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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

६६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्वतस्सिद्धन्यायमुक्तं वशिष्टेन—स्वत सिद्धन्याय कहा है वशिष्ठ ने—
विजातीयशक्तिसाङ्कर्यात् सजातीयविषशक्तिप्रवाहस्स्यात् कूर्माण्डवत् ॥ इति ॥
विजातीय शक्ति के साङ्कर्य—मेल से सजातीय विषशक्ति का प्रवाह कछवे के अण्डे के
समान हो जावे ॥
तदुक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डे—वह कहा है सम्मोहन क्रियाकाण्ड में—
त्रिलक्षपञ्चसहस्रस्तथा पञ्चोत्तर शतम् ।
शक्तिवातांशुशक्तीना परस्परविघटनात् ॥ ८० ॥
रोगप्रदा प्रजायन्ते गुहाद्या विषशक्तयः ।
कुष्ठापस्मारग्रह (हि ?) णीका (सा ?) सशूलप्रदा क्रमात् ॥८१॥
तासु मुख्या पञ्च इति शक्तय परिकीर्तिता ।
तस्मान्नामानि विधिवत्संग्रहेण निरूप्यन्ते ॥ ८२ ॥
गृध्री गोधा कुजा रौद्री गुहा इति पञ्चधा ।
एतत्प्रचोदनाद्रोगप्रदानार्थ तु यत्कृतम् ॥ ८३ ॥
तद्गुहागर्भदर्पण इत्युक्त शास्त्रवित्तमै ॥ इत्यादि ॥
तीन लाख पांच सहस्र एक सौ पांच शक्ति—वारुणी शक्ति वायु किरणों के परस्पर सघर्ष से
रोग देने वाली गुहा आदि विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं जो कि कुष्ठ-कोढ़, अपस्मार—मृगी, संग्रहणी,
खांसी, शूल—पीड़ा देनेवाली हैं । उनमें मुख्य पांच शक्तियां कही हैं । उनके नाम विधिवत् संक्षेप से कहे
जाते हैं । वे गृध्री, गोधा, कुजा, रौद्री, गुहा पांच हैं । इनके प्रेरण से रोगप्रदानार्थ जो किया है वह
गुहागर्भ दर्पण शास्त्रवेत्ताओं ने कहा है ॥ ८०-८३ ॥
एवमुक्त्वा गुहादर्शदर्पण शास्त्रतस्फुटम् ॥ ८४ ॥
तस्येदानी पाकविधिसंग्रहेण प्रकीर्त्यते ।
इस प्रकार गुहादर्शदर्पण शास्त्रानुसार स्फुटरूप से कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप
से कही जातो है ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पणप्रकरण में—
वराटिकासप्तक मञ्जुलत्रय डिम्भीरषट्क रजकाष्टक तथा ।
मण्डूरषट्क वरपारदाष्टक तालत्रय ब्राह्मिकसप्तक तत ॥ ८५ ॥
नागद्वय चाञ्जनिकाष्टक तथा मातृणषट्क वरबालुकाष्टकम् ।
किशोरषट्क मुतुकुन्दपञ्चक तैलद्वय लोहिकपञ्चविंशति ॥ ८६ ॥
मृडाणिगर्भोद्भवसत्त्वपञ्चक मृदष्टक स्फाटिकपञ्चक तथा ।
शल्यत्रय पञ्चदशेन्दुसत्त्वक दम्बोलिटाकाद्वयसत्त्वपञ्चकम् ॥ ८७ ॥
एतान् क्रमाद् द्वाविंशतिवस्तुवर्गान् शुद्धान् समादाय यथाविधि क्रमात् ।
सम्पूयं चञ्चूपुटमूषमध्ये चञ्चूपुटभ्यासटिकान्तरे न्यसेत् ॥ ८८ ॥