बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अन्धशक्तिर्हन्ति रक्तमन्धकारा तु जाठरम् ।
पिञ्जूषा कृष्णताराग्रप्रभा नेत्रद्वय तथा ॥ ६३ ॥
निहन्ति तारपा शक्तिस्स्वकीयविषवेगत ॥ ६४ ॥ इत्यादि ॥
सूर्य किरणों के युद्ध से चार विषशक्तियां उत्पन्न हुई हुईं अन्ध, अन्धकार, पिञ्जूष, नेत्रघ्ना
कही गई हैं । अन्ध शक्ति रक्त को नष्ट करती है, अन्धकारा तो जठराग्नि को, पिञ्जूषा कृष्णताराम की
ज्योति को और तारपा शक्ति अपने विष वेग से दोनों आंखों को नष्ट करती है ॥ ६२-६४ ॥
पि(म ?) ञ्जुलादर्पणस्यैवमुक्त्वा नामविनिर्णयं ।
इदानी तत्पाकविधिसङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६५ ॥
पिञ्जुलादर्पण का नाम निर्णय इस प्रकार कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप से कही
जाती है ॥ ६५ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पण प्रकरण में—
वार्ध्वीकपटकं वरशोणपञ्चकं क्षाराष्टकं वालुकसप्तक च ।
निर्यासमुत्पञ्चकटङ्कणाष्टकं दम्भोलिसारद्वयमष्टपारदम् ॥ ६६ ॥
शुद्धाभ्रकं पञ्चक रवित्रिपुद्वयं सुरोलिकासत्त्वचतुष्टय च ।
त्वगष्टकं वार्धुधिकत्रय तथा कन्दत्रय पिष्टचतुष्टय च ॥ ६७ ॥
तालत्रय माक्षिकसप्तकं च वृकोदरीवीतचतुष्टय क्रमात् ।
अष्टादशैतान् वरशुद्धवस्तून संगृह्य सम्यक् परिशोधयेत् क्रमात् ॥ ३८ ॥
सम्पूर्य पश्चात् सुकपालमूषामुखे न्यसेद् व्यामटिकान्तरे दृढम् ।
संगालयैत् सप्तशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो नेत्रनिमीलनान्तम् ॥ ६६ ॥
संगृह्य संगालितद्रस शनैर्यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखात् प्रपूरयेत् ।
पश्चाद् दृढ सूक्ष्ममतीवशुद्ध मनोहर पिञ्जुलदर्पण भवेन् ॥ ७० ॥ इत्यादि ॥
वार्ध्वीक—सृष्टिका—भेड़ का दूध ? ६ भाग, वरशोण—अच्छा सिन्दूर ५ भाग, क्षार—यवक्षार
८ भाग या आठों क्षार एक एक भाग, रेत ७ भाग, निर्यासमुत्—वृक्ष का दूध जमा हुआ ? ५ भाग, सुहागा
८ भाग, दम्भोलि—लोह विशेष का चूरा २ भाग, पारा ८ भाग, शुद्ध अभ्रक और ताम्बा ५ भाग, त्रपु—सीसा
२ भाग, सुरोलिका सत्त्व ?—सुन्दर शूण्ड या हल्दी का सत्त्व ? ४ भाग, त्वक्—दारचीनी ८ भाग, वार्धु-
षिक ? वार्द्धय—द्रोणीलवण ? ३ भाग, कन्द—सूरणकन्द ३ भाग, पिष्ट—तिलखल ४ भाग, हरिताल
३ भाग, सोनामाखी ७ भाग, वृकोदरीवीत ? ४ भाग । इन १८ शुद्ध वस्तुओं को लेकर सुकपालमूषा मुख
में भर कर व्यासटिका के अन्दर रख दे । ७०० दर्जे की उष्णता के प्रमाण से नेत्र खुलने तक गलावे,
गलाये हुए पिघले रस को यन्त्र के उपरिनाल के—मुख से धीरे से भर देवे फिर सूक्ष्म अधिक शुद्ध
मनोहर पिञ्जुल दर्पण हो जावे ॥ ६६-७० ॥
अथ गुहागर्भदर्पणनिर्णयः—अब गुहागर्भ दर्पण का निर्णय देते हैं—
वारुणीवातकिरणशक्तिसङ्घर्षणक्रमात् ।
जायन्ते रोगदा नॄणा गुहाद्या विशेषशक्तय ॥ ७१ ॥