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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

१४४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शङ्कुकीले बनावें उसे शीतरञ्जिकादर्शीतारों से लपेटकर मौञ्जिकापटकोश-मूञ्ज के टाट के थैले से पृष्ठ
भाग को ढक दे ॥ १४३-१४७ ॥
बाहुमात्रोर्ध्वतत्सूर्यकिरणाभिमुखं यथा ।
विद्युत्तन्त्रीसमायुक्तशङ्कुकीलद्वयादथ ॥ १४८ ॥
विमानदक्षिणकेन्द्रशलाकोर्ध्वमुखे दृढम् ।
स्थापयेत् पिञ्जुलादर्शं किरणाकर्षणोन्मुखम् ॥१४९॥
तेन मेघोभिवृद्धिश्च प्राणात्राणमेव च ।
आतपाशनिवेगापकर्षणाद्यानयन्तृणाम् ॥१५०॥
भवेत् स्वभावत पश्चात् तापशीतलता व्रजेत् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन व्योमयाने यथाविधि ॥१५१॥
स्थापयेत् पिञ्जुलादर्शं यन्तॄणां प्राणदायकम् ॥१५२॥ इत्यादि ॥
सूर्यकिरण के सामने विद्युत के दो तारों से युक्त बाहुमात्र ऊँचे दो शङ्कुकी

नालपञ्चकयन्त्र ] [ १४५
भरकर वेग से सौ दर्जे की उष्णता से गलावे ऐसा करने पर तैल के लेप से शुद्ध हुआ वातायनी लोह
अतिमृदुल सूक्ष्म लघु सुवर्णरंगवाला सुदृढ बन जाता है ॥ १५४-१५७॥
द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णं द्वादशाङ्गुलमुन्नतम् ।
कुर्याद् वातायनीलोहात् पञ्चनालान् यथाविधि ॥१५८॥
एकैकधूमप्रमाण नालमूलेषु पञ्चसु ।
सन्धार्य व्योमयानस्य वामपार्श्वमुखे क्रमात् ॥१५६॥
संस्थापयेत् पञ्चनालान् पञ्चसन्धिषु शास्त्रतः ।
मुखानि पञ्चनालाना दिक्षु पूर्वादिषु क्रमात् ॥१६०॥
स्थापयेद् विधिवत् पश्चादूर्ध्वं तूर्ध्वमुख यथा ।
नालमूलस्थमणयः पश्चाद् धूम शनैश्शनैः ॥१६१॥
आकृष्य नालमूलस्थमुखच्छिद्रेषु योजयेत् ।
ततो वातायनीनालमुखेभ्यो वेगतः क्रमात् ॥१६२॥
निक्षेपं याति तद्धूमो बाह्ये विलयमेधते ।
तेन यानस्थयन्तॄणां धूमनाशात् सुखं भवेत् ॥१६३॥
तस्माद् विमाने तन्नालपञ्चक विधिवन्न्यसेत् । इत्यादि ॥
१२ अङ्गुल चौडे १२ अङ्गुल ऊंचे वातायनीलोह से पांच नालें बनावें । एक एक धूम के
प्रमाण में पांचों नालमूलों में लगाकर विमान के वामपार्श्व भाग में क्रम से पाच सन्धियों में शास्त्र से
पांच नालों को संस्थापित करे । पांचों नालों के मुख पूर्व आदि दिशाओं में क्रम से विधिवत् स्थापित
करे पश्चात् ऊपर में जैसे नालमूलस्थ मणियां ऊर्ध्वमुख—ऊपर की ओर धीरे धीरे धूंए को खींचकर नाल
मुख में स्थित मुख छिद्रों में जोड दे फिर वातायनी नालमुखों से धूंवा वाहिर वेग से सर्वथा लय
को प्राप्त हो जाता है । इस से धूमनाश से विमान में स्थित यात्रियों को सुख होता है अतः विमान में
