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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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ज्वालामुखीविषशक्ति है जिससे यात्री मर जाते तक हैं उस विषशक्ति के नाशार्थ पट्टिका-
भ्रकयन्त्र लगाना । शरद् और हेमन्त ऋतु की शीतता को निवृत्त करने के लिये
सूर्यशक्त्यपकर्षण यन्त्र लगाना । शत्रु के विमानोंद्वारा अपना विमान घिर जाने पर
उनके ऊपर अपस्मारधूमप्रसारणार्थ अपनी रक्षा के अर्थ अपस्मारधूमप्रसारणाख्ययन्त्र
लगाना । अभ्रमण्डलों एवं वायुप्रवाहों के सङ्घर्ष में विमान को अविचलित रखने के
लिये स्तम्भनयन्त्र का होना । अग्निहोत्रार्थ और पाकार्थ वैश्वानरनालयन्त्र भी लगाना ॥ २१३-२२८
कापी संख्या १६--
मान्त्रिक, तान्त्रिक, कृतक ( यान्त्रिक ) नाम से विमानों के तीन जातिभेद ।
त्रेतायुग में मान्त्रिक--मन्त्रप्रभाव योगसिद्धि से, द्वापर में तान्त्रिक-तन्त्रप्रभाव-
औषध युक्ति से, कलियुग में कृतक-यान्त्रिक-यन्त्रकलापरायण। मान्त्रिक विमान के
२५ प्रकार "यन्त्रसर्वस्व" ग्रन्थ में महर्षि भरद्वाज के अनुसार, किन्तु "मणिभद्रिका"
ग्रन्थ में गौतम के अनुसार ३२ हैं ॥ २२६-२३६
कापी संख्या १७--
तान्त्रिक विमान के भेद ५६ कहे हैं । कृतक अर्थात् यान्त्रिक-यन्त्रकला से
चालित विमान २५ प्रकार के हैं । कृतक ( यान्त्रिक) विमानों में प्रथम शकुन विमान
है उसके पीठ पक्ष पुच्छ आदि २८ अङ्गों का वर्णन और रचना भिन्न भिन्न ओषधि
खनिज पदार्थों के पुट से बनाए हुए भिन्न भिन्न कृत्रिम लोहों से करना । शकुन विमान
की पीठ पर तीन बड़े कमरे बनाना, प्रथम में विमान के अङ्गयन्त्रों और उपकरणों को
रखना दूसरे में स्तम्भ के साथ यात्रियों के बैठने को घर ( Compartments )
तीसरे में विमान के सिद्ध यन्त्र आदि साधन । शकुन विमान में चार औष्ण्य यन्त्र
( ऐञ्जिन ), चार वाताकर्षण यन्त्र वायु को खींचने के लिये, भूमि पर सञ्चार करने
को भी चक्र लगाना ॥ २३७-२५२
कापी संख्या १८--
दूसरा सुन्दर विमान है, उसमें धूमोद्गम आदि ८ विशेष अङ्ग हों । पात्र में
धूमाञ्जन तैल, हिंगुल तैल, शुक्ततुण्डि तैल, कुलटी ( मन शिला ) का तैल भरना ।
विद्युत् के संयोजनार्थ मणिपीठ के अन्दर नालमार्ग से दो तार लगाना, नालस्तम्भ के
अन्दर धूम को रोकने और फेंकने के अर्थ छिद्रसहित घूमने वाले तीन चक्र नाल सहित
लगाना तैलधूम और जलधूम की नालें उन्हें बाहर निकालने को लगाना एवं ४० यन्त्र
सुन्दर विमान में लगाना । शुण्डाल--शुण्ड जैसा यन्त्र १ बालिश्त मोटा १२ बालिश्त
लम्बा ऊंचा हो जिससे विमान दौड़ता है। दूध गोन्द वाले वृक्षों के दूध गोन्द तथा
विशेष निर्दिष्ट लोहे आदिको मिला कर शुण्डाल का बनाया जाना । शुण्डाल से धूम
निकालने और वायुको खींचने के द्वारा विमान का चलाना । संघर्षण,पाकजन्य,जलपात,

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