बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
आकाशविद्युत्तरङ्गसन्धिमार्गादिषु स्वतः ।
सप्तस्रोतावर्तवातविषसम्बन्धतः क्रमात् ॥ ४५ ॥
एतास्सप्त प्रजायन्ते दुःखदा विषशक्तयः ।
मेद-मास के ऊपर सफेद चिकनी वस्तु, असृक्-रक्त, मांस, मज्जा-चर्बी, अस्थि-हड्डी,
त्वचा, बुद्धि को विपरीत कर देने वाली गालिनी कुण्टिणी काली पिञ्जुला उल्बणा, मरा ये सात स्रोत
वाले आवर्त वायु के विष सम्बन्ध से क्रम से आकाश विद्युत्तरङ्गों के सन्धिमार्ग आदि में स्वतः ७ दुःख-
दायक विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं ॥ ४५-४६ ॥
एवमुक्त्वा कुण्टिणीदर्पणानामाद्यं क्रमात् ॥ ४७ ॥
इदानीं तत्पाकविधिसङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ४८ ॥
इस प्रकार कुण्टिणी दर्पण आदि नाम क्रम से कह कर अब उसके पकाने की विधि संक्षेप से
कही जाती है ॥ ४७-४८ ॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—यह कहा है दर्पण प्रकरण में—
मृत्पञ्चकं कञ्चुकसप्तकं च फेनत्रयं षण्मुखसारपञ्चकम् ।
श्वित्राष्टकं खड्गनखत्रयं च क्षाराष्टकं बालुकसप्तकं च ।
पाराष्टकं शङ्कचतुष्टयञ्च मातुलुङ्गाष्टकं वरतालकत्रयम् ॥ ४९ ॥
गजोष्ट्रयोः क्षारचतुष्टयं च सुरन्धिकासप्तक पञ्चतैलम् ॥ ५० ॥
मुक्तात्वगष्टत्रितयं च शुक्ति क्षारं तथेन्दुचतुष्टयं च ।
एतान् शुद्धान् क्रमतो गृहीत्वा सम्पूरयेच्छिङ्गिकमूपमध्ये ॥ ५१ ॥
संस्थाप्य शिञ्जीरककुण्डमध्ये संगालयेत् सप्तशतोष्णकक्ष्ये ।
पूर्वोक्तमार्गेण नियोजयेत् तद्रस यथाशास्त्रविधानतस्तत ॥ ५२ ॥
अत्यन्तसूक्ष्म सुदृढ भवेद् रुच बालार्कवत् कुण्टिणीकाख्य दर्पणम् ॥५३॥
मृत्—सौराष्ट्र मृत्तिका ५ भाग, कञ्चुक—सर्प की केंचुली ७ भाग, समुद्रफेन ३ भाग, षण्मुख-
सार—खरबूजे के बीज ५ भाग, श्वित्रा—लोहविशेष-जस्ता ? ८ भाग, गेण्डे का नाखून खुर ३ भाग, क्षार-
यवखार ८ भाग या आठों क्षार एक एक भाग, रेत ७ भाग, पारा ८ भाग, शङ्ख ४ भाग, मातुलुङ्ग ?—
कातुण-गन्धतृण ? ६ भाग, शुद्ध हरिताल ३ भाग, गज—गजपिप्पली और उष्ट्र—ऊंट कटीला के क्षार
४ भाग या गज—हाथी और उष्ट्र—ऊण्ट की हड्डी का क्षार ४ भाग, सुरन्धिका ?—बड़े नलशर का क्षार
७ भाग, तैल—तिल तेल ५ भाग, मुक्ता त्वक्—मोती की त्वचा ८ भाग, शुक्ति क्षार—सीपी का क्षार ३
भाग, इन्दु—कपूर ४ भाग । इन शुद्ध द्रव्यों को क्रम से लेकर शिङ्गिक मूषा मध्य में भर कर शिञ्जीरक
कुण्ड मध्य में ७०० दर्जे की उष्णता से गलावे । पूर्वोक्त मार्ग से पिघले रस को शास्त्रविधान से नियुक्त
करे, अत्यन्त सूक्ष्म दृढ चमकदार बाल सूर्य की भांति सुदृढ़ कुण्टिणी नामक दर्पण बन जावे ॥४९-५३॥
अथ पिञ्जलादर्पणनिर्णयः—अब पिञ्जुलादर्पण का निर्णय देते हैं—