वह ५ नाल विधिवत् लगावे ॥ १५८-१६३ ॥
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हस्तलेख कापी संख्या १०—
गुहागर्भादर्शयन्त्रनिर्णयः—गुहागर्भादर्शयन्त्र का निर्णय करते हैं—
नालपञ्चकमुक्त्वैव सङ्ग्रहेण यथाविधि ।
गुहागर्भादर्शयन्त्रमिदानी सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार संक्षेप से नालपञ्चक कहकर अब गुहागर्भादर्शयन्त्र कहते हैं ॥१॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
विमानखण्डनार्थाय शत्रुभिर्भुमुखान्तरे ।
महागोलाग्निगर्भादियन्त्रपञ्चकमद्भुतम् ॥२॥
यत्र यत्र रहस्येन स्थापित सर्वतोमुखम् ।
तत्स्वरूपपरिज्ञानसिद्धयर्थं शास्त्रत क्रमात् ॥३॥
गुहागर्भादर्शयन्त्रं स्थापयेद् व्योमयानके ।
विमान के तोड़ने के अर्थ शत्रुओंद्वारा भूमि के मुख के अन्दर महागोल अग्निगर्भ आदि
अद्भुत पञ्चकयन्त्र जहां जहां गुप्तरूप से सब ओर मुख वाला स्थापित किया है, उसके स्वरूप परि-
ज्ञान की सिद्धि के अर्थ शास्त्र से क्रम से विमान में गुहागर्भादर्श स्थापित करे ॥२—३॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
द्वासप्ततिमसंख्याकादर्शमाहृत्य शास्त्रतः ॥४॥
त्रिकोणवर्तुलचतुष्कोणाकारंयथाविधि ।
त्रिधा कृत्वा ततोञ्जिष्ठवृक्षकाष्ठविनिर्मिते ॥५॥
नीडे सन्धार्य पूर्वोक्तदर्पणान् सुदृढ यथा ।
पञ्चधारालोहकृतशङ्कुभिस्सुदृढै क्रमात् ॥६॥
बन्धयित्वाथ पूर्वोक्तकाष्ठयन्त्रे नियोजयेत् ।
अधोमुखं वर्तुलादर्शमधस्तात् प्रकल्पयेत् ॥७॥
चतुष्कोणादर्शमूर्ध्वास्यं यथा सन्नियोजयेत् ।
त्रिकोणदर्पणं (तु) तद्द्वयो पश्चिमान्तरे ॥८॥
संस्थापयेत् पञ्चमुलकीलीयोगाद् यथाक्रमम् ।

गुहागर्भादर्शयन्त्र ] [ १४७
चतुष्कोणादर्शमूलकेन्द्रशङ्कुमुलान्तरात् ॥६॥
यन्त्रपीठाग्नेयकेन्द्रशङ्कुमुलान्तरावधि ।
रविखर्परपञ्चास्यलोहमिश्रिततन्त्रिभि. ॥१०॥
सन्धारयेद् दृढ पश्चात् पारग्रन्थिकद्रावके ।
स्थापयेच्चुम्बकमणिं तन्त्रीमूलांश्च तन्मुखे ॥११॥
७२ वी संख्या वाले आदर्श को लेकर शास्त्रीति से त्रिकोण गोल चतुष्कोण आकार से यथा-
विधि तीन प्रकार करके [असिष्ठावृत्त ?—सूर्य—सूर्यावर्त वृत्त के काष्ठ से बने लम्ब कोश मै पूर्वोक्त
दर्पणों को सुदृढ़ लगाकर पञ्चधारा कृत्रिम लोहे से बने शंकुओं से बान्धकर पूर्वोक्त काष्ठयन्त्र मै नीचे
लगावे, गोल भाग नीचे करके लगावे, चतुष्कोण आदर्श-दर्पण ऊपर मुखवाला लगावे । त्रिकोण दर्पण
उसी प्रकार दोनों के पश्चिम की ओर पञ्चमुख कील के योग से यथाक्रम संस्थापित करे, चतुष्कोण
