बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्म विमान ] [ ३
प्रायच्छत्सर्वलोकानामीप्सितार्थफलप्रदम् ।
तस्मिन् चत्वारिंशतिकाधिकारे सम्प्रदर्शितम् ॥ ११ ॥
नानाविमानवैचित्र्यरचनाक्रमबोधकम् ।
अष्टाध्यायैर्विभाजित शताधिकरणैर्युतम् ॥ १२ ॥
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम् ।
वैमानिकप्रकरणमुक्तं भगवता स्फुटम् ॥ १३ ॥
महर्षि भरद्वाज ने उस वेदरूप समुद्र का निर्मन्थन करके सब मनुष्यों के अभीष्ट फलप्रद्
'यन्त्रसर्वस्व' ग्रन्थरूप मक्खन को निकाल कर दिया । चालीस अधिकारों-प्रकरणों से युक्त उस 'यन्त्रसर्वस्व'
ग्रन्थ मे भिन्न भिन्न विमानों की विचित्रता और रचनाक्रम का बोधक आठ अध्यायों से विभाजित सौ
अधिकरणों वाला पांच सौ सूत्रों से युक्त आकाशयान विमान प्रधानरूप से जिसमे वर्णित है ऐसा
'वैमानिक प्रकरण' भगवान् भरद्वाज ऋषि ने सम्प्रदर्शित किया एवं स्पष्ट कहा है ॥ १०-१३ ॥
तत्रादौ मङ्गलश्लोकतत्पर्य (यस् ?) सनिरूप्यते ।
उत्तरे तापनीये च शैव्यप्रश्ने च काठके (टके ?) ॥ १४ ॥
माण्डूक्ये च यदोङ्कार परापरविभागतः
उक्त स्यादारुरुक्षूणा ब्रह्मप्राप्त्यर्थमादरात् ॥ १५ ॥
विमानत्वेन मुनिना तदेवात्राभिवर्णितम् ।
वाच्यार्थलक्ष्यार्थभेदान्द्वि(द्वि?)धा भिद्यते श्रु (श्रु?)तो ॥१६॥
तुरीय एव लक्ष्यार्थ प्रणवस्येति कीर्तित ।
तदेवाखण्डैकरसं परमात्मेति चोच्यते ॥ १७ ॥
एत(क ?)दालम्बन ष्ठलमित्यादि व (धृ ?) तिमानतः ।
गमनार्थ साधकाना भक्त्या तत्परम पदम् ॥ १८ ॥
अब प्रथम मङ्गलश्लोकों का तात्पर्य निरूपण किया जाता है उत्तर तापनीय, शैव्य प्रश्न,
कठप्रोक्त और माण्डूक्य उपनिषद् में जो ओङ्कार 'ओम्' पर अपर विभाग से वर्णित है वह आरोहण
करने को उत्सुक की ब्रह्मप्राप्ति के अर्थ आदर से कहा गया है। भरद्वाज मुनि ने इस मङ्गलाचरण में
उसी ओम् ब्रह्म का विमान रूप से वर्णन किया है, उक्त ओम् रूप ब्रह्म वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ के
भेद से उपनिषद् रूप श्रुति में दो प्रकारों में विभक्त हो जाता है। प्रणव अर्थात् ओम् का तुरीयरूप
अर्थात् चतुर्थ अमात्र रूप या वस्तुरूप ही लक्ष्यार्थ है ऐसा कहा है वही अखण्ड एकरस परमात्मा है
ऐसा भी कहा है। यही आज्ञारूप आलम्बन श्रेष्ठ है 'एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्' इत्यादि
उपनिषद् वचनों के प्रमाणानुसार उपासकों का भक्ति से प्राप्त करने योग्य वह परम पद है ॥ १४-१८ ॥
वाचक ( ) प्रणवो ह्यत्र विमान इति वर्णितः ।
तमारुह्य यथाशास्त्रं गुरुक्तेनैव वर्त्मना ॥ १६ ॥
ये विशन्ति ब्रह्मपदं ब्रह्मचर्यादिसाधनात् ।
तदद्य मङ्गलश्लोकरूपेण प्रतिपादित ॥ २० ॥