बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
( ग )
विषय पृष्ठ
विमान के मार्ग में आई सूर्यकिरणों को स्वाधीन करके विमान को निर्बाध गतिशील
करता है ॥ ८५ - ६६
कापी संख्या ७—
द्रावक तारों पर लपेटने के लिए गेण्डे आदि चर्म का विधान। वातसंयोजक,
धूमप्रसारण आदि यन्त्रों का निर्माण । ३२ मणिवर्गों के १२ वें वर्ग में कही १०३
मणियों का विमान में सूर्यकिरणाकर्षणार्थ उपयोग लेना । परिवेषक्रियायन्त्रद्वारा विमान
में वातसंयोजन धूमप्रसारण सूर्यकिरणाकर्षण आदि व्यवहार ॥ १००-११०
कापी संख्या ८—
ग्रहों के चार अतिचार आदि विरोधी गतियों के संघर्ष से आकाश में बहती
हुई विषशक्ति के आक्रमण या प्रभाव से विमान के अङ्गों को निष्प्रभाव रखने के लिए
अङ्गोपसंहारयन्त्र का विधान तथा भूगर्भ से उद्भूत और पृथिवी की बाह्यकक्षाओं से
प्रकट हुए अनिष्टों के निवारणार्थ विस्तृतास्यक्रियायन्त्र का स्थापन । शत्रुओं पर कृत्रिम
विविध धूमप्रकाश को वैरुप्यदर्पणद्वारा फेंक कर उन्हें विरूप करना मूर्च्छा आदि भिन्न
भिन्न रोगों में ग्रस्त करना ! आकाशीय वातावरण से विमान के अङ्गों तथा विशेषत
उपरि अङ्गों में शिथिलता आ जाने और उनपर मल लिप्त होजाने से बचाने को पद्मपत्र-
मुखयन्त्र का विधान ॥ १११-१२७
कापी संख्या ६—
ग्रीष्मकाल में उष्णकिरणों के मेल से कुलिका नाम की शक्ति विमान को
भस्म कर देने वाली उत्पन्न हो जाती है उसे कुण्टिणीशक्तियन्त्र के विविध अङ्गोंद्वारा
पी लिये जाने का वर्णन, तथा ग्रीष्म में विषयुक्त पञ्चशिखा नाम की घातिका शक्ति
उत्पन्न हो जाती है जो कि प्राणियों के जीवनरस का शोषण एवं अनेकविध रोगों का
निमित्त है उसे नष्ट करने के लिये पुष्पिणीयन्त्र (पुष्पाकार अरायन्त्र) लगाना, जो कि
उसके विषयुक्तप्रवाहों को बाहिर निकाल देता है। दो वायुओं के आवर्त्त--चक्रधूम
एवं सूर्यकिरणों के संसर्ग से वज्रसमान विद्युत् का पतन हो जाया करता है उससे बचने
के लिये पिञ्जुलादर्शयन्त्र का विमान में लगाना ॥ १२८-१४५
कापी संख्या १०--
शत्रु के द्वारा भूमि में दबाए--छिपाए हुए महागौलाग्नियन्त्र का गुहागर्भादर्श
यन्त्र ( दूरबीन जैसे यन्त्र) द्वारा सूर्यकिरणों (ऐक्सरे की भांति) पकड भूमि में प्रविष्ट कर
निर्यासपट पर प्रतिबिम्ब (फोटो) लेलेना ॥ १४६-१५४
कापी संख्या ११--
शत्रु पर अन्धकार फैलाने वाला तमोयन्त्र । आकाशीय १३ वातावरण में हुए
( घ )
विषय पृष्ठ
वातसंघर्ष से विमान को बचाने वाला पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र लगाना जिसके नालों से
वातविषशक्तिया विमान से खिंचकर बाहिर निकल जाती हैं । आवह आदि १२२ भेदों
में हैं ७६ वा वातायन प्रवाह है जहां ग्रीष्म ऋतु में विमान की वक्रगति से यात्रियों को
हानि की सम्भावना है विमान की वक्रगति को रोकने के लिये विमान के लिये विमान
के नीचे पार्श्वकेन्द्र में वातस्तम्भनाल कीलयन्त्र लगाना । वर्षा ऋतु में विद्युत् से उत्पन्न
अग्निशक्ति की शान्ति विद्युद्दर्पणयन्त्र से हो जाना बर्फ के समान ठण्डा हो जाना।
आकाशीय ३०४ शब्दों में मेघतरङ्ग वायु विद्युत् की कड़क से ८ वें स्तर में श्रोत्र-
विदीर्णता और बधिरता आदि हानि से बचने को शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र लगाना ॥ १५५-१७३
कापी संख्या १२-
आकाश में रोचिषी आदि १२ उल्काएं विद्युत् से भरी हैं उक्त उल्काओ
में स्थित विद्युत् के प्रहार से विमान को बचाने के लिये विद्युदुद्वादशकयन्त्र लगाना ।
विमान में स्थित धूम, विद्युत् और वायु को नियन्त्रित करने और उपयोग में लेने के
लिये प्राणकुण्डलिनी यन्त्र लगाना । जिससे विमान की विविध गतिया सिद्ध होती हैं ॥ १७४-१८३
कापी संख्या १३-
आकाश में ग्रहों के प्रभाव से विमानपथरेखा में शीतरसधारा शीतधूमधारा
शीतवायुधारा वेगसे आ जाया करती हैं जोकि विमानके कलपुर्जो को शिथिल और यात्रियों
को रुग्ण तथा विमानपथ को अदृश्य कर दिया करती हैं उन्हें निष्फल करने या उनके
प्रहार से बचने के लिये शक्त्युद्गमयन्त्र लगाना । शत्रुद्वारा दम्भोलि (तारपीडो जैसे)
आदि विघातक आठ यन्त्र स्वविमान के मार्ग में फेंके हुओं से बचाने के लिये
स्वविमान की वक्रगति देने के निमित्त वक्रप्रसारणयन्त्र लगाना । विद्युत्शक्ति को सर्वत्र
विमानाङ्गों में प्रेरित करने के लिये विद्युत-शक्ति से पूर्ण तारों से घिरा पिञ्जरा जैसा
शक्तिपञ्जरयन्त्र लगाना। मेघों से विद्युत् के पतन की आशङ्का पर विमान के शिर पर
छत्री के आकार का घूमता हुआ शिर कीलकयन्त्र लगाना जिससे विद्युत् का प्रभाव
कोसों दूर रहे । विविध शब्दों भाषा भाषणो बाजे स्वर सङ्कल्प आदि को खींचनेवाला
शब्दाकर्षणयन्त्र लगाना ॥ १८४-१८६
कापी संख्या १४-
भिन्न भिन्न भय आदि अवसरों पर जैसे वैसे रंग के वस्त्र का प्रसारण होना
आठों दिशाओं में ग्रहों और किरणो की सन्धियों में ऋतुकाल सम्बन्धी १५ कौबेर-
विद्युत् शक्तिपूर्ण वायुए हैं उनसे यात्रियों को विविध कष्ट सम्भावनीय हैं उनसे बचाने
के लिये दिशाम्पतियन्त्र लगाना ॥ १८६-२१२
कापी संख्या १५-
ग्रहों के सञ्चार मार्गों में ग्रहों के परस्पर, एक रेखाप्रवेश से ग्रहसन्धि में
( ङ )
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ज्वालामुखीविषशक्ति है जिससे यात्री मर जाते तक हैं उस विषशक्ति के नाशार्थ पट्टिका-
भ्रकयन्त्र लगाना । शरद् और हेमन्त ऋतु की शीतता को निवृत्त करने के लिये
सूर्यशक्त्यपकर्षण यन्त्र लगाना । शत्रु के विमानोंद्वारा अपना विमान घिर जाने पर
उनके ऊपर अपस्मारधूमप्रसारणार्थ अपनी रक्षा के अर्थ अपस्मारधूमप्रसारणाख्ययन्त्र
लगाना । अभ्रमण्डलों एवं वायुप्रवाहों के सङ्घर्ष में विमान को अविचलित रखने के
लिये स्तम्भनयन्त्र का होना । अग्निहोत्रार्थ और पाकार्थ वैश्वानरनालयन्त्र भी लगाना ॥ २१३-२२८
कापी संख्या १६--