आदर्श मूलकेन्द्र के शंकु के मुख में से यन्त्रपीठ के आग्नेय केन्द्र के शंकुमूल तक । ताम्बा खपरिया
पञ्चास्य लोहों से मिले—बने तारों से लगावे पश्चात् पारग्रन्थिक द्रावक-पारागन्धक द्रावक मै चुम्बक-
मणि को और तारों के मूलों—सिरों को भी स्थापित करे ॥४-११॥
प्रसार्य विधिवत् तस्मात् तन्त्रीमन्यान् चतु ❀ क्रमात् ।
त्रिकोणादर्शमावृत्य ऊर्ध्वास्थ्यादर्शमध्यत ॥१२॥
अधोमुखादर्शमध्यकेन्द्रस्थाने दृढ यथा ।
सन्धार्य विधिवत् पश्चात् सूर्यांशून् पार्श्वत क्रमात् ॥१३॥
शक्तिपश्चिमदिग्भागान्नोदयेत् प्रमाणत ।
बिम्बाकर्षणनिर्यासलेपित पटदर्पणम् ॥१४॥
त्रिकोणाभिमुख (भवेद् ?) यथा तत्र नियोजयेत् ।
पूर्वोक्तसूर्यकिरणान् शक्त्या सह तत परम् ॥१५॥
अत अन्य चार तारों को विधिवत् फैलाकर त्रिकोण आदर्श को घेर कर ऊपर वाले आदर्श के
मध्य से नीचे वाले आदर्श के मध्य केन्द्रस्थान में विधिवत् दृढ लगाकर पश्चात् सूर्यकिरणों की पार्श्व—
शक्ति के पश्चिम दिशा की ओर से प्रमाण से प्रेरित करे, विम्ब—सूर्यविम्ब को आकर्षित करने वाले
निर्यास-गोन्द से लेपे हुए पटदर्पण-वस्त्ररूप दर्पण को त्रिकोण आदर्श के सम्मुख नियुक्त करे, फिर
पूर्वोक्त सूर्यकिरणों को शक्ति के साथ—॥१२-१५॥
द्रावकस्य मणौ सम्यग्योजयेत् सर्वतोमुखम् ।
अधोमुखे ततश्शुद्धे वर्तुलाकारदर्पणे ॥१६॥
मणिस्यानात् समाहृत्य तदशून् शक्तिमिश्रितान् ।
प्रसार्य सप्रमाणेण पश्चात् तन्मुखकेन्द्रत ॥१७॥
यानसञ्चारमार्गाधस्थितभूम्यां प्रयोजयेत् ।
पश्चात् तत्किरणास्तम्यक्श्वतधा सह स्ववेगतः ॥१८॥
❀ भविभक्तिकनिर्देश आर्षः ।

१४८ ]
[ शुद्ध विद्याप्रकाश
प्रविश्य भूमुखं तत्र सर्वत्र स्थापितं क्रमात् ।
महागोलाग्निगर्भादियन्त्रान् व्याप्याथ शक्तितः ॥१९॥
सम्यगावृत्य साङ्गानि तत्स्वरूपाण्यस्फुटम् ।
पूर्वोक्तद्रवमध्यस्थमणावूर्ध्वमुखं यथा ॥२०॥
द्रावक में स्थित मणि में सब ओर सम्यक् लगावे फिर नीचे की ओर शुद्ध गोलाकार दर्पण में
मणिस्थान से शक्तिमिश्रित उन किरणों को लेकर सप्रमाण फैलाकर पश्चात् उनके मुखकेन्द्र से विमान
के गतिमार्ग के नीचे स्थित भूमि में प्रेरित करे पश्चात् वे किरणें भली प्रकार शक्ति के साथ अपूर्व वेग
से भूमि के मुख में प्रविष्ट होकर वहां सर्वत्र स्थापित महागोल अग्निगर्भ आदि यन्त्रों को व्याप कर शक्ति
से भली प्रकार घेरकर अंगोंसहित उनके स्वरूपों को स्फुटरूप में पूर्वोक्त द्रवमध्यस्थ मणि में ऊर्ध्वमुख
जिस प्रकार हो ऐसे-॥१९-२०॥
आदर्श मुखवतेषा प्रतिबिम्बं प्रकुर्वति ।
