बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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तास्समाहृत्य वेगेन विद्युत्संयोगत पुन ।
प्रसार्य परयानस्थजनोपरि विशेषत ॥ ७२ ॥
य प्रयच्छति दुखानि विषरोगादिभिस्त्वत ।
स गुहादर्पण इति प्रवदन्ति मनीषिण ॥ ७३ ॥
बारुणी-अश्रविद्युच्छक्ति वायु किरण शक्तियों के संघर्ष के कम से मनुष्यों को रोग देने
वाली गुहादि विषशक्तिया उत्पन्न हो जाती हैं। उन्हें विद्युत् के संयोग से वेग से लेकर दूसरे शत्रु के
विमान के ऊपर प्रसारित करके-डाल कर जो विषरोग आदि से दुःखों को देती है। अत गुहादर्पण-
गुहागर्भदर्पण मनीषी कहते है ॥ ७१-७३ ॥
तदुक्त प्रपञ्चसारे-वह कहा है प्रपञ्चसार ग्रन्थ में-
कश्यपोर्ध्वकपालाभ्या मध्ये तिष्ठति वारुणी ।
कपालवारुणीमध्ये वाता पञ्चसहस्रका ॥ ७४ ॥
तथैव कश्यपारोगकिरणाश्चाष्टकोटय ।
तत्तद्वातसमायोगात् प्रभिन्ना किरणा पुन ॥ ७५ ॥
अनुलोमविलोमाभ्या वहन्ति विशेषत ।
शक्तिवाताशुसंयोगो यदा स्यात् खे परस्परम् ॥ ७६ ॥
महादु खकरास्तत्र गुहाद्या विषशक्तय ।
जायन्ते वेगसयुक्ता जले बुद्बुदवत्स्वयम् ॥ ७७ ॥ इति
कश्यपो के ऊपर दो कपालों के मध्य वारुणी शक्ति रहती है, कपाल और वारुणी के मध्य
पाच सहस्र वायुए हैं तथा कश्यप ओर रोगकिरण आठ करोड़ हैं, उस उस वायु के सम्मेल से फिर
किरणें पृथक् पृथक् अनुलोम और विलोम के द्वारा विशेषत चलती हैं। जब शक्ति-वारुणी शक्ति वायु
और किरणो का सयोग आकाश में परस्पर हो जावे तो वहां महादु ख करने वाली गुहा आदि शक्तिया
वेगवश जल में बुद्बुद की भांति स्वयं उत्पन्न हो जाती है ॥ ७४ -७७ ॥
लल्लोपि- लल्ल ने भी कहा है-
दशोत्तरशतन्यायमनुसृत्य यथाक्रमम् ।
शक्तिवाताशुसंयोगो यदा भवति वेगत ॥ ७८ ॥
तदा सघर्षण तेषामतिवेगाद् भविष्यति ।
जायन्ते तेन विविधा गुहाद्या विषशक्तय ॥ ७६ ॥
तत्प्रयोगान्नृणा लोके ॐभवेन्नानाविधामया ॥ इत्यादि ।
११० न्याय ? को अनुसरण कर यथाक्रम शक्ति-वारुणी शक्ति वायु और किरणों का सयोग
जब वेग से होता है तब उनका संघर्ष वेग से होगा-हो जाता है, उससे विविध गुहादि विषशक्तिया
उत्पन्न हो जाती हैं उनके प्रयोग से मनुष्यों के लोक में नानाविध रोग हो जावे ॥ ७८- ७६ ॥
- भवेत्-बचनव्यत्यय-आर्ष ।