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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

दर्पणाधिकरण ] [ ६७
संगालयेत् सप्तोष्णकक्ष्यैश्शास्त्रोक्तमार्गेण निमीलनान्तान् ।
पश्चात् समाहृत्य शनेश्शने क्रमाद् यन्त्रोर्ध्वनालस्य मुखे नियोजयेत् ॥ ५९ ॥
ततो गुहागर्भकदर्पणो भवेच्छुद्ध सुसूक्ष्म सुदृढ मनोहरम् ॥ ६० ॥
वराटिका—कौड़ी ७ भाग, मञ्जुल—मजीठ ३ भाग, डिम्भीर ?—डिण्डीर—समुद्रफेन ६ भाग,
रजक—रञ्जक—शिंगरफ ८ भाग, मण्डूर—लोहमल ६ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग, ताल—हरिताल ३ भाग,
ब्राह्मिका—भारङ्गी ७ भाग, नाग—सीसा २ भाग, आञ्जनिक—सुरमा ८ भाग, मातृण्ण—कातृण—गन्ध-
तृणण ६ भाग, अच्छा रेत ८ भाग, किशोर-तैलपर्णी या घोटक शिग्रु ( सोंजना ) ६ भाग, मुचुकुन्द—
मुचुकुन्द पुष्प ४ भाग, तिलतैल २ भाग, लोह्निक—सफेद सुहागा २५ भाग, मुडाणिगर्भोद्भव सत्त्व ?
५ भाग, मृत्—सौराष्ट्रमृत्तिका ८ भाग, स्फटिकमणि या फिटकरी ५ भाग, शल्य—हड्डी या लालखैर-कत्था
३ भाग, इन्दुसत्त्व—चन्द्रकान्त का सत्त्व या कपूर १५ भाग, दग्धोलिटाका ?—लोहा विशेष ५ भाग ।
इन २२ वस्तुओं को शुद्ध लेकर चक्रपुट मूषामध्य में चक्रपुट व्यासटिका के अन्दर डाल दे । ७०० दर्जे
की उष्णता से शास्त्रोक्त मार्ग से निमीलन तक गलावै, पश्चात् लेकर धीरे धीरे यन्त्र के उपरिनाल के मुख
में डाल दे फिर गुहागर्भ दर्पण शुद्ध सूक्ष्म सुदृढ़ मनोहर बन जावे ॥ ८५--६० ॥
अथ रौद्रीदर्पण निर्णय.—अब रौद्रीदर्पण का निर्णय देते हैं—
दर्शनादेव सर्वेषां द्रावणं येन जायते ।
तद्रौद्रीदर्पणं इति प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ६१ ॥
दर्शन से ही सब का द्रावण जिससे होता है वह रौद्रोदर्पण है ऐसा मनीषी कहते हैं ॥६१॥
तदुक्त पराङ्कुशे—वह पराङ्कुश में कहा है—
रुद्राण्योपराभ्रलिङ्गो यत्र सम्मेलनं भवेत् ।
रौद्रीनाम भवेत् काचिच्छक्तिस्तत्रोग्ररूपिणी ॥ ६२ ॥
अर्कशुयोगतस्सा तु सर्वान् सम्द्रावयेत् स्वयम् ।
यद् रुद्राण्योषराभ्रलिङ्गाभ्यां क्रियते क्रमात् ॥ ६३ ॥
तद् रुद्राणीदर्पण इत्युक्तं शास्त्रविदां वरै ।
रुद्राण्योषरा ? और अभ्रलिङ्ग ? जहां मिलें वहां रौद्री नामक कोई शक्ति उग्ररूपी प्रकट हो
जाती है । सूर्यकिरणों के योग से वह सब को द्रवित कर दे, जो कि रुद्राण्योषरा और अभ्रलिङ्ग से क्रम
से किया जाता है वह रुद्राणीदर्पण शास्त्रज्ञ विद्वानों ने कहा है ॥ ६२--६३ ॥
उक्तं च सम्मोहनक्रियाकाण्डे—कहा है सम्मोहनक्रियाकाण्ड में—
रौद्री भान्वंशसंयोगाज्जायते मारिकाभिधा ।
विषशक्तिस्तया सूर्यकिरणाशनिसम्भव ॥ ६४ ॥
तत्सदर्शनमात्रेण परयानविनाशनम् ।
यत् करोति विशेषेण तद्रौद्रीदर्पणो भवेदिति ॥ ६५ ॥
रौद्रीदर्पणनामादीनेवमुक्त्वा यथाविधि ।
तत्पाकविधिमद्यात्र सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६६ ॥