त्रिकोणादर्शामिमुखमध्यतन्त्रग्रसस्थिते ॥२१॥
बि

गुहगर्भादर्शयन्त्र ] [ १४६
एडं मयूखं सुरुचि पटोल पारं करञ्ज रविशर्करात्रयम् ।
सुटङ्कणं गन्धकचारु शाल्मली बिण्डीरनिर्यासकुरङ्गरोहिणी ॥२८॥
मण्डूरपञ्चाननसैंहिकान् शिव विश्वाभ्रकं पार्वणिज विदूरकम् ।
रुद्रोद्रुवाणार्कगजाब्धिविश्वमुन्यब्धिभूतानलतारकाभ्रका ॥२९॥
द्वात्रिंशत्तिस्त्रिशतिर्वस्वकंमूर्तिग्रहराशितः क्रमात् ।
सन्तोल्य वस्तून् तुल्या यथाविधि सङ्गृह्य भागाशप्रमाणतः क्रमात् ॥३०॥
सम्पूर्य चञ्चुपुटमूषवक्त्रे वराहकुण्डेय निधाय च दृढम् ।
धमनेत् क्रमात् कश्यशतोष्णवेगात् कूर्माख्यभस्त्रेण निमीलनावधि ॥३१॥
संगाल्य सङ्गृह्य च तद्रस पुनः सम्पूरयेद यन्त्रमुखे शनैश्शनैः ।
एवकृते शुभ्रमतीव सूक्ष्म शताधिकव्यापकशक्तिसयुतम् ॥३२॥

१५० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रतिबिम्बाकर्षणादिशक्तयः पञ्च सर्वदा ।
यतोञ्जिष्ठावृक्षगर्भे प्रकाश्यन्ते स्वभावतः ॥ ३६ ॥
ततस्सर्वेषु वृक्षेषु एतदञ्जिष्ठमेव हि ।
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहुरेतद्यन्त्रक्रियाविधौ ॥ ३७ ॥
इत्यादि-अगस्तत्वलहर्याम् ॥
प्रतिबिम्बाकर्षण आदि शक्तियां ५ सर्वदा जिस से अञ्जिष्ठ वर्ग में प्रसिद्ध हैं स्वभावतः । सब
वृक्षों में यह अञ्जिष्ठ ही को यन्त्रक्रियाविधि में अत्यन्त श्रेष्ठ कहते हैं । इत्यादि-अगस्तत्व लहरी मैं
कहा है ॥ ३६-३७ ॥
अथ पञ्चधारालोहनिर्णयः- अब पञ्चधारालोह का निर्णय करते हैं-
शङ्कवो बहवस्सन्ति नानायन्त्रक्रियाविधौ ।
पञ्च धारालोहकृतशङ्कवस्तेषु शास्त्रतः ॥ ३८ ॥
गुहागर्भदर्शयन्त्रदर्पणादिनिबन्धने ।
सुप्रशस्ता इति प्रोक्ता यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥ ३९ ॥
शङ्कु बहुत हैं नानायन्त्रक्रियाविधि में, पञ्चधारालोहे के बने शङ्कु उन में शास्त्र से प्रशस्त
कहे हैं ॥ ३८-३९ ॥
तदुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे-वह कहा है लोहतत्त्वप्रकरण में-
द्विवङ्गामाक्षिकिशुल्वकेन्द्ररुकान् शोधितान् । शास्त्रतस्सङ्गृह्याथ मृगेन्द्र-
मूषमुखतस्सम्पूर्थ्य मण्डोदरे । चञ्चूभस्त्रामुखाद् धमेत् त्रिशतकक्ष्योष्णप्रवेगात् ।
क्रमात् सञ्चाल्यापि च तद्रस समदल कृत्वा न्यसेद् यन्त्रके ॥ ४० ॥
धारापञ्चकसंयुक्त सुरुचिर भास्वत्स्वरूप दृढ लोहम् ।
भारयुत वदन्ति मुनयस्त पञ्चधाराभिधम् ॥ ४१ ॥
द्विवङ्क-लोहाविशेष, या जस्ता ? सोनामाखि, शुल्व-ताम्बा, इन्द्र-स्थावर विष-वज्र, रुरुक-लोहविशेष