मान्त्रिक, तान्त्रिक, कृतक ( यान्त्रिक ) नाम से विमानों के तीन जातिभेद ।
त्रेतायुग में मान्त्रिक--मन्त्रप्रभाव योगसिद्धि से, द्वापर में तान्त्रिक-तन्त्रप्रभाव-
औषध युक्ति से, कलियुग में कृतक-यान्त्रिक-यन्त्रकलापरायण। मान्त्रिक विमान के
२५ प्रकार "यन्त्रसर्वस्व" ग्रन्थ में महर्षि भरद्वाज के अनुसार, किन्तु "मणिभद्रिका"
ग्रन्थ में गौतम के अनुसार ३२ हैं ॥ २२६-२३६
कापी संख्या १७--
तान्त्रिक विमान के भेद ५६ कहे हैं । कृतक अर्थात् यान्त्रिक-यन्त्रकला से
चालित विमान २५ प्रकार के हैं । कृतक ( यान्त्रिक) विमानों में प्रथम शकुन विमान
है उसके पीठ पक्ष पुच्छ आदि २८ अङ्गों का वर्णन और रचना भिन्न भिन्न ओषधि
खनिज पदार्थों के पुट से बनाए हुए भिन्न भिन्न कृत्रिम लोहों से करना । शकुन विमान
की पीठ पर तीन बड़े कमरे बनाना, प्रथम में विमान के अङ्गयन्त्रों और उपकरणों को
रखना दूसरे में स्तम्भ के साथ यात्रियों के बैठने को घर ( Compartments )
तीसरे में विमान के सिद्ध यन्त्र आदि साधन । शकुन विमान में चार औष्ण्य यन्त्र
( ऐञ्जिन ), चार वाताकर्षण यन्त्र वायु को खींचने के लिये, भूमि पर सञ्चार करने
को भी चक्र लगाना ॥ २३७-२५२
कापी संख्या १८--
दूसरा सुन्दर विमान है, उसमें धूमोद्गम आदि ८ विशेष अङ्ग हों । पात्र में
धूमाञ्जन तैल, हिंगुल तैल, शुक्ततुण्डि तैल, कुलटी ( मन शिला ) का तैल भरना ।
विद्युत् के संयोजनार्थ मणिपीठ के अन्दर नालमार्ग से दो तार लगाना, नालस्तम्भ के
अन्दर धूम को रोकने और फेंकने के अर्थ छिद्रसहित घूमने वाले तीन चक्र नाल सहित
लगाना तैलधूम और जलधूम की नालें उन्हें बाहर निकालने को लगाना एवं ४० यन्त्र
सुन्दर विमान में लगाना । शुण्डाल--शुण्ड जैसा यन्त्र १ बालिश्त मोटा १२ बालिश्त
लम्बा ऊंचा हो जिससे विमान दौड़ता है। दूध गोन्द वाले वृक्षों के दूध गोन्द तथा
विशेष निर्दिष्ट लोहे आदिको मिला कर शुण्डाल का बनाया जाना । शुण्डाल से धूम
निकालने और वायुको खींचने के द्वारा विमान का चलाना । संघर्षण,पाकजन्य,जलपात,
( घ )
विषय पृष्ठ
सांयोजक, किरणजन्य आदि ३२ विद्युद्यन्त्र होते हैं परन्तु विमान में सांयोजक विद्यु-
द्यन्त्र का लगाया जाना अगस्त्य के शक्तितन्त्र के अनुसार कहा जाना ॥ २५३-२६६
कापी संख्या १९----
विद्युत्-शक्ति पूरक पात्र बनाने का प्रकार, विमानको भूमि से ऊपर उठानेके
लिए वातप्रसारणयन्त्र (वायुके फेंकनेवाला यन्त्र) लगाना, २६०० कक्ष्यागति (अश्वगति)
से वात को फेंकना, वायु के निकलने से विमान का वेग से दौड़ना । सुन्दरविमान
का आवरण भी शकुनविमान की भांति राजलोहे से बनाया जाना, कमरे और शेष ३२
अंग भी वैसे ही बनाना । विमान के चलने में धूम आदि निकालने का वेगप्रमाण
गणित शास्त्र से निश्चित किया जाना, एक चुटकी बजाने जितने काल में धूमोद्गम
यन्त्र (एन्जिन) से औष्म्य वेग ३४८० लिङ्क (डिग्री) प्रमाण में हो जाने पर विमान
का एक घड़ी में ४०० योजन अर्थात् एक घण्टे में ४००० कोस (लगभग ८०००
मील) परिमाण से गति करना ॥ २७०-२८०
कापी संख्या २०----
तीसरे रुक्मविमान का राजलोहे से बनना और पाकविशेष से रुक्म अर्थात्
स्वर्ण रंग वाला बन जाना अत एव उसका रुक्म विमान नाम से कहा जाना । १२
बालिश्त लम्बा चौडा लोहपिण्ड चक्र श्रृंखला तन्त्री (जञ्जीर) द्वारा अन्य चक्रों से युक्त
होने पर गतिशील होता है, अंगूठे द्वारा बटनका दबाने से सब कलायन्त्रों का चल
पडना और विद्युत् के योग से धूम का ५०० लिंक (डिग्री) वेग हो जाना चकताइडन-
स्तम्भ के आकर्षण से विमान का वेग से उड़ना । रुक्म विमान में अभ्रक की भित्तिया
आदि बनाया जाना ॥ पृष्ठ २८१-३०१
कापी संख्या २१-
त्रिपुर विमान अपने तीन आवरणों से पृथिवी जल आकाश में चलने वाला
होने से त्रिपुर विमान नाम से प्रसिद्ध होना । प्रथम भाग से पृथिवी पर दूसरे भाग से
जल में तीसरे भाग से आकाश में गमन करता है । त्रिपुर विमान में किरणजन्य
विद्युत् से काम लेना । त्रिपुर विमान के ऊपर नीचे चक्रों में शक्ति होने से उसका
पर्वतों पर चढ़ने तिरछे चलने में समर्थ होना । त्रिपुर विमान में अभ्रक का विशेष
प्रयोग करना, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र नाम से अभ्रक के चार भेद कहे गए, श्वेत
ब्राह्मण रक्त क्षत्रिय पीत वैश्य और कृष्ण शूद्र अभ्रक बतलाया है । ब्राह्मण अभ्रक के
१६, क्षत्रिय अभ्रक के १२, वैश्य अभ्रक के ७ और शूद्र अभ्रक के १५ भेद । त्रिपुर
विमान में दिशाओं में घूमने वाले घर लगाना । उसका प्रथम आवरण सब से बड़ा
दूसरा उससे छोटा तीसरा और भी छोटा होना । प्रथम आवरण के ऊपर नीचे मुख-
वाले पेंचों में घूमने वाले हस्त चक्रों-मण्डूक हस्तचक्रों का लगाया जाना उनका विद्युत्-
तारों से युक्त हो जल में गति करना ॥ पृष्ठ ३०२-३१८
( छ )
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कापी संख्या २२-
जल में गमनार्थ प्रथम आवरण का संकोच कर लेना दूसरे आवरण के नीचे
यन्त्रों को ले आना क्षीरीपट का आवरण में उपयोग । ऊपर की वायु को चूसने के लिए
सीत्कारी यन्त्र का लगाना जिससे सर्वत्र वायु प्राप्त हो । विमान में वेणीतन्त्री—चिन्ता-
सूचिका डोरी लगाना । भाषणाकर्षक दिशाप्रदर्शक, शीतोष्णत्वमापक यन्त्र भी लगाना
कहा है । अत्यन्त वर्षा, वात, धूप आदि के प्रतीकार करने वाले यन्त्र भी लगाना । इस
प्रकार वर्षोपसंहार यन्त्र, भ्रास्यवातनिरसन यन्त्र, आतपोपसंहारयन्त्र लगाने बतलाए
हैं । वर्षोपसंहार यन्त्र कौञ्चिक (कृत्रिम) लोहे से बनाना इस यन्त्र से विमानसम्बन्धी
ऊर्ध्वगामी वायु के साथ पुरोवात-वर्षावात (पुर्वा हवा) का संघर्ष हो जाने से पुरोवात दो
टुकडों में विभक्त हो जाती है जो कि जल की दो शक्तियों द्रव (पतलापन) और प्राएन
( गीलापन ) हैं जिससे विमान पर जल बरस न सकेगा और उसे गीला
