बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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सांयोजक, किरणजन्य आदि ३२ विद्युद्यन्त्र होते हैं परन्तु विमान में सांयोजक विद्यु-
द्यन्त्र का लगाया जाना अगस्त्य के शक्तितन्त्र के अनुसार कहा जाना ॥ २५३-२६६
कापी संख्या १९----
विद्युत्-शक्ति पूरक पात्र बनाने का प्रकार, विमानको भूमि से ऊपर उठानेके
लिए वातप्रसारणयन्त्र (वायुके फेंकनेवाला यन्त्र) लगाना, २६०० कक्ष्यागति (अश्वगति)
से वात को फेंकना, वायु के निकलने से विमान का वेग से दौड़ना । सुन्दरविमान
का आवरण भी शकुनविमान की भांति राजलोहे से बनाया जाना, कमरे और शेष ३२
अंग भी वैसे ही बनाना । विमान के चलने में धूम आदि निकालने का वेगप्रमाण
गणित शास्त्र से निश्चित किया जाना, एक चुटकी बजाने जितने काल में धूमोद्गम
यन्त्र (एन्जिन) से औष्म्य वेग ३४८० लिङ्क (डिग्री) प्रमाण में हो जाने पर विमान
का एक घड़ी में ४०० योजन अर्थात् एक घण्टे में ४००० कोस (लगभग ८०००
मील) परिमाण से गति करना ॥ २७०-२८०
कापी संख्या २०----
तीसरे रुक्मविमान का राजलोहे से बनना और पाकविशेष से रुक्म अर्थात्
स्वर्ण रंग वाला बन जाना अत एव उसका रुक्म विमान नाम से कहा जाना । १२
बालिश्त लम्बा चौडा लोहपिण्ड चक्र श्रृंखला तन्त्री (जञ्जीर) द्वारा अन्य चक्रों से युक्त
होने पर गतिशील होता है, अंगूठे द्वारा बटनका दबाने से सब कलायन्त्रों का चल
पडना और विद्युत् के योग से धूम का ५०० लिंक (डिग्री) वेग हो जाना चकताइडन-
स्तम्भ के आकर्षण से विमान का वेग से उड़ना । रुक्म विमान में अभ्रक की भित्तिया
आदि बनाया जाना ॥ पृष्ठ २८१-३०१
कापी संख्या २१-
त्रिपुर विमान अपने तीन आवरणों से पृथिवी जल आकाश में चलने वाला
होने से त्रिपुर विमान नाम से प्रसिद्ध होना । प्रथम भाग से पृथिवी पर दूसरे भाग से
जल में तीसरे भाग से आकाश में गमन करता है । त्रिपुर विमान में किरणजन्य
विद्युत् से काम लेना । त्रिपुर विमान के ऊपर नीचे चक्रों में शक्ति होने से उसका
पर्वतों पर चढ़ने तिरछे चलने में समर्थ होना । त्रिपुर विमान में अभ्रक का विशेष
प्रयोग करना, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र नाम से अभ्रक के चार भेद कहे गए, श्वेत
ब्राह्मण रक्त क्षत्रिय पीत वैश्य और कृष्ण शूद्र अभ्रक बतलाया है । ब्राह्मण अभ्रक के
१६, क्षत्रिय अभ्रक के १२, वैश्य अभ्रक के ७ और शूद्र अभ्रक के १५ भेद । त्रिपुर
विमान में दिशाओं में घूमने वाले घर लगाना । उसका प्रथम आवरण सब से बड़ा
दूसरा उससे छोटा तीसरा और भी छोटा होना । प्रथम आवरण के ऊपर नीचे मुख-
वाले पेंचों में घूमने वाले हस्त चक्रों-मण्डूक हस्तचक्रों का लगाया जाना उनका विद्युत्-
तारों से युक्त हो जल में गति करना ॥ पृष्ठ ३०२-३१८