बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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वातसंघर्ष से विमान को बचाने वाला पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र लगाना जिसके नालों से
वातविषशक्तिया विमान से खिंचकर बाहिर निकल जाती हैं । आवह आदि १२२ भेदों
में हैं ७६ वा वातायन प्रवाह है जहां ग्रीष्म ऋतु में विमान की वक्रगति से यात्रियों को
हानि की सम्भावना है विमान की वक्रगति को रोकने के लिये विमान के लिये विमान
के नीचे पार्श्वकेन्द्र में वातस्तम्भनाल कीलयन्त्र लगाना । वर्षा ऋतु में विद्युत् से उत्पन्न
अग्निशक्ति की शान्ति विद्युद्दर्पणयन्त्र से हो जाना बर्फ के समान ठण्डा हो जाना।
आकाशीय ३०४ शब्दों में मेघतरङ्ग वायु विद्युत् की कड़क से ८ वें स्तर में श्रोत्र-
विदीर्णता और बधिरता आदि हानि से बचने को शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र लगाना ॥ १५५-१७३
कापी संख्या १२-
आकाश में रोचिषी आदि १२ उल्काएं विद्युत् से भरी हैं उक्त उल्काओ
में स्थित विद्युत् के प्रहार से विमान को बचाने के लिये विद्युदुद्वादशकयन्त्र लगाना ।
विमान में स्थित धूम, विद्युत् और वायु को नियन्त्रित करने और उपयोग में लेने के
लिये प्राणकुण्डलिनी यन्त्र लगाना । जिससे विमान की विविध गतिया सिद्ध होती हैं ॥ १७४-१८३
कापी संख्या १३-
आकाश में ग्रहों के प्रभाव से विमानपथरेखा में शीतरसधारा शीतधूमधारा
शीतवायुधारा वेगसे आ जाया करती हैं जोकि विमानके कलपुर्जो को शिथिल और यात्रियों
को रुग्ण तथा विमानपथ को अदृश्य कर दिया करती हैं उन्हें निष्फल करने या उनके
प्रहार से बचने के लिये शक्त्युद्गमयन्त्र लगाना । शत्रुद्वारा दम्भोलि (तारपीडो जैसे)
आदि विघातक आठ यन्त्र स्वविमान के मार्ग में फेंके हुओं से बचाने के लिये
स्वविमान की वक्रगति देने के निमित्त वक्रप्रसारणयन्त्र लगाना । विद्युत्शक्ति को सर्वत्र
विमानाङ्गों में प्रेरित करने के लिये विद्युत-शक्ति से पूर्ण तारों से घिरा पिञ्जरा जैसा
शक्तिपञ्जरयन्त्र लगाना। मेघों से विद्युत् के पतन की आशङ्का पर विमान के शिर पर
छत्री के आकार का घूमता हुआ शिर कीलकयन्त्र लगाना जिससे विद्युत् का प्रभाव
कोसों दूर रहे । विविध शब्दों भाषा भाषणो बाजे स्वर सङ्कल्प आदि को खींचनेवाला
शब्दाकर्षणयन्त्र लगाना ॥ १८४-१८६
कापी संख्या १४-
भिन्न भिन्न भय आदि अवसरों पर जैसे वैसे रंग के वस्त्र का प्रसारण होना
आठों दिशाओं में ग्रहों और किरणो की सन्धियों में ऋतुकाल सम्बन्धी १५ कौबेर-
विद्युत् शक्तिपूर्ण वायुए हैं उनसे यात्रियों को विविध कष्ट सम्भावनीय हैं उनसे बचाने
के लिये दिशाम्पतियन्त्र लगाना ॥ १८६-२१२
कापी संख्या १५-
ग्रहों के सञ्चार मार्गों में ग्रहों के परस्पर, एक रेखाप्रवेश से ग्रहसन्धि में