पत्तिस्स्फुलिङ्गाना यथा भवेत् ॥३६॥
तथैव चालनादीना पञ्चराशक्तितस्स्मृत ।
दो सूत्रों से अन्यों के मत को कहकर इससे आगे अपना सिद्धान्त प्रकट करने को यह सूत्र
कहा है, उसके अर्थबोधक पद इसमें पांच हैं उनमें आदिम पद से अन्तर्भाव सात शक्तियों में ही होता
है । पूर्व सूत्र में कही शक्तियों का भलीभांति ज्ञान या ज्ञापन हो अतः दूसरे पद से उन ७ शक्तियों की
प्रधानता कही तीसरे पद से कहे अर्थ का निर्धारण और चतुर्थ पद से इत्थम्भाव ऐसा कथन पुन. पांचवें
पद से भरद्वाज मुनि सिद्धान्त प्रवक्ता अपने को सूचित किया किया है । इस प्रकार पदों का अर्थ कह
दिया अब विशेष अर्थ कहा जाता है । सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न पांच शक्तियों में शास्त्रद्वारा प्रधानता
† 'सूत्रद्वये ' वचनव्यत्यय । ‡ लिङ्गव्यत्यय । ❄ व्यत्ययो वा लेखकप्रमादो वा
७६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
से पञ्जराशक्ति ही कही है, अग्नि से स्फुलिङ्ग -चिनगारियों की उत्पत्ति जैसे होवे वैसे ही चालन
आदियों की उत्पत्ति पञ्जराशक्ति से कही है ॥ ३७–३९ ॥
तदुक्तं शक्तिबीजे—वह कहा है शक्तिबीज ग्रन्थ में—
सद्योजातसमुद्भूतपञ्जराशक्तित क्रमात् ।
उद्भवञ्चालनादीनामुक्त तच्छास्त्रवित्तमै ॥४०॥
सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न हुई पञ्जराशक्ति से क्रमशः चालनादि शक्तियों की उत्पत्ति उस
शास्त्र के विद्वानों ने कही है ॥४०॥
सद्योजातात् समुत्पन्नपञ्जराशक्तित क्रमात् ॥४१॥
चालनाद्यास्समुद्भूता क्रमाच्चत्वारिशक्तय ।
इति शक्तिकौस्तुभे ।
सद्योजात यन्त्र से उत्पन्न पञ्जराशक्ति से क्रम से चालन आदि प्रकट हुईं क्रम से चार
शक्तियां हैं । यह शक्ति-कौस्तुभ ग्रन्थ में कहा है ॥४१॥
एतेन पञ्जरोद्भूतशक्तयश्चालनादय ॥४२॥
तदंशत्वात् तत्स्वरूपा एवेत्युक्तास्स्फुलिङ्गवत् ।
तस्मात् प्रधानत्वमपि तासामत्र प्रदर्शितम् ॥४३॥
सा पञ्जरा चित्रिणी च पूर्वोक्तसप्तशक्तिषु ।
अन्तर्भावात् प्रधानत्वेनोक्ता एव स्वभावत ॥४४॥
यतस्तयो प्रधानत्व सप्तशक्तिषु वर्णितम् ।
ततस्समञ्जसमिति मतद्वयमपि स्मृतम् ॥४५॥
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाहे पूर्वोक्तसप्तशक्तिषु ।
एकैकशक्तेरेवालमिति केचिद् वदन्ति हि ॥४६॥
इस कारण पञ्जराशक्ति से प्रकट हुई चालना आदि शक्तियां उसके अंश होने से तत्स्वरूप
ही स्फुलिङ्ग जैसी कही हैं । अत उनकी प्रधानता भी यहां दिखलाई है, उन पूर्वोक्त ७ शक्तियों में यह
पञ्जरा और चित्रिणी अन्तर्भूत होने से प्रधानता से स्वभावतः कही हैं, जिसे सात शक्तियों में प्रधान
वर्णित किया है इससे दोनों मत ठीक है यह कहा है, ३२ कार्य निर्वाह में पूर्वोक्त ७ शक्तियों में एक-
एक शक्ति ही पर्याप्त है ऐसा कुछ कहते हैं ॥ ४२–४६ ॥
तदसङ्गतमेव स्यात् कार्यभेदप्रदर्शनात् ।
विमानस्योध्वंगमनमुद्गमाशक्तितस्मृतम् ॥४७॥
इत्यारभ्य क्रमान्मूलशक्तयैत्यन्त स्वभावत ।
पूर्वोक्तसप्तशक्तीना कार्यनिर्वहणक्रम. ॥४८॥
पृथक् पृथक् क्रियासारे निर्णितत्वात् प्रमाणत ।
द्वात्रिंशत्कार्यनिर्वाह कथं स्यादेकशक्तित. ॥४९॥