बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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एवमुक्त्वा विमानस्य दर्पणान् शास्त्रतस्स्फुटम् ।
इदानीं तच्छक्तिभेदनिर्णयस्सम्प्रचक्षते ॥ १०३ ॥
पदद्वयं भवेदस्मिन् शक्तिभेदप्रबोधकम् ।
तत्रादिमपदाच्छक्तिस्वरूपस्सम्प्रदर्शित ॥ १०४ ॥
संख्यातस्तत्प्रभेदस्तु द्वितीयपदत स्मृत ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ १०५ ॥
उद्गमा पञ्जरा तद्वत् सूर्यशक्त्यपकर्षिणी ।
परशक्त्याकर्षिणी च तथा द्वादश शक्तय ॥ १०६ ॥
कुण्टिणी मूलशक्तिश्चेत्येतास्स्यूस्सप्त शक्तय ।
इमा विमानकार्येषु प्रधानत्वेन वर्णिता ॥ १०७ ॥
इस प्रकार विमान के दर्पणो को शास्त्र से स्पष्ट कहकर अब उनके शक्तिभेद का निर्णय कहते
है। इस सूत्र में शक्तिभेद के बोधक दो पद है उनमे आदिम पद से शक्ति का स्वरूप प्रदर्शित किया
दूसरे पद से उसके भेद गिनाए है। पदों के अर्थ इस प्रकार कहे अब विशेषार्थ कहा जाता है। उद्गमा
पञ्जरा, सूर्यशक्त्यपकर्षिणी, परशक्त्यपकर्षिणी, द्वादशशक्तिया, कुण्टिणी, मूलशक्ति ये ७ शक्तियां हैं, ये
विमानकार्यों में प्रधानरूप से कही हैं ॥ १०३—१०७ ॥
विमानस्योक्तस्थानेषु तत्तद्यन्त्राण्यथाविधि ।
सकीलकान् तन्त्रियुक्तानतिशुद्धान् सचक्रकान् ॥ १०८ ॥
स्थापयेत् केन्द्ररेखासख्यामार्गानुसारत ।
विमान के उक्त स्थानों मे उन उन चक्रों को यथाविधि कीलसहित और तारयुक्त चक्रसहित
केन्द्ररेखा की संख्या के अनुसार स्थापित करे ॥ १०८ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह कहा है यन्त्रसर्वस्वग्रन्थ में—
तुन्दिलो पञ्जरस्तद्वदंशुपाश्चापकर्षक ।
सन्धानिको दार्पणिकश्शक्तिप्रभवक क्रमात् ॥ १०९ ॥
सज्जैते † यानशक्तीना यन्त्राणीति विनिर्मिता ।
तत्तद्यन्त्रमुखादेव तत्तच्छक्तिक्रियादय ॥ ११० ॥
तुन्दिलादुद्गमा शक्ति पञ्जरात् पञ्जराभिधा ।
अंशुपात् सूर्यशक्त्यपकर्षिणी शक्तिरीरिता ॥ १११ ॥
अपकर्षकयन्त्रेण परशक्त्यपकर्षिणी ।
सन्धानयन्त्राद् द्वादशशक्तयस्सन्निरूपिता ॥ ११२ ॥
कुण्टिणीनामिका शक्तिरुक्ता दार्पणिकादित ।
† 'एते—एतानि' लिङ्गव्यत्यय ।