बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकापो संख्या १—
यन्त्रसर्वस्वे
✻ वैमानिकप्रकरणम् ✻
मङ्गलाचरणम्
यद्विमानगतास्सर्वे यान्ति ब्रह्म परं पदम् ।
तन्नत्वा परमानन्द श्रु [शृ ?] तिमस्तकगोचरम् ॥ ✕
पूर्वाचार्यकृतान् शास्त्रानवलोक्य यथामति ।
सर्वलोकोपकाराय सर्वानर्थविनाशकम् ॥
त्रयीहृदयसन्दो [ब्दो ?] हमारूपं सुखप्रदम् ।
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं शताधिकरणैस्तथा ॥
अष्टाध्यायसमायुक्तमतिगूढं मनोहरम् ।†
जगतामतिसन्धानकारणं शुभदं नृणाम् ॥
अनायासाद् व्योमयानस्वरूपज्ञानसाधनम् ।
वैमानिकप्रकरणं कथ्यतेऽस्मिन् यथामति ॥
मङ्गलाचरणवचनों की बोधानन्दकृत व्याख्या —
व्याख्यानश्लोकाः +
महादेवं महादेवीं वाणीं गणपतिं गुरुम् ।
शास्त्रकारं भरद्वाजं प्रणिपत्य यथामति ॥ १ ॥
✕ गुजराती मे 'ऋ' का 'रु' उच्चारण करते है अत यहा 'श्रुति' का 'शृति' उच्चारणक्षमता से लिपिप्रमाद
है जो कि वृत्तिकार के पश्चात् किसी गुजराती कापी करने वाले का काम है।
† भरद्वाज महर्षि ने 'वैमानिक प्रकरण' को पाच सौ सूत्रो, सो अधिकरणो ओर आठ अध्यायो मे लिखा है
यह इस कथन से स्पष्ट होता है।
- मङ्गलाचरण वचन महर्षि भरद्वाज के है 'महादेव ' से व्याख्यानश्लोक वृत्तिकार बोधानन्द यति के है।