बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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सोमक?-कपूर या लोहा विशेष ८ भाग, शेश-बोल-गन्धबोल ३ भाग, राजकुटिका-पीलीकटसरिया या
कुटज २ भाग, अङ्गारों का सार-भस्मक्षार ८ भाग, सुहागा ३ भाग, नखी ओषधि ८ भाग, बालू ७ भाग,
मातृएण-कालुण-गन्धतृणं ८ भाग, रवितुम्बक-सूर्यकान्तमणि २ भाग, पूर-दाह अगर या बीजपूर
निम्बु ? ३ भाग, पारा २५ भाग, हरिताल ३ भाग, रौप्य--रूपा धातु ४ भाग, ऋव्याद् ? ८ भाग, गरद्-
वच्छनाग ८ भाग, विष्ट-विष्ठा ३ भाग, कन्द-सूरणकन्द ४ भाग, वाराहपिन्थ--कृष्ण मदन वृक्ष का
क्षार या सूअर पशु का पित्त ३ भाग, सार-वज्रक्षार या यवक्षार या नवसार नौसादर ५ भाग, गुञ्जा-रत्ति
का तैल २५ भाग क्रम से इन्हें लेकर सात संस्कार करके मूषक मूषिका बोतल में भर दे । मूषास्य कुण्ड
में ८०० दर्जे की उष्णता से नेत्र निमीलन तक गलावे पश्चात् लेकर बड़े दर्पणगास्य यन्त्र के ऊपर नाल
के मुख में नियुक्त करे । ऐसा करने पर वैराजदर्पण-वैरूप्यदर्पण शुद्ध सूक्ष्म हो जाता है ॥३६-४०॥
अथ कुण्टिणीदर्पण निर्णय-अब कुण्टिणीदर्पण का निर्णय देते हैं-
इत्युक्त्या वैराजकाख्यदर्पणं शास्त्रतस्स्फुटम् ।
इदानीं कुण्टिणीदर्पणस्वरूपं प्रचक्षते ॥ ४१ ॥
यदशुभासन्निधानात् सर्वबुद्धिविकल्पनम् ।
भवेत् कुण्टिणीदर्पणं इति प्रोच्यते बुधै ॥ ४२ ॥
इस प्रकार वैराजकाख्यदर्पण-वैरूप्यदर्पण शास्त्र से स्फुट कह कर अब कुण्टिणी दर्पण का
स्वरूप कहते हैं। अंशुभा-किरणज्योति के संसर्ग से सब की बुद्धियों का विपर्यास हो जाता है अत
कुण्टिणी दर्पण विद्वानों ने कहा है ॥ ४१-४२ ॥
तदुक्तं पराङ्कुशे--वह कहा है पराङ्कुश में-
आकाशविद्युत्तरङ्गसन्धिमार्गं स्वभावतः ।
सप्तस्रोतावर्तं वातविषसयोगत क्रमात् ॥ ४३ ॥
बुद्धेर्विकल्पदासप्त जायन्ते विषशक्तय ।
तासा निवारणार्थाय यत्कृत शास्त्रवित्तमैः ॥ ४४ ॥
तत्कुण्टिणीदर्पण इत्युक्त नाम्ना विशेषत ।
आकाश की विद्युत्तरङ्गों के सन्धिमार्ग में स्वभावत ७ स्रोतोंवाला आवर्त घुमेर करने वाले
वायु के विषसंयोग से क्रम से बुद्धि का विपर्यास करने वाली ७ विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं। उनके
निवारणार्थ जो शास्त्रों के विशेषज्ञों ने किया है, वह कुण्टिणीदर्पण नाम से विशेषतः कहा है ॥४३-४४॥
विषशक्तिविनिर्णयस्तु-उक्तं हि सम्मोहनक्रियाकाण्डे-विषशक्ति विनिर्णय तो सम्मोहन
क्रियाकाण्ड में कहा है-
मेदोसृङ्मासमज्जास्थित्वग्बुद्धीना विकल्पदाः ।
गालिनी कुण्टिणी कालीस्पिञ्जुला उल्बणामरा ॥ ४५ ॥