या हरिण का सींग ?, शास्त्र से शोधे हुओं को लेकर मृगेन्द्रमूषामुख से मण्डोदर में भरकर चञ्चू—चूच-
भस्त्रामुख से ३०० दर्जे की उष्णता के वेग से धोंके क्रम से गलाकर उस पिंघले रस को बराबर करके
यन्त्र में रख दे । धारापञ्चकलोह से युक्त सुरुचिर चमकस्वरूपवाला दृढ भारवान् पञ्चकधारा नाम का
लोहा मुनि कहते हैं ॥ ४०-४१ ॥
अथ पारमन्थिकद्रावकनिर्णयः- अब पारमन्थिक द्रावक का निर्णय देते हैं-
मणिसंस्थापनार्थाय तन्त्रीमूलसमाकुलम् ।
कथ्यते सग्रहादत्र पारग्रन्थिकद्रावकम् ॥ ४२ ॥
मणि के संस्थापनार्थ तन्त्रीमूल से युक्त संक्षेप से पारमन्थिक द्रावक कहा जाता है ॥ ४२ ॥

गुहागर्भदर्शयन्त्र ] [ १५१
पार वैणविकं चैव लम्बोदरमृत्कुण्डके ।
जटाग्रन्धि पार्वणिकं स्वर्णबीजं घटोद्गजम् ॥ ४३ ॥
सम्मेल्य विधिवच्छुद्धानेतान् तुल्यप्रमाणतः ।
द्रावकाकर्षणयन्त्रे द्रावकं तु समाहरेत् ॥ ४४ ॥
तद्द्रावकं हेमवर्णं सुशुद्धं सुप्रभं भवेत् ।
एतद् बिम्बाकर्षणादिप्रयोगेषु यथाविधि ॥ ४५ ॥
उपयुक्तं भवेत् तस्मात् पारगन्धिकद्रावकम् ।
सम्पादयेद् विशेषेण प्रतिबिम्बाकर्षणे ॥ ४६ ॥ इत्यादि ।
पारा, वंशलोचन या बांस का क्षार, लम्बेपेटवाले मिट्टी के कुण्ड में जटाग्रन्धि ?—जटामांसी
की ग्रन्थि, पार्वणिक वृक्ष, स्वर्णबीज—धतूरे के बीज, घटोद्गज ?—घटोत्कच—राक्षस—रोहेडा वृक्ष ?
विधिवत् शुद्ध इन को समान प्रमाण से द्रावक आकर्षणयन्त्र-द्रावक खींचनेवाले यन्त्र में मिलाकर द्रावक
को लेले वह द्रावक सुनहरा शुद्ध सुन्दर—प्रभावाला हो जावे, वह बिम्बाकर्षण आदि प्रयोगों में यथाविधि
उपयुक्त हो सके, अतः पारगन्धिक द्रावक विशेषरूप से प्रतिबिम्बाकर्षण के निमित्त सम्पादन करे—
बनावे ॥ ४३-४६ ॥
अथ चुम्बकमणिनिर्णय —अथ चुम्बकमणि का निर्णय देते हैं—
उक्तेषु मणिवर्गेषु प्रतिबिम्बाकर्षणे ।
शास्त्रज्ञैश्चुम्बकमणिःश्रेष्ठमित्युच्यते क्रमात् ॥४७॥
उक्त मणि वर्गों में प्रतिबिम्बाकर्षण के निमित्त शास्त्रज्ञविद्वानों द्वारा चुम्बक मणि श्रेष्ठ
कही है ॥४७॥
तदुक्तं मणिदीपिकायाम्—वह कहा है मणिदीपिका में—
चुम्बकश्शर्करादन्त्य शौण्डिकपारदपार्वणशुल्वम् ।
रञ्जकमाक्षिकगृधिकसौरि महिषखुर तद्विश्वकपालम् ॥४८॥
विधिवच्छुद्धीकृतसमभागान् कर्पटमूषामुखमध्यविले ।
सम्पूर्याक्षतव्यासटिकाया सस्थाप्योलूकिकभस्त्रमुखात् ॥४९॥
धमयेत् कथ्यशतोष्णिकवेगात् सङ्गाल्य रस वरयन्त्रमुखे ।
संसिच्चेद् यदि भवति सुरूप चुम्बकमणिरत्यन्तविशुद्धम् ॥५०॥ इत्यादि ॥
चुम्बक-कान्तलोह, शर्कर-रेत, टङ्कण-सुहागा, दन्त्य-हाथीदान्त का चूर्ण, शौण्डिक-पिप्पली ?
