सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

( छ )
विषय पृष्ठ
कापी संख्या २२-
जल में गमनार्थ प्रथम आवरण का संकोच कर लेना दूसरे आवरण के नीचे
यन्त्रों को ले आना क्षीरीपट का आवरण में उपयोग । ऊपर की वायु को चूसने के लिए
सीत्कारी यन्त्र का लगाना जिससे सर्वत्र वायु प्राप्त हो । विमान में वेणीतन्त्री—चिन्ता-
सूचिका डोरी लगाना । भाषणाकर्षक दिशाप्रदर्शक, शीतोष्णत्वमापक यन्त्र भी लगाना
कहा है । अत्यन्त वर्षा, वात, धूप आदि के प्रतीकार करने वाले यन्त्र भी लगाना । इस
प्रकार वर्षोपसंहार यन्त्र, भ्रास्यवातनिरसन यन्त्र, आतपोपसंहारयन्त्र लगाने बतलाए
हैं । वर्षोपसंहार यन्त्र कौञ्चिक (कृत्रिम) लोहे से बनाना इस यन्त्र से विमानसम्बन्धी
ऊर्ध्वगामी वायु के साथ पुरोवात-वर्षावात (पुर्वा हवा) का संघर्ष हो जाने से पुरोवात दो
टुकडों में विभक्त हो जाती है जो कि जल की दो शक्तियों द्रव (पतलापन) और प्राएन
( गीलापन ) हैं जिससे विमान पर जल बरस न सकेगा और उसे गीला