हस्तलिखितग्रन्थप्रदर्शित विषयानुक्रमणिका
अध्याय १
१—मङ्गलाचरणम् ।
२—विमानशब्दार्थाधिकरणम् ।
३—यन्तृ (तृ ?) त्वाधिकरणम् ।
४—मार्गाधिकरणम् ।
५—आवर्ताधिकरणम् ।
६—अङ्गाधिकरणम् ।
७—वस्त्राधिकरणम् ।
८—आहाराधिकरणम् ।
६—कर्माधिकाराधिकरणम् ।
१०—विमानाधिकरणम् ।
११—जात्यधिकरणम् ।
१२—वर्णाधिकरणम् ।
अध्याय २
१३—संज्ञाधिकरणम् ।
१४—लोहाधिकरणम् ।
१५—संस्काराधिकरणम् ।
१६—दर्पणाधिकरणम् ।
१७—शक्त्यधिकरणम् ।
१८—यन्त्राधिकरणम् ।
१६—तैलाधिकरणम् ।
२०—ओषध्यधिकरणम् ।
२१—वाताधिकरणम् ।
२२—भाराधिकरणम् ।
२३—वेगाधिकरणम् ।
२४—चकाधिकरणम् ।
अध्याय ३
२५—भ्रामण्यधिकरणम् ।
२६—कालाधिकरणम् ।
२७—विकल्पाधिकरणम् ।
२८—संस्काराधिकरणम् ।
२६—प्रकाशाधिकरणम् ।
प्रकाशाधिकरणम् ❊ ।
३०—उष्णाधिकरणम् ।
३१—शैत्याधिकरणम् ।
३२—आन्दोलना (न ?) धिकरणम् ।
३३—तिर्यङ्गाधिकरणम् ।
३४—विश्वतोमुखाधिकरणम् ।
३५—धूमाधिकरणम् ।
३६—प्राणाधिकरणम् ।
३७—सन्ध्यधिकरणम् ।
अध्याय ४
३८—आहाराधिकरणम् ।
३६—लगाधिकरणम् ।
४०—वगाधिकरणम् ।
४१—हगाधिकरणम् ।
४२—लहगाधिकरणम् ।
४३—लवगाधिकरणम् ।
❊ हस्तलेख में कापी करने वाले के प्रमाद से पुनरुक्ति है ।
[२]
४४-प्लवहङ्गाधिकरणम् ।
४५-वान्तर्गमनाधिकरणम् ।
४६-वान्तर्लङ्गाधिकरणम् ।
४७-अन्तर्लक्ष्याधिकरणम् ।
४८-बहिर्लक्ष्याधिकरणम् ।
४६-वाह्याभ्यन्तर्लक्ष्याधिकरणम् ।
अध्याय ५
५०-तन्त्राधिकरणम् ।
५१-विस्तृतप्रसारणाधिकरणम् ।
५२-व्याप्त्यधिकरणम् ।
५३-स्तम्भनाधिकरणम् ।
५४-मोहनाधिकरणम् ।
५५-विकाराधिकरणम् ।
५६-दिङ्निदर्शनाधिकरणम् ।
५७-अदृश्याधिकरणम् ।
५८-तिर्य्यग्वाधिकरणम् ।
५६-भारवहनाधिकरणम् ।
६०-घण्टारवाधि ( दि ? ) करणम् ।
६१-शुकभ्रमणाधिकरणम् ।
६२-चक्रगत्यधिकरणम् ।
अध्याय ६
६३-वर्गविभाजनाधिकरणम् ।
६४-ग्रामनिर्णयाधिकरणम् ।
६५-शक्त्युद्गमाधिकरणम् ।
६६-सूतवाहाधिकरणम् ।
६७-धूमयानाधिकरणम् ।
६८-शिखोद्गमाधिकरणम् ।
६६-अंशुवाहाधिकरणम् ।
७०-तारमुखाधिकरणम् ।
७१-मणिवाहाधिकरणम् ।
७२-मरुत्सखाधिकरणम् ।
७३-शक्तिगर्भाधिकरणम् ।
७४-गारुडाधिकरणम् ।
अध्याय ७
७५-सिंहिकाधिकरणम् ।
७६-त्रिपुराधिकरणम् ।
७७-गूढचाराधिकरणम् ।
७८-कूर्माधिकरणम् ।
७६-उत्तालिय्यधिकरणम् ।
८०-माण्डलिकाधिकरणम् ।
८१-आन्दोलिकाधिकरणम् ।
८२-ध्वजाङ्गाधिकरणम् ।
८३-वृन्दावनाधिकरणम् ।
८४-वैरिञ्चिकाधिकरणम् ।
८५-जलदाधिकरणम् ।
अध्याय ८
८६-दिङ्निर्णयाधिकरणम् ।
८७-ध्वजाधिकरणम् ।
८८-कालाधिकरणम् ।
८६-विस्तृतक्रियाधिकरणम् ।
६०-अङ्गोपसंहाराधिकरणम् ।
६१-तम प्रसारणाधिकरणम् ।
६२-वातकुण्डल्यधिकरणम् ।
६४-रूपाकर्षणाधिकरणम् ।
६५-प्रतिबिम्बाकर्षणाधिकरणम् ।
६६-गमागमाधिकरणम् ।
६७-आवासस्थानाधिकरणम् ।
६८-शोधनाधिकरणम् ।
६६-परिच्छेदाधिकरणम् ।
१००-रक्षणाधिकरणम् ।
इति विषयसूचिका समाप्ता ॥
विज्ञप्ति—यह सूचिका बडोदा राजकीय संस्कृत पुस्तक-भवन से प्राप्त हुई है ।
कापो संख्या १—
यन्त्रसर्वस्वे
✻ वैमानिकप्रकरणम् ✻
मङ्गलाचरणम्
यद्विमानगतास्सर्वे यान्ति ब्रह्म परं पदम् ।
तन्नत्वा परमानन्द श्रु [शृ ?] तिमस्तकगोचरम् ॥ ✕
पूर्वाचार्यकृतान् शास्त्रानवलोक्य यथामति ।
सर्वलोकोपकाराय सर्वानर्थविनाशकम् ॥
त्रयीहृदयसन्दो [ब्दो ?] हमारूपं सुखप्रदम् ।
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं शताधिकरणैस्तथा ॥
अष्टाध्यायसमायुक्तमतिगूढं मनोहरम् ।†
जगतामतिसन्धानकारणं शुभदं नृणाम् ॥
अनायासाद् व्योमयानस्वरूपज्ञानसाधनम् ।
वैमानिकप्रकरणं कथ्यतेऽस्मिन् यथामति ॥
मङ्गलाचरणवचनों की बोधानन्दकृत व्याख्या —
व्याख्यानश्लोकाः +
महादेवं महादेवीं वाणीं गणपतिं गुरुम् ।
शास्त्रकारं भरद्वाजं प्रणिपत्य यथामति ॥ १ ॥
✕ गुजराती मे 'ऋ' का 'रु' उच्चारण करते है अत यहा 'श्रुति' का 'शृति' उच्चारणक्षमता से लिपिप्रमाद
है जो कि वृत्तिकार के पश्चात् किसी गुजराती कापी करने वाले का काम है।
† भरद्वाज महर्षि ने 'वैमानिक प्रकरण' को पाच सौ सूत्रो, सो अधिकरणो ओर आठ अध्यायो मे लिखा है
यह इस कथन से स्पष्ट होता है।
- मङ्गलाचरण वचन महर्षि भरद्वाज के है 'महादेव ' से व्याख्यानश्लोक वृत्तिकार बोधानन्द यति के है।
२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्वतस्सिद्धन्यायशास्त्रं वाल्मीकिगणितं तथा ।
परिभाषाचन्द्रिकां च पञ्चान्नामार्थकल्पकम् ॥ २ ॥
पञ्चवारं विचार्यैथ तत्प्रमाणानुसारतः ।
बालानां सुखबोधाय बोधानन्दयतीश्वरः ॥ ३ ॥
सङ्ग्रहाद् वैमानिकाधिकरणस्य यथाविधि ।
लिलेख बोधानन्दवृत्त्याख्यां व्याख्यां मनोहराम् ॥ ४ ॥
व्याख्या लक्षणरीत्यास्य पाणिनीया[य्या ?] ❀दिमानतः ।
पारिभाषिकरूपत्वाद् व्याख्यातुं नैव शक्यते ॥ ५ ॥
महान् देव परमेश्वर महती देवतारूप वाणी-वेदवाणी, निज गुरुवर गणपति को तथा 'यन्त्र-
सर्वस्व' नामक शास्त्र एवं तद्ग्रन्थ 'वैमानिक प्रकरण' के रचयिता महर्षि भरद्वाज को श्रद्धापूर्वक एवं
यथावत् प्रणाम करके स्वत सिद्ध न्यायशास्त्र तथा वाल्मीकि गणित और परिभाषाचन्द्रिका ग्रन्थ को पुन
नामार्थकल्प ग्रन्थ को पांच बार विचार करके तथा उनके प्रमाणानुसार विद्यार्थियों के सुखबोध-सरल
ज्ञान के लिए मुझ बोधानन्द यतीश्वर ने वैमानिक प्रकरण की बोधानन्दवृत्ति नाम की मनोहर व्याख्या
को सङ्क्षेप से यथाविधि लिखा है । इस ग्रन्थ की व्याख्या पारिभाषिकरूप होने से पाणिनीय आदि
के अनुसार लक्षणरीति से स्पष्ट नहीं की जा सकती है+ ॥ १-५ ॥
प्रारिप्सितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नेन यथाक्रमम् ।
परिसमाप्तिप्रचयगमनाभ्यां यथाविधि ॥ ६ ॥
शिष्टाचारपरिप्राप्तमङ्गलाचरणं स्वतः ।
अनुष्ठाय यथाशास्त्रं शिष्याशिक्षार्थमादरात् ॥ ७ ॥
यद्विमानगतास्सर्वेत्युक्तश्लोकाद्यथाक्रमात् ।
स्वेष्टदेवनमस्काररूपमङ्गलमातनोत् ॥ ८ ॥
अर्थात्सूचयति ग्रन्थादनुबन्धचतुष्टयम् ।
ब्रह्मानुग्रहसल्लब्धवेदराशिं कृपाकरः ॥ ९ ॥