या लोहविशेष ?, पारा, पार्वण—पर्वणि—पर्ववाले वृक्ष का क्षार, शुल्व—ताम्बा, रञ्जक—हिङ्गुल—
शिंगरफ, सोनामाखी, गृधिक ?, सौरि—आदित्यभक्ता—हुलहुल, या भल्लातक ?, भैंस का खुर,
विश्वकपाल ? विधिवत् शुद्ध किए समभागों कर्पटमूषामुखमध्य बिल में भरकर अक्षत व्यासटिका में रख
कर उलूकिक भस्त्रमुख से धमन करे १०० डिग्री के वेग से गलाकर रस—पिंघले रस को वरयन्त्रमुख में
यदि सींच दे सुरूप चुम्बक मणि अत्यन्त विशुद्ध हो जाता है ॥ ४८-५०॥

१५२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
बिम्बाकर्षणनिर्यासनिर्णयः—बिम्बाकर्षणनिर्यास का निर्णय देते हैं—
षष्ट्युत्तरत्रिशतनिर्यासवर्गेषु शास्त्रतः ।
रूपाकर्षणनिर्हासं प्रतिबिम्बापकर्षणे ॥५१॥
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहुश्शास्त्रेषु ज्ञानवित्तमाः ।
रूपाकर्षणनिर्यासमतस्सम्पादयेत् सुधीः ॥५२॥
३६० निर्यास वर्गों में शास्त्र से रूपाकर्षण निर्यास प्रतिबिम्बापकर्षण में उच्च ज्ञानियों ने
शास्त्रों में अत्यन्त श्रेष्ठ कहा है, बुद्धिमान् रूपाकर्षणनिर्यास का सम्पादन करे ॥५१-५२॥
उक्तं हि निर्यासकल्पे—कहा ही निर्यासकल्प में—
ऐन्द्व क्रौञ्च वैणव क्षीरपञ्चकमेव च ।
चुम्बकं चोडुसारं च माधिमात्वग्विभावरिम् ॥५३॥
रयशोण्डं द्रोणसारं पारमम्बरमेव च ।
मुक्ताफल च वल्मीकसार सारस्वत नखम् ॥५४॥
षोडशैतान् पदार्थानत्यन्तशुद्धान् यथाविधि ।
समभागान् गृहीत्वाथ मयूराण्डरसे क्रमात् ॥५५॥
मासमेक मर्दयित्वा बिल्वतैले निवेशयेत् ।
निर्यासपाक(क्व?) यन्त्रेथ तद्घोल (गो?) स्थाप्य शास्त्रतः॥ ५६॥
पाचयेदग्निना सम्यक् पाकावधि यथाक्रमम् ।
यावन्निर्यासता याति तावद् यामचतुष्टयम् ॥५७॥
सम्पाच्य विधिवत् पश्चान्निर्यास संग्रहेच्छनै ।
रूपाकर्षणनिर्यासमिति चाहुर्मनीषिण ॥५८॥
बिम्बाकर्षणनिर्यासमित्याहु पण्डितोत्तमा ॥५९॥ इत्यादि ॥
ऐन्द्रव—चन्द्रकान्त, क्रौञ्च—लोहविशेष, वैणव—वंशलोचन या वेणुक्षार, क्षीरपञ्चक—बड़-
पीपल गूलर बेंत पिलखन का दूध, चुम्बक—अयस्कान्त, उडुसार ?, पारा, अभ्रक, मुक्ताफल—मोती या
कपूर, वल्मीक मिट्टी का सार, सारस्वत मालकंगनी का तैल, नख-नखद्रव्य । इन१६ पदार्थोंको अत्यन्त शुद्ध
यथाविधि समान भाग लेकर क्रम से मोर के अण्डे के रस में एक मास मर्दन करके बिल्वतैल में डालदे
गोन्द पकानेवाले यन्त्र में उस घोल को स्थापित करके शास्त्र से अग्नि से पकावे पाक अवधि तक जबतक
निर्यासता को प्राप्त होता है तब तक चारयाम विधिवत् पकाकर पश्चात् निर्यास धीरे से लेले इसे मनीषी
जन रूपाकर्षण निर्यास कहते हैं और ऊंचे पण्डित बिम्बाकर्षण निर्यास भी कहते हैं ॥५३-५८॥
पटदर्पणनिर्णयः—पटदर्पणनिर्णय देते हैं—
रूपाकर्षणनिर्हासाद् यतश्शास्त्रविधानतः ।
प्रतिबिम्बाकर्षणार्थं कुर्वन्ति पटदर्पणम् ॥६०॥
तस्माद् विचार्य शास्त्राणि पूर्वाचार्योक्तवर्त्मना ।
संग्रहेण प्रवक्ष्यामि निर्यासपटदर्पणम् ॥६१॥

