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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 368 में से

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पृष्ठ 25

२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्वतस्सिद्धन्यायशास्त्रं वाल्मीकिगणितं तथा ।
परिभाषाचन्द्रिकां च पञ्चान्नामार्थकल्पकम् ॥ २ ॥
पञ्चवारं विचार्यैथ तत्प्रमाणानुसारतः ।
बालानां सुखबोधाय बोधानन्दयतीश्वरः ॥ ३ ॥
सङ्ग्रहाद् वैमानिकाधिकरणस्य यथाविधि ।
लिलेख बोधानन्दवृत्त्याख्यां व्याख्यां मनोहराम् ॥ ४ ॥
व्याख्या लक्षणरीत्यास्य पाणिनीया[य्या ?] ❀दिमानतः ।
पारिभाषिकरूपत्वाद् व्याख्यातुं नैव शक्यते ॥ ५ ॥
महान् देव परमेश्वर महती देवतारूप वाणी-वेदवाणी, निज गुरुवर गणपति को तथा 'यन्त्र-
सर्वस्व' नामक शास्त्र एवं तद्ग्रन्थ 'वैमानिक प्रकरण' के रचयिता महर्षि भरद्वाज को श्रद्धापूर्वक एवं
यथावत् प्रणाम करके स्वत सिद्ध न्यायशास्त्र तथा वाल्मीकि गणित और परिभाषाचन्द्रिका ग्रन्थ को पुन
नामार्थकल्प ग्रन्थ को पांच बार विचार करके तथा उनके प्रमाणानुसार विद्यार्थियों के सुखबोध-सरल
ज्ञान के लिए मुझ बोधानन्द यतीश्वर ने वैमानिक प्रकरण की बोधानन्दवृत्ति नाम की मनोहर व्याख्या
को सङ्क्षेप से यथाविधि लिखा है । इस ग्रन्थ की व्याख्या पारिभाषिकरूप होने से पाणिनीय आदि
के अनुसार लक्षणरीति से स्पष्ट नहीं की जा सकती है+ ॥ १-५ ॥
प्रारिप्सितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नेन यथाक्रमम् ।
परिसमाप्तिप्रचयगमनाभ्यां यथाविधि ॥ ६ ॥
शिष्टाचारपरिप्राप्तमङ्गलाचरणं स्वतः ।
अनुष्ठाय यथाशास्त्रं शिष्याशिक्षार्थमादरात् ॥ ७ ॥
यद्विमानगतास्सर्वेत्युक्तश्लोकाद्यथाक्रमात् ।
स्वेष्टदेवनमस्काररूपमङ्गलमातनोत् ॥ ८ ॥
अर्थात्सूचयति ग्रन्थादनुबन्धचतुष्टयम् ।
ब्रह्मानुग्रहसल्लब्धवेदराशिं कृपाकरः ॥ ९ ॥
प्रारम्भ करने में अभीष्ट ग्रन्थ की यथाक्रम निर्विघ्नरूप से यथाविधि परिसमाप्ति और विस्तार
प्रचार के लिये एवं शिष्यों की शिक्षा के अर्थ शास्त्रानुसार आदर से शिष्टाचारपरम्परा से प्राप्त मङ्गला-
चरण का स्वयं अनुष्ठान करके 'यद्विमानगतास्सर्वे' उक्त श्लोक से क्रमानुसार निज इष्टदेव का नमस्कार-
रूप मङ्गल का महर्षि भरद्वाज ने सेवन किया है। परमेश्वर के अनुग्रह से समस्त वेदज्ञान को प्राप्त
हुआ, दयालु ग्रन्थकार निज ग्रन्थ से अनुबन्धचतुष्टय को प्रकरण एवं प्रसङ्ग से सूचित करता है ॥१-६॥
निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः ।
नवनीतं समुद्धृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम् ॥ १० ॥

  • यहां हस्तलेख में 'पाणिनीय्यादिमानत' प्रयोग से 'नीय्य' यकारद्वित्व है और ऐसा अनेक स्थलों पर
    आया है, हो सकता है यह शैली दाक्षिणात्य हो ।
  • इस ग्रन्थ का समस्त हिन्दी भाषा का अनुवाद हमारा ( स्वामी ब्रह्ममुनि का ) है ।