प्रारम्भ करने में अभीष्ट ग्रन्थ की यथाक्रम निर्विघ्नरूप से यथाविधि परिसमाप्ति और विस्तार
प्रचार के लिये एवं शिष्यों की शिक्षा के अर्थ शास्त्रानुसार आदर से शिष्टाचारपरम्परा से प्राप्त मङ्गला-
चरण का स्वयं अनुष्ठान करके 'यद्विमानगतास्सर्वे' उक्त श्लोक से क्रमानुसार निज इष्टदेव का नमस्कार-
रूप मङ्गल का महर्षि भरद्वाज ने सेवन किया है। परमेश्वर के अनुग्रह से समस्त वेदज्ञान को प्राप्त
हुआ, दयालु ग्रन्थकार निज ग्रन्थ से अनुबन्धचतुष्टय को प्रकरण एवं प्रसङ्ग से सूचित करता है ॥१-६॥
निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः ।
नवनीतं समुद्धृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम् ॥ १० ॥
- यहां हस्तलेख में 'पाणिनीय्यादिमानत' प्रयोग से 'नीय्य' यकारद्वित्व है और ऐसा अनेक स्थलों पर
आया है, हो सकता है यह शैली दाक्षिणात्य हो ।
- इस ग्रन्थ का समस्त हिन्दी भाषा का अनुवाद हमारा ( स्वामी ब्रह्ममुनि का ) है ।
ब्रह्म विमान ] [ ३
प्रायच्छत्सर्वलोकानामीप्सितार्थफलप्रदम् ।
तस्मिन् चत्वारिंशतिकाधिकारे सम्प्रदर्शितम् ॥ ११ ॥
नानाविमानवैचित्र्यरचनाक्रमबोधकम् ।
अष्टाध्यायैर्विभाजित शताधिकरणैर्युतम् ॥ १२ ॥
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम् ।
वैमानिकप्रकरणमुक्तं भगवता स्फुटम् ॥ १३ ॥
महर्षि भरद्वाज ने उस वेदरूप समुद्र का निर्मन्थन करके सब मनुष्यों के अभीष्ट फलप्रद्
'यन्त्रसर्वस्व' ग्रन्थरूप मक्खन को निकाल कर दिया । चालीस अधिकारों-प्रकरणों से युक्त उस 'यन्त्रसर्वस्व'
ग्रन्थ मे भिन्न भिन्न विमानों की विचित्रता और रचनाक्रम का बोधक आठ अध्यायों से विभाजित सौ
अधिकरणों वाला पांच सौ सूत्रों से युक्त आकाशयान विमान प्रधानरूप से जिसमे वर्णित है ऐसा
'वैमानिक प्रकरण' भगवान् भरद्वाज ऋषि ने सम्प्रदर्शित किया एवं स्पष्ट कहा है ॥ १०-१३ ॥
तत्रादौ मङ्गलश्लोकतत्पर्य (यस् ?) सनिरूप्यते ।
उत्तरे तापनीये च शैव्यप्रश्ने च काठके (टके ?) ॥ १४ ॥
माण्डूक्ये च यदोङ्कार परापरविभागतः
उक्त स्यादारुरुक्षूणा ब्रह्मप्राप्त्यर्थमादरात् ॥ १५ ॥
विमानत्वेन मुनिना तदेवात्राभिवर्णितम् ।
वाच्यार्थलक्ष्यार्थभेदान्द्वि(द्वि?)धा भिद्यते श्रु (श्रु?)तो ॥१६॥
तुरीय एव लक्ष्यार्थ प्रणवस्येति कीर्तित ।
तदेवाखण्डैकरसं परमात्मेति चोच्यते ॥ १७ ॥
एत(क ?)दालम्बन ष्ठलमित्यादि व (धृ ?) तिमानतः ।
गमनार्थ साधकाना भक्त्या तत्परम पदम् ॥ १८ ॥
अब प्रथम मङ्गलश्लोकों का तात्पर्य निरूपण किया जाता है उत्तर तापनीय, शैव्य प्रश्न,
कठप्रोक्त और माण्डूक्य उपनिषद् में जो ओङ्कार 'ओम्' पर अपर विभाग से वर्णित है वह आरोहण
करने को उत्सुक की ब्रह्मप्राप्ति के अर्थ आदर से कहा गया है। भरद्वाज मुनि ने इस मङ्गलाचरण में
उसी ओम् ब्रह्म का विमान रूप से वर्णन किया है, उक्त ओम् रूप ब्रह्म वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ के
भेद से उपनिषद् रूप श्रुति में दो प्रकारों में विभक्त हो जाता है। प्रणव अर्थात् ओम् का तुरीयरूप
अर्थात् चतुर्थ अमात्र रूप या वस्तुरूप ही लक्ष्यार्थ है ऐसा कहा है वही अखण्ड एकरस परमात्मा है
ऐसा भी कहा है। यही आज्ञारूप आलम्बन श्रेष्ठ है 'एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्' इत्यादि
उपनिषद् वचनों के प्रमाणानुसार उपासकों का भक्ति से प्राप्त करने योग्य वह परम पद है ॥ १४-१८ ॥
वाचक ( ) प्रणवो ह्यत्र विमान इति वर्णितः ।
तमारुह्य यथाशास्त्रं गुरुक्तेनैव वर्त्मना ॥ १६ ॥
ये विशन्ति ब्रह्मपदं ब्रह्मचर्यादिसाधनात् ।
तदद्य मङ्गलश्लोकरूपेण प्रतिपादित ॥ २० ॥
४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यहां वाचकरूप ओम् ही विमान है ऐसा वर्णित किया है गुरुद्वारा उपदिष्ट मार्ग से उस पर
शास्त्रानुसार आरोहण कर जो उपासक जन ब्रह्मचर्य आदि साधन द्वारा ब्रह्मपद को प्राप्त होते हैं वह ऐसा
ब्रह्मपद यहां मङ्गलश्लोकरूप वचन से विमान प्रतिपादित किया है ॥ १६—२० ॥
तदर्थबोधकपदान्यष्ट श्लोके स्मृतानि हि ।
द्वितीय (य्य ? )† पदतस्तेषु सम्यगुक्ता मुमुक्षव ॥ २१ ॥
स एव कर्तृवाची स्याज्जीववाचीति चोच्यते ।
यद्विमानगतेप्यत्र वाचक प्रणवस्मृत ॥ २२ ॥
विमानत्वेनात्र सम्यक्तदेव प्रतिपादित ।
एष एवादिमपदो भवेत् कर्तृविशेषणम् ॥ २३ ॥
तुरीयपदत प्रोक्तमवाङ्मानसगोचरम् ।
अखण्डेकरस ब्रह्म प्राप्तव्यस्थानमुत्तमम् ॥ २४ ॥
उक्तमेतत्कर्मपदमिति श्लोकान्वयक्रमात् ।
प्रणवाख्यविमानेन गमन यत्प्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥
तत्तृतीयपदेनोक्त वाच्यलक्ष्यैक्यबोधकम् ।
क्रियापदमिति प्रोक्तम (क्त ञ्च?)न्वयक्रमत (त?) स्फुटम् ॥२६॥
विशेषणपदानि स्यु कर्मणस्त्रीण्यथाक्रमम् । +
प्रसिद्धि (द्ध?) द्योतनार्थाय पञ्चम पदमीरितम् ॥ २७ ॥
तथैव सप्तपद नित्यानन्दप्रबोधकम् ।
सर्ववेदान्तमानत्वबोधार्थ चाष्टम पदम् ॥ २८ ॥
उसके अर्थबोधक आठ पद यहां श्लोक में स्मरण किए गये हैं—कहे हैं, उनमें द्वितीय पद
से मुमुक्षु भली प्रकार कहे हैं। वह ही ओम् कर्तृवाची अर्थात् जगत्कर्ता परमेश्वर का वाचक है और
जीववाची अर्थात् जीव का वाचक भी कहा जाता है ‡, यहां जिस विमानपदप्राप्ति पर भी ओम् वाचक
निश्चित है। यहां मङ्गलाचरण में विमानरूप से वह ही भली प्रकार प्रतिपादित किया है वह ही आदि
का पद अर्थात् ब्रह्मात्मा का प्रथम पाद या ओम् में अकार कर्तृविशेषण है। तुरीय पद अर्थात्—ब्रह्मात्मा
के चतुर्थ पाद या ओम् के अमात्ररूप से वाणी और मन के व्यवहार से रहित अर्थात्—अवर्णनीय और
अचिन्त्य अखण्ड एकरस उत्तम प्राप्तव्य स्थानरूप ब्रह्म कहा है। यह कर्मपद इस प्रकार श्लोकान्वय क्रम
में कह दिया ओम् रूप विमान से गमन करना पहुँचना या प्राप्त करना जो कहा गया है। तृतीय पद से
† यहा द्वितीय' मे यकारद्वय पूर्व की भांति दाक्षिणात्य हो सकता है।
