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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

७० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शक्तिप्रसवयन्त्रेण मूलशक्तिरुदीरिता ॥ ११३ ॥
एवं क्रमात् सप्त यन्त्रशक्तय परिकीर्तिताः ।
तुन्दिल, पञ्जर, अं'शुप, अपकर्षक, सान्धानिक, दार्पणिक, शक्तिप्रसवक, ये ७ विमान शक्तियों
के यन्त्र निर्णय किये गए हैं । उन यन्त्रों के मुख से ही उनकी शक्ति की किया आदि होती है जो कि
तुन्दिल से उद्गमा शक्ति, पञ्जर से पञ्जरा, शक्तिर से सूर्य्यशक्त्यपकर्षिणी शक्ति, अपकर्षक यन्त्र से पर-
शक्त्यपकर्षिणी, सन्धान यन्त्र से द्वादश शक्तियां, दार्पणिक से कुण्टिणी नामक शक्ति, शक्तिप्रसवयन्त्र
से मूलशक्ति कही है इस प्रकार क्रम से ७ यन्त्रशक्तियां कही हैं ॥ १०६—११३ ॥