गुहागर्भदर्शयन्त्र ] [ १५३
रूपाकर्षणनिर्यास-गोन्द जिससे शास्त्रविधानद्वारा प्रतिबिम्बाकर्षण के लिये पटदर्पण बनाते
हैं अतः शास्त्रों को पूर्वोक्त आचार्य के कहे मार्ग से विचार करके संग्रह से निर्यासपटदर्पण
कहूंगा ॥८०-६१॥
तदुक्तं दर्पण प्रकरण-वह कहा है दर्पणप्रकरण में-
निर्यासाकपासप्रतोलिकान् कुरङ्गमातङ्गवराटिकानपि ।
क्षोगीरक घोलिकचापशर्करान् परोटिकावाध्युं विकाप्रियङ्गवान् ॥६२॥
झञ्झोटिकभीरुकरुक्मकेसरनिर्यासमृत्क्षारसुवर्चलोरुधान् ।
विडारतैल मुचुकुन्दपिष्टक सिह्नाणुरक्षालिकदारुकार्मुकान् ॥ ६३ ॥
शताष्टपञ्चाशतिरष्टविंशतिर्वेदार्कबाणानलशैलत्रिंशति ।
दिक्तारवस्वर्कमुनित्रयोदशद्वाविंशतिस्सप्तदशाष्टविंशति ॥ ६४ ॥
गुणावताराब्धिमुनित्रयोदशक्रमेण भागाशविधानतस्सुधी ।
[L

१५४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
गुहागर्भादर्शयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ।
अथेदानीं प्रवक्ष्यामि तमोयन्त्रस्य निर्णयम् ॥ ६६ ॥
गुहागर्भादर्श यन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर अब तमोयन्त्र का निर्णय कहूँगा ॥ ६६ ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
रौहिणीविषसम्बद्ध (न्ध ?) चूर्णांधूमादिभिस्तथा ।
क्रकचारिमणेर्दीप्तप्रभाविषसमूलत ॥ ७० ॥
विमाननाशनार्थाय प्रयोगः क्रियते यदा ।
तदा तद्विनाशाय स्वयन्त्रत्राणाय च ॥ ७१ ॥
शत्रुयन्त्रं सुविज्ञाय शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
तमोयन्त्रं स्थापयेद् विमानवायव्यकेन्द्रके ॥ ७२ ॥ इत्यादि ॥
रौहिणी विषसम्बन्धी चूर्ण के धूप आदि से तथा क्रकचारि मणि ? (क्रकच – आरा के शत्रु-
रूपमणि) की प्रभा विषसमूल से विमाननाश के लिये जब प्रयोग किया जाता है तब उसके विनाश
के लिये अपने विमान के रक्षण के लिए शत्रु का रहस्य जान कर शास्त्रोक्त मार्ग से तमोयन्त्र—अन्धकार
फैलाने वाला यन्त्र विमान के वायव्य केन्द्र में स्थापित करे ॥ ७०-७२ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
विषधूमप्रकाशादिप्रयोगाच्छत्रुणा यदा ।
विनाशो व्योमयानस्य सम्भवेद् यदि तत्क्षणात् ॥ ७३ ॥
संस्थापयेत् तमोयन्त्रमतिवेगाद् विचक्षणः ।
यदि प्रमादं कुर्वीत स्वयानं नाशमेधते ॥ ७४ ॥
शत्रुओं का विषधूम प्रकाश आदि प्रयोग से जब विमान के विनाश की सम्भावना हो तो
तत्क्षण बुद्धिमान् वेग से तमोयन्त्र लगा वे, यदि प्रमाद किया तो अपना विमान नाश को प्राप्त हो
जाता है ॥ ७३-७४ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरशततमोयन्त्रेषु शास्त्रतः ।
द्वियष्टितमसंख्याकयन्त्र एव गरीयसी* ॥ ७५ ॥
विषधूमप्रकाशादिसंहारे सुप्रशस्तकः ।
इति प्रोच्यते (ति ?) सम्यग्यन्त्रशास्त्रविशारदैः (दे ?) ॥७६॥
१३२ तमोयन्त्रों में शास्त्र से ६२ वीं संख्या वाला यन्त्र श्रेष्ठ है क्योंकि विषधूम प्रकाश आदि
के संहार करने में ठीक यन्त्र