- यहा 'त्रीण्यथाक्रमम्' त्रीणि यथाक्रमम् मे त्रीणि के अन्तिम इकार का लोप पुरातन छान्दस है।
‡ ओम् को जीववाची भी कहना यह वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके श्लोक का अनुवाद
किया है।
ब्रह्म विमान ] [ ५
वह वाच्य लक्ष्य की एकता का बोधक कहा है वह अन्वयक्रम से क्रियापद स्पष्ट कहा गया है । तीन
विशेषण पद कर्म के यथाक्रम है पाचवा पद प्रसिद्धि दर्शाने के अर्थ कहा गया है । उसी प्रकार सातवा
पद नित्यानन्द का बोधक है और आठवा पद समस्त वेदान्त-उपनिषद् वचनों द्वारा माननीयता के दर्शाने
के अर्थ है ॥ २१—२८ ॥
नत्वेति यत्पद प्रोक्त नत्प्रह्रीभावबोधकम् ।
एतेन तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थोक्तमभूत्क्रमात् ॥ २९ ॥
यद्विमानगतेत्यत्र त्वंपदत्वेन वर्णितम् ।
तत्पदार्थत्वेन ब्रह्मपर पदमितीरितम् ॥ ३० ॥
नत्वैक्यपरामर्शार्थोऽसि पदार्थबोधक ।
इत्थ श्लोकात्तत्त्वमसि वाक्यार्थस्सन्निरूपित ॥ ३१ ॥
तदैक्यानुसन्धानरूपमङ्गलमातनोत् ।
एव विधाय विधिवन्मङ्गलाचरण मुनि ॥ ३२ ॥
पूर्वाचार्याश्च तद्ग्रन्थान् द्वितीयश्लोक्तोब्रवीत् ।
विश्वनाथोक्तनामानि तेषा वक्ष्ये यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
नारायण (णो ?) शौनकश्च गर्गो वाचस्पतिस्तथा ।
चाक्रायणिर्धुण्डिनाथश्चेति शास्त्रकृतस्स्वयम् ॥३४॥
विमानचन्द्रिका व्योमयानतन्त्रस्तथैव च ।
यन्त्रकल्पो यानबिन्दु खेटयानप्रदीपिका ॥ ३५ ॥
व्योमयानार्कप्रकाशश्चेति शास्त्राणि षट् क्रमात् ।
नारायणादिमुनिभि प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥ ३६ ॥
विचार्यैतानि विधिवद् भरद्वाज कृपानिधि ।
वैमानिकप्रकरण सर्वलोकोपकारकम् ।
पारिभाषिकरूपेण रचयामास विस्तरात् ॥ ३७ ॥
मङ्गल वचनों में 'नत्वा' यह पद जो भरद्वाज ऋषि ने कहा है वह आदर-विनय भाव का
दर्शक है इससे 'तत्त्वमसि' आदि उपनिषद् वाक्यार्थो से कहा हुआ ब्रह्म क्रम से समझना चाहिये ।
'यद्विमान गत०' यहा त्वं पदरूप से उपनिषद् वचन में 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' कहा गया है 'तत्' पदार्थ-
रूप से ब्रह्मपरक पद है ऐसा कहा है । 'नत्वा' यह ऐक्य परामर्श ( जीवब्रह्म की एकता ) के साथ सम्बन्ध
रखने वाला 'असि' का पदार्थबोधक है इस प्रकार श्लोक से 'तत्त्वमसि' वाक्य का अर्थ निरूपित किया
है+। भरद्वाज मुनि ने इस प्रकार विधिवत् मङ्गलाचरण करके उस ऐक्यार्थ के अनुसन्धानरूप मङ्गल
का विस्तार किया है ॥ पूर्व आचार्यों और उनके ग्रन्थों को दूसरे श्लोक से कहा है, विश्वनाथ आचार्य के
- यहा जीवब्रह्म की एकता का सिद्धान्त वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके वचनो का
अनुवाद किया है ।
६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
द्वारा कहे हुए उनके नामों को मै क्रम से कहूँगा । नारायण, शौनक, गर्ग, वाचस्पति, चाक्रायणि और
धुण्ढिनाथ ये ऋषि स्वयं शास्त्रकार हैं । विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र, यन्त्रकल्प, यानबिन्दु, खेटयान-
प्रदीपिका और व्योमयानार्कप्रकाश ये छः शास्त्र क्रम से विशेष ज्ञानवेत्ता नारायण आदि मुनियों ने कहे
हैं । दयानिधि भरद्वाज ऋषि ने इन शास्त्रों को भली प्रकार विचार कर सर्वलोकोपकारक 'वैमानिक
प्रकरण' पारिभाषिक रूप से विस्तार से रचा है ❁ ॥ २६—३७ ॥
अथ विमानशब्दार्थविचार .—
वेगसाम्याद् विमानोऽण्डजानामिति ।। अ० १ । सू० १ ॥
सूत्रशब्दार्थ—अण्डजों अर्थात् पक्षियों के वेगसाम्य से विमान कहलाता है ।
बोधानन्दवृत्ति —
अण्डजेत्यत्र सूत्रेस्मिन् गृध्राद्या पक्षिण स्मृता ।
आकाशगमने तेषां वेगशक्ति स्ववेगत ।। १ ।।
य समर्थो विशेषेण मातुं गणितसंख्यया ।
स विमान इति प्रोक्तो वेगसाम्याच्च शास्त्रत ।। २ ।।
यद्वा—
गृध्रादिपक्षिणा वेगसाम्य यस्यास्ति वेगत ।
स विमान इति प्रोक्त (क्तो ?) आकाशगमने क्रमात् ।।३।।
इस सूत्र में "अण्डजानाम्" पद से गृध्र आदि पक्षी कहे गये हैं आकाशगमन मे उनकी
वेगशक्ति को जो स्ववेग से गणितसंख्या द्वारा विशेषरूपेण मापने तुलित करने में समर्थ हो वह वि-मान
पक्षी के मान होने से अर्थात् वेगसाम्य से और शास्त्रानुसार ( शब्दशास्त्रानुसार ) विमान कहा गया है ।
अथवा आकाशगमन में गृध्र आदि पक्षियों के वेग की समता क्रमशः जिसके वेग से हो सकती है वह
विमान कहा गया है + ॥ १—३ ॥
इत्थम्भावेति x शब्दस्स्याद् (दस्याद् ?) विमानार्थविनिर्णये—
लल्लोपि—
विसोप ( म ) ान गमने येषामस्ति खमण्डले ।
ते विमाना इति प्रोक्ता यानशास्त्रविशारदै ।। ४ ।।
- महर्षि भरद्वाज के रचे 'वैमानिक प्रकरण' से पूर्व विमानशास्त्र के ग्रन्थ 'विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र,
यन्त्रकल्प, यानबिन्दु, खेटयानप्रदीपिका, व्योमयानार्कप्रकाश' ये छह थे ।
- ऋग्वेद मे भी श्येन की उपमा उडने मे विमान यान को दी है "आ वा रथो अश्विना श्येनपत्वा सुमृलीक
स्ववा यात्वर्वाङ् ।” ( ऋ० १।११८।१ )
x इत्थम्भाव इति—इत्थम्भावेति सन्धिराषं पुरातनप्रयोगो वा ।
विमान शब्दार्थ ] [ ७
नारायणोपि—
पृथिव्यप्स्वन्तरिक्षेषु खगवद्वेगत स्वयंम् ।
यस्समर्थो भवेद् गन्तु स विमान इति स्मृत ॥ इत्यादि ॥५॥
शङ्खोपि—
स्थानात्स्थानान्तर गन्तु यस्समर्थ खमण्डले ।
स विमान इति प्रोक्तो यानशास्त्रविशारदै ॥ ६ ॥ इत्यादि
विश्वम्भर —
देशाद्देशान्तर तद्वद् द्वीपाद् द्वोपान्तर तथा ।
लोकाल्लोकान्तर चापि योम्बरे गन्तुमर्हति ।
स विमान इति प्रोक्त ( े ? ) खेटशास्त्रविदा वरै ॥७॥
विमानार्थ के निर्णय में इस प्रकार भाववाला यह विमान शब्द है । लल्ल आचार्य ने भी
कहा है--आकाश-मण्डल में गमन करने में पक्षिर्यो के साथ जिन की उपमा एवं तुल्यता हो वे यान-
शास्त्रज्ञ विद्वानों द्वारा विमान कहे गये हैं । नारायण आचार्य ने भो कहा है—पृथिवी जल आकाश में
पक्षिर्यों के वेग की भाति स्वयं ( यन्त्रादि द्वारा ) जो गमन करने को समर्थ हो वह विमान कहा गया है ।
आचार्य शङ्ख ने भी कहा है—आकाशमण्डल मे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को जो समर्थ हो
वह यानशास्त्रज्ञ विद्वानों द्वारा विमान कहा गया है । एवं विश्वम्भर आचार्य ने भी कहा है—आकाश में
देश से देश को द्वीप से द्वीप को और लोक से लोक को जो जा सकता हो वह यानशास्त्रज्ञ उक्त विद्वानों
द्वारा विमान कहा गया है ॥ ४—७ ॥
एव विमानशब्दार्थमुक्त्वा शास्त्रानुसारत ।
अथेदानी तद्रहस्यविचारस्स प्रकीर्त्यते—
रहस्यज्ञोधिकारी ॥ अ० १ । सू० २ ॥
सूत्रशब्दार्थ—रहस्यों का जाननेवाला विमान चलाने में अधिकारी है ।
बोधानन्दवृत्ति —
वैमानिकरहस्यानि (णि?) यानि प्रोक्तानि शास्त्रत ।
द्वात्रिंशदिति तान्येव यानयन्तृत्वकर्मणि ॥ १ ॥
साधकानि भवन्तीति यदुक्त ज्ञानिभि पुरा ।
तत्सूत्रस्यादिमपदात्सूचित भवति स्फुटम् ॥ २ ॥
एतद्रहस्यविज्ञान विदित येन शास्त्रत ।
द्वितीयपदत प्रोक्त सोधिकारी भवेदिति ॥ ३ ॥
एतेन यानयन्तृत्वे रहस्यज्ञानमन्तरा ।
सूत्रेधिकारससिद्धि र्नेति सम्यग्विनिर्णितम् ॥ ४ ॥
८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानरचने व्योमारोहणे चालने तथा ।
स्तम्भने गमने चित्रगतिवेगादिनिर्णये ॥ ५ ॥
वैमानिकरहस्यार्थज्ञानसाधनमन्तरा ।
यतोधिकारसंसिद्धि र्नेति सूत्रेण वर्णितम् ॥ ६ ॥
ततोधिकारसंसिद्ध्यर्थं तद्रहस्याण्यथाक्रमम् ।
यथोक्तानि रहस्यलहर्यां लल्लादिभि पुरा ॥ ७ ॥
तथैवोदाहरिष्यामि सग्रहेण यथामति ।
इस प्रकार शास्त्रानुसार विमानशब्दार्थ कहकर पुन अथ विमानरहस्य बिचार वर्णित किया
जाता है—शास्त्र द्वारा जो वैमानिक रहस्य बत्तीस कहे हैं वे ही यान-चालककर्म में साधक होते हैं यह
जो विद्वानों ने पुराकाल में कहा है वह सूत्र के आदिम पद से स्पष्ट सूचित होता है। इस बत्तीस
रहस्यविज्ञान को जिसने शास्त्रद्वारा जान लिया है वह विमान का अधिकारी है यह द्वितीय पद से कहा
है। इससे यानचालक कर्म में रहस्यज्ञान के बिना विमानाधिकार नहीं है यह भली प्रकार निर्णय
दिया है ॥ विमान के रचने, आकाश में चढने, चलाने, स्तम्भन करने—नियन्त्रण में रखने, उड़ाने
चित्रगति और वेग आदि देने के निर्णय में वैमानिक रहस्यार्थज्ञानरूप साधन के बिना अधिकारसंसिद्धि
नहीं है अत उसे सूत्र में कहा है । अधिकारसंसिद्धि के लिये उन रहस्यों को लल्ल आदि
आचार्यों ने पुराकाल में क्रमश जैसे 'रहस्यलहरी' ग्रन्थ में कहा है वैसे ही संक्षेप से यहा
यथावत् उदाहृत करूंगा ॥ १-७॥
उक्तं हि रहस्यलहर्याम्—
मान्त्रिकस् [को ?] तान्त्रिकस्तद्वत्कृतकश्चान्तरालक ।
गूढो दृश्यमदृश्यं च परोक्षश्चापरोक्षक ॥ १ ॥ [ ८ ]
सङ्कोचो विस्तृतश्चैव विरूपकरणस्तथा ।
रूपान्तरस्सुरूपश्च ज्योतिर्भावस्तमोमय ॥ २ ॥ [ ९ ]
प्रलयो विमुखस्तारो महाशब्दविमोहन ।
लङ्घनस्सर्पगमनश्चपलस्सर्वतो मुख ॥ ३ ॥ [ १० ]
परशब्दग्राहकश्च रूपाकर्षणस्तथा ।
क्रियारहस्यग्रहणो दिक्प्रदर्शनमेव च ॥ ४ ॥ [ ११ ]
✤ ...
स्तब्धक [को ?] कर्षणश्चेति रहस्यानि यथाक्रमम् [ १२ ]
एतानि द्वात्रिंशद्रहस्यानि [णि ?] गुरोर्मुंखात् ॥ ५ ॥
- हस्तलेख में श्लोकार्द्ध छुटा हुआ है जो किसी कापी करने वाले से छूटा है, जिस श्लोकार्द्ध मे
'प्राकाशाकार, जलदरूप' ये दो रहस्य थे तभी पूरी संख्या ३२ होगी, तथा आगे रहस्यविवरण मे २६
३० सख्या में उक्त दोनों रहस्यों को दिया हुआ भी है ।
विमान के रहस्य ] [ ६
विज्ञाय विधिवत्सर्वं पश्चात् कार्यं समारभेत् [१३]
एतद्रहस्यानुभवो यस्यास्ति गुरुबोधन ॥६॥
स एव व्योमयानाधिकारी स्यान्नेतरे जना (३) [१४]
एतेषां सिद्धनाथोक्तरहस्यार्थविवेचनम् ।
सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्यामि रहस्यज्ञानसिद्धये [१५]
'रहस्यलहरी' में कहा है कि—मान्त्रिक, तान्त्रिक, कृतक, अन्तरालक, गूढ, दृश्य, अदृश्य,
परोक्ष, अपरोक्षक, सङ्कोच, विस्तृत, विरूपकरण, रूपान्तर, सुरूप, ज्योतिर्भाव, तमोमय, प्रलय, विमुख,
महाशब्दविमोहन, लङ्घन, सर्पगमन, चपल, सर्वतोमुख, परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण,
दिकप्रदर्शन, (आकाशाकार, जलदरूप), स्तब्धक, कर्षक। यथाक्रम इन बत्तीस रहस्यों को गुरुमुख
से जानकर पुनः विधिवत् समस्त कार्य प्रारम्भ करना चाहिये ॥ गुरु से सीखा हुआ यह रहस्यानुभव
जिसको है वह ही व्योमयान अर्थात् आकाशयान विमान चलाने का अधिकारी हो सकता है अन्य
जन नहीं ८-१५ ॥
इन बत्तीस प्रकार के विमानविषयक रहस्यों के सिद्धनाथ आचार्य द्वारा वर्णित विवेचन को
मैं रहस्यज्ञानसिद्धि के लिये संक्षेप से कहूँगा ॥१५॥
( १ ) तत्र मान्त्रिकरहस्यो नाम--मन्त्राधिकारोक्तरीत्या छिन्नम-
स्ताभैरवीवेगिनीसिद्धाऽम्बादिमन्त्रानुष्ठानैरुपलब्धसिद्धमार्गोंक्तघुटिकापादुकादृश्या-
दृश्यादिशक्तिभिस्त (भि त ?) था सिद्धाऽम्बा--ओषधैश्च ( धीश्च ? )
र्यादिमन्त्रानुष्ठाने सम्प्राप्त ओषधिभिस्तद्द्वा ( द्रा ? ) वकतैलादिभिश्च
भुवनेश्व (नेश्व) र्यादिमन्त्रानुष्ठानलब्धमन्त्रशक्तिक्रियाशक्त्यादिभिश्च कलास्यो-
जनद्रागऽभेद्यत्वाच्छेद्यत्वादह्याऽविनाशित्वादिगुणविशिष्टविमानरचनाक्रिया
रहस्यम् × ।।
( १ ) मान्त्रिक रहस्य विचार—मन्त्राधिकार में कही रीति के अनुसार छिन्नमस्ता भैरवी वेगिनी
सिद्धाऽम्बा † आदि के मन्त्रानुष्ठानों से उपलब्ध सिद्ध मार्गों में कही हुई घुटिका, पादुका, दृश्य अदृश्य ‡
आदि की शक्तियों द्वारा तथा सिद्धाऽम्बा ओषधि + ऐश्वर्य आदि के मन्त्रानुष्ठानों से प्राप्त ओषधियों
× हस्तलेख में 'द्वारा अभेद्यत्वमच्छेद्यत्व अविनाशित्वादि' ऐसा सन्दिग्ध पाठ है ।
† छिन्नमस्ता आदि चार प्रकार की विद्युत् के नाम पारिभाषिक प्रतीत होते हैं जो यन्त्र में प्रयुक्त की
जाती हैं ।
‡ घुटिका आदि शक्तिरूप साधनों के जातिवाचक नाम हैं।
