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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 368 में से

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पृष्ठ 86

दर्पणाधिकरण ] [ ६३
अर्कांशुयुद्धसञ्जातशक्तिस्स्यात् पिञ्जुलेति हि ।
सा नेत्रकृष्णताराग्रप्रभाग्राहिति वर्णिता ॥ ५४ ॥
यतो निगृह्य तच्छक्तिं वेगेन स्वीयशक्तितः ।
यन्तॄणां कृष्णताराग्रप्रकाशं पालयत्यत । ॥ ५५ ॥
पिञ्जुलादर्पणं इति नाम शास्त्रे निरूपितं ।
सूर्यकिरणों के युद्ध से उत्पन्न शक्ति पिञ्जुला है वह नेत्र के काले तारे के अग्र की ज्योति
को ले लेने वाली कही है, जिससे अपनी शक्ति से यात्रियों के कृष्णताराम्र प्रकाश को वेग से लेकर
पालन करती है। इसलिए पिञ्जुलादर्पण नाम से शास्त्र में वर्णित है ॥ ५४-५५ ॥
तदुक्तमंशुबोधििन्याम्— यह कहा है अंशुबोधिनी में--
अग्ने पूर्वदिशस्य स्थानमारभ्य संख्यतः ।
उपदिश्यस्य स्थानान्तमष्टधा दिग्विनिर्णय ॥ ५६ ॥
यजुरारण्यके प्रोक्तमंशूनां जातिनिर्णये* ।
एकैकदिशि सञ्जाता रश्मयो भिन्नशक्तयः ॥ ५७ ॥
इति शास्त्रेऽग्निभेदात्प्रवदन्ति मनीषिणः ।
ऋतुकालप्रभेदेन पञ्चवातप्रवेशतः ॥ ५८ ॥
तेषामन्योन्यसंसर्गो वारुणोयोगतो भवेत् ।
अतोऽशूनां भवेद् युद्धं शक्तिभेदत्वकारणात् ॥ ५९ ॥
तस्मिन् परस्परं वेगात् तत्तद्दिशि विशेषतः ।
मघर्षणात् प्रजायन्ते चत्वारि विषशक्तयः ॥ ६० ॥
अन्धान्धकारपिञ्जूरतारपा इति तत् क्रमात् ।
रक्तजाठरताराग्रप्रभाक्षाक्षिक्षयं हनेन् ॥ ६१ ॥ इत्यादि ॥
इस अग्नि के पूर्व दिशा में स्थान को आरम्भ कर संख्या से उपदिशा में इसके स्थान के
अन्त तक ८ प्रकार से निर्णय है, यजुर्वेद के आरण्यक में किरणों के जाति निर्णय में कहा है। एक एक
दिशा में उत्पन्न किरणें भिन्न-भिन्न शक्तिया शास्त्रों में अग्नि के भेद से, ऋतुकाल के भेद से, पांच
वायुओं के प्रवेश से उनका अन्योन्य संसर्ग वारुणी—मेघस्थ वैद्युत शक्ति के योग से होता है अत
किरणों का युद्ध शक्तिभेद के कारण हो जाता है। वहा परस्पर वेग से उस उस दिशा में विशेष संघर्ष
से ४ विषशक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं। अन्ध, अन्धकार, पिञ्जूष, तारपा क्रम से रक्त जाठर ताराम्र प्रभा
दोनों आंखों का नाश कर दे ॥ ५६--६१ ॥
उक्तं सम्मोहनक्रियाकाण्डेऽपि— सम्मोहनक्रियाकाण्ड में भी कहा है—
सूर्याशुयुद्धात् (द्ध ?) सञ्जाताश्चत्वारि विषशक्तयः ।
अन्धान्धकारपिञ्जूषनेत्रघ्ना इति वर्णिता ॥ ६२ ॥

  • "धनु न जातमष्टरोदसी" (तै० ब्रा० १।७।५।)