- राजनिघण्टु में 'सिद्धौषधियां' पांच ओषधियों के नाम बतलाये हैं।
तैलकन्दसुधाकन्दरुदन्ती सर्वपाशिषु ।
तैलकन्दं सुधाकन्दं क्रोडदन्ती रुदन्तिका ।।
सपनेत्रयुता पञ्च सिद्धौषधिसञ्ज्ञका ।। (रा० नि०)
१० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
एवं उनके द्रावक तेल + आदि से भुवन ऐश्वर्य आदि मन्त्रानुष्ठानों से प्राप्त मन्त्रशक्ति ( विद्यायुक्त
विचारशक्ति ) एवं क्रियाशक्ति आदि से कलासंयोजन द्वारा अभेद्यता अच्छेद्यता अदाह्यता अविनाशिता
आदि गुणविशिष्ट विमानरचनारूप क्रियारहस्य विचार है ।
( २ ) तान्त्रिकरहस्यो नाम--महामायाशम्बरादितान्त्रिकशास्त्रोक्तता-
नुष्ठानमार्गात्तत्तच्छक्त्यनुसन्धानरहस्यम् ॥
( २ ) तान्त्रिकरहस्यविचार - महामाया शम्बर आदि तान्त्रिक शास्त्र में कहे अनुष्ठान मार्ग
से उस शक्ति का अनुसन्धानरहस्य विचार है ॥
( ३ ) कृतकरहस्यो नाम--विश्वकर्मच्छायापुरुषमनुमयादिशास्त्रानुष्ठान-
( नु ? ) द्वारा तत्तच्छक्त्यनुसन्धानपूर्वक तात्कालिकसङ्कल्पानुसारेण विमान-
रचनाक्रमरहस्यम् ॥
( ३ ) कृतक रहस्य विचार- विश्वकर्मा, छायापुरुष, मनु, मय ‡ आदि ( यन्त्राविष्कारक
महर्षियों के ) शास्त्रों के अनुष्ठान द्वारा उस शक्ति का अनुसन्धान खोज ध्यान तात्कालिक सङ्कल्प अर्थात्
तुरन्त नूतन कल्पना के अनुसार विमानरचनाक्रम रहस्य विचार है ।
( ४ ) अन्तरालरहस्यो नाम--आकाशपरिधिमण्डलशक्तिसन्धिस्थानेषु
विमानप्रवेशो यदा भवति तदोभय ( तदा उभय ? ) शक्तिसम्मर्दनेन चूर्णितो
भवति । अतो ( त ? ) विमानस्य तत्सन्धिप्रवेशसूचनात्तदन्तरालेषु विमान-
स्तम्भनक्रियाकरणरहस्यम् ॥
(४) अन्तरालरहस्य विचार-आकाशपरिधिमण्डल की शक्तियों के सन्धिस्थानों में जब विमान-
प्रवेश हो जाता है तो दोनों शक्तियों के सम्मर्दन से विमान चूर्णित हो जाता है टूट जाता है । अत
विमान के उस सन्धिप्रवेश की सूचना करने से उन अन्तरालों में विमानस्तम्भनक्रिया करने रूप रहस्य का
विचार होना चाहिये ।
( ५ ) गूढरहस्यो नाम--वायुतत्त्वप्रकरणोक्तरीत्या वातस्तम्भाष्टम-
परिधिरेखापथस्य यासावियासाप्रयासादिवातशक्तिभि सूर्यकिरणान्तर्गततम-
श्शक्तिमाकृष्य तत्संयोजनद्वारा विमानाच्छादनरहस्यम् ॥
( ५ ) गूढरहस्यविचार - वायुतत्त्व प्रकरण में कही रीति के अनुसार वातस्तम्भ की आठवीं
परिधि के रेखामार्ग की यासा वियासा प्रयासा आदि वातशक्तियों के द्वारा सूर्यकिरणान्तर्गत अन्धकार
शक्ति को आकृष्ट कर उसके संयोजनद्वारा विमानाच्छादन करना रहस्य है ॥
- यन्त्र में तेल का उपयोग आवश्यक है अत कहा गया है ।
‡ विश्वकर्मा, छायापुरुष, मनु, मय आदि प्राचीन विमान आदि यान यन्त्र के आविष्कारक तथा उन उन
शास्त्रों के रचयिता थे । वाल्मीकि रामायण में पुष्पक विमान का आविष्कारक विश्वकर्मा कहा ही है ।
विमान के रहस्य ] [ ११
( ६ ) दृश्यरहस्यो नाम--आकाशमण्डले विद्युद्वातकिरणशक्तयो
परस्परसम्मेलनात्सञ्जातबिम्बकृच्छक्तेर्विमानपीठपुरोभागस्य विश्वक्रियादर्पणविले
प्रतिफल कृत्वा पश्चात्तत्प्रकाशसन्निवेशनद्वारा मायाविमानप्रदर्शनरहस्यम् ॥
( ६ ) दृश्य रहस्य विचार—आकाशमण्डल में विद्युत्किरण वातकिरण ( वातलहर ) इन
दोनों की शक्तियों के परस्पर सम्मेलन से उत्पन्न हुई बिम्बकरने वाली शक्ति से विमान-पीठ के सामने-
वाले भाग के विश्वक्रियादर्पणरूप बिल में प्रतिफल छाया करके पश्चात् उस प्रकाश के पड़ने से माया-
विमान के दिखलाई पड़ने का रहस्य है ॥
( ७ ) अदृश्यरहस्यो नाम—शक्तितन्त्रोक्तरीत्या सूर्यरथैषादण्डप्राङ्-
मुखपृष्ठकेन्द्रस्थवैष्णरव्यंविकरणादिशक्तिभिरा ( भि श्रा ? ) काशतरङ्गस्थ
शक्तिप्रवाहमाकृष्य वातमण्डलस्थवलाहाविकरणादिशक्तिपञ्चके नियोज्य
तद्द्वा ( द्वा ? ) राश्वेताभ्रमण्डलाकार कृत्वा तदावरणाद्विमानादृश्यकरण-
रहस्यम् ॥
(७) अदृश्य रहस्य विचार—शक्तितन्त्र की कही रीति के अनुसार सूर्यकिरण के एषादण्ड के
सामने पृष्ठ केन्द्र में रहने वाले वैष्णरण्य त्रिकरण* आदि शक्तियों से आकाशतरङ्ग के शक्तिप्रवाह को
खींच कर वायुमण्डल में रहने वाली वलाहा ( वलाहाका ) विकरण आदि पांच शक्तियों को नियुक्त करके
उनके द्वारा सफेद अभ्र मण्डलाकार करके उस आवरण से विमान के अदृश्य करने का रहस्य है ॥७॥
(८) परोक्षरहस्यो नाम—मेघोत्पत्तिप्रकरणोक्तशरन्मेघावरणषट्केषु
द्वितीया ( या ? ) वरणपथे विमानमन्तर्धाय विमानस्थशक्त्याकर्षणदर्पण-
मुखात्तन्मेघशक्तिमाहृत्य पश्चाद्विमानपरिवेषचक्रमुखे नियोजयेत् । तेन स्तम्भन-
शक्तिप्रसारणा भवति, पश्चात्तद्द्वा ( द्वा ? ) रा लोकस्तम्भनक्रियारहस्यम् ॥
(८) परोक्षरहस्य विचार—मेघोत्पत्ति प्रकरण में कहे शरद् ऋतुसम्बन्धी छ मेघावरणों के
द्वितीय आवरण मार्ग में विमान छिपकर विमानस्थ शक्ति का आकर्षण करने वाले दर्पण के मुख से
उस मेघशक्ति को लेकर पश्चात् विमान के घेरे वाले चक्रमुख में नियुक्त करे उससे स्तम्भनशक्ति का
फैलाव हो जाता है पुन उसके द्वारा स्तम्भनक्रिया रहस्य हो जाता है ॥
( ९ ) अपरोक्षरहस्यो नाम—शक्तितन्त्रोक्तरौहिणीविद्युत्प्रसारणेन
विमानाभिमुखस्थवस्तूना प्रत्यक्षनिदर्शनक्रियारहस्यम् ॥
(६) अपरोक्ष रहस्य विचार—शक्तितन्त्र में कहीं रोहिणी विद्युत्+ के फैलाने से + विमान
के सामने आने वाली वस्तुओं का प्रत्यक्ष दिखलाई देना रूप अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) क्रिया रहस्य है ॥
- सूर्य पृथिवी के मध्य पृथिवी की गति रेखा के अनुसार कार्य करने वाला सूर्य-रथ-ईषा दण्ड, यह कोई
अङ्ग विमान का पारिभाषिक नाम से कहा गया है जिसके आगे पीछे और केन्द्र में वैष्णरध्य आदि
शक्तियां निकलती हो उनसे आकाश से शक्तिप्रवाह खींचा जाता हो ।
- यह रोहिणी विद्युत्—कोई फेंकने वाली सर्च लाईट की भांति लाईट होगी ।
१२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
( १० ) सङ्कोचनरहस्यो नाम--यन्त्रोपसंहाराधिकारोक्तरीत्या
[अन्त ?] रन्तरिक्षेति [यति ?] वेगात्पलायमानाना विस्तृतखेटयानानाम-
पायसम्भवे विमानस्थसप्तमकीलीचालनद्वारा तदङ्गोपसंहारक्रियारहस्यम् ॥
(१०) सङ्कोचन रहस्य विचार - यन्त्रोपसंहाराधिकार में कही रीति के अनुसार आकाश में
दौड़ते हुए बड़े विमानों के अतिवेग से अपने विमान के नाश की सम्भावना होने पर विमानस्थ
सातवीं कीली अर्थात् घुण्डी ( बटन पेंच ) के चलाने द्वारा उसके अङ्गों का उपसंहार अर्थात् सङ्कोचन
किया रहस्य है ॥*
(११) विस्तृतरहस्यो नाम - आकाशतन्त्रोक्तप्रकारेणाका [ रा आ ? ]
शतृतीयपञ्चमपरिधिमण्डलस्थानीय [य्य ?] मूलवातपरिधिकेन्द्रस्थविमानाना
वाल्मीकिगणितोक्तविमानप्रस्ताररेखाविन्यासमनुसृत्य विमानस्थैका [ स्थ
एका ] दशरेखामुखस्थानीयकीलीचालनद्वारा तात्कालिकोपयुक्तप्रमाणमनुसृत्य
विमानविस्तृतक्रियाकरणरहस्यम् ॥
(११) विस्तृत रहस्य विचार - आकाशतन्त्र में कहे प्रकारानुसार आकाश के तृतीय पञ्चम
परिधिमण्डलस्थानीय मूलवात परिधिकेन्द्रस्थ विमानों का वाल्मीकि गणित में कहे विमानप्रस्ताररेखा-
विन्यास का अनुसरण कर विमानस्थ ग्यारहवीं रेखा के मुखस्थानीय कीली - घुण्डी ( बटन पेंच ) के
चलाने द्वारा तात्कालिक उपयुक्त प्रमाण का अनुसरण करके विमान का विस्तृत किया रहस्य है ॥
(१२) विरूपकरणरहस्यो नाम - धूमप्रकरणोक्तप्रकारेण द्वात्रिंशज्जा-
तीयधूमराशि यन्त्रद्वारा परिकल्प्य तस्मिन् तरङ्गशक्त्युष्णमखण्डितप्रकाश
मेलयित्वा पश्चाद्विमानशिरोभागस्थभैरवीतैलसंस्कारितवैरूप्यदर्पणमुखे पद्मक-
चक्रमुखनालद्वारा पूर्वोक्तप्रकाशशक्ति सन्धार्य द्वात्रिंशदुत्तरशतकथ्यप्रमाण-
वेगात् परिभ्राम्यमाणे सति मण्डलाकारेण महाभयप्रदविकाराकारो जायते
विमानद्रष्टॄणा तत्प्रदर्शनद्वारा महाभयोत्पादनकार्यरहस्यम् ॥
(१२) विरूपकरण रहस्य विचार - धूम प्रकरण में कहे प्रकारानुसार बत्तीस प्रकार के धूमों की
राशि को यन्त्र द्वारा उत्पन्न कर उसमें तरङ्ग शक्ति की उष्णता से उत्पन्न प्रकाश का मिलाकर पश्चात्
विमान के सिर वाले भाग में रहने वाले भैरवी तैल ( कोई पेट्रोल जैसा तैल होगा ) से संस्कारित वैरूप
दर्पण मुख में पद्मक चक्रमुख की नाल द्वारा पूर्वोक्त प्रकाशशक्ति को युक्त करके एक सौ बत्तीस घोड़ों या
दर्जे के वेग से घुमाने पर गोल घेरे रूप से महाभयप्रद विकार का आकार उत्पन्न हो जाता है, विमान
देखने वालों को उसके देखने से महाभयोत्पादन कार्य का रहस्य है ॥
(१३) रूपान्तररहस्यो नाम - तैलप्रकरणोक्तप्रकारेण गृध्रजिह्वा-
कुम्भिणीकाकजङ्घादितैलसंस्कारितवैरूप्यदर्पणे-एकोनविंशतीधूम संयोज्य
तस्मिन् यानस्थकुण्डिणीशक्तिसंयोजनद्वारा विमानद्रष्टॄणा सिंहव्याघ्रभल्लूक-
सर्पगिरिनदीवृक्षादिविकारेणा [ रा अ ? ] न्यथाकल्पितरूपान्तरप्रदर्शनरहस्यम् ॥
- इससे बचने, भाग निकलने का तात्पर्य विदित होता है ।
विमान के रहस्य ] [ १३
(१३) रूपान्तर रहस्य विचार—तैल प्रकरण में कहे प्रकारानुसार गृध्रजिह्वा, ॐ कुम्भिणी ×
काकजङ्घा ‡ आदि तैल से संस्कारित वैरूप्यदर्पण में उश्रीम प्रकार के धूम को संयुक्त करके उसमें यानस्थ-
कुण्टिणी शक्तिसंयोजन द्वारा विमान के देखने वालों को सिंह, बाघ, भालू, सर्प, पहाड़ी, नदी, वृक्ष
आदि विकार से अन्यथा कल्पित रूपान्तर दीखने का रहस्य ॥
(१४) सुरूपरहस्यो नाम—करकप्रकरणोक्तत्रयोदशजातीयकरकश-
क्तिमाकृष्य हिमोद्गारवायुना संधार्य पश्चाद्विमानदक्षिणकेन्द्रमुखस्थितपुष्पि-
णीपिञ्जुलादिदर्पणमुखे पूर्वोक्तशक्ति वातप्रकरणनालद्वारा संयोज्य तस्मिन्
सुरघारूपकिरणशक्तिं सन्धार्य तद्व्रा [ द्वा ? ] रा विमानसन्दर्शकानां विविध-
पुष्पमाल्योपसेवितदिव्याप्सरःस्वरूपवद्वि [ कद्भि ? ] काग्प्रदर्शनक्रिया-
रहस्यम् ॥
(१४) सुरूप रहस्य विचार—करकप्रकरण में कही तेरह प्रकार की करकशक्ति को आकृष्ट करके
हिमोद्गार वायु अर्थात् निकलती हुई ठण्डी भाप के द्वारा संयुक्त कर पश्चात् विमान के दक्षिण केन्द्र
मुख में स्थित पुष्पिणी पिञ्जुल + आदि ( के ) दर्पणमुख में पूर्व कही शक्ति को वायु फैलाने वाली
नाल के द्वारा संयुक्त करके उसमें सुरघा ( तीव्र गति वाली ) नाम की किरणशक्ति को युक्त करके उसके
द्वारा विमान देखने वालों को नाना पुष्पमालाओं से सेवित दिव्य अप्सरा स्वरूप वाले विकार के
दीखने का रहस्य है ॥
(१५) ज्योतिर्भावरहस्यो नाम—अंशुबोधिन्यामु [क्त्या उ ?] क्तप्रकारेण
संज्ञानादिषोडशसूर्यकलासु द्वादशाद्याषोडशान्तकलाप्रभाकर्षणं कृत्वा-आकाश-
चतुर्थपथस्थमयूखकक्ष्यस्थितवायुमण्डले नियोजयेत् । तथैव खतरङ्गशक्तिप्रभा-
माहृत्य वातमण्डलसप्तमावरणस्थप्रकाशशक्त्या सम्मेलयेत् । पश्चादेतच्छक्ति-
द्वय विमानस्थनालपञ्चकद्वारा विमानगुहागर्भदर्पणयन्त्रतृतीयकोशे सन्धार्य
तद्व्रा [ द्वा ? ] रा विमानद्रष्टॄणां बालातपवत्प्रकाशप्रदर्शनरहस्यम् ॥
(१५) ज्योतिर्भाव रहस्य विचार—अंशुबोधिनी में कहे प्रकारानुसार सूर्य की संज्ञान आदि
सोलह कलाओं में से बारहवीं से लेकर सोलहवीं तक कलाओं की प्रभा का आकर्षण करके आकाश के
चतुर्थपथ में रहने वाले किरणरूप अश्व या किरणक्षेत्र में स्थित वायुमण्डल में नियुक्त करे । उसी प्रकार
आकाशतरङ्ग की शक्ति की प्रभा का आहरण करके वातमण्डल के सातवें आवरण में स्थित प्रभाशक्ति
में मिला दे । पश्चात् इन दोनों शक्तियों को विमानस्थ पांच नालों द्वारा विमानगुहा के मध्य दर्पणयन्त्र
के तृतीय कोश में लाकर उसके द्वारा विमान देखने वालों को बाल सूर्य की भांति प्रकाश दीखने का
रहस्य है ।
ॐ आयुर्वेदिक निघण्टुओं में 'गृध्रजिह्वा' नाम से कोई ओषधि नहीं कही किन्तु 'गृध्रपत्रा' ( धूमपत्रा ) और
गृध्रनखी ( नाखुना ) कही है ।
× कुम्भिणीफल ( जमालगोटा ) तम्बाकू कुम्भिणी कुम्भीगूगल से अभीष्ट हो सकता है ।
‡ गुञ्जा ( रत्ति-घोंघ्चली ) को काकजङ्घा कहते हैं ।
- प्रकाशरूप वैद्युत शक्ति के उत्पादक दर्पण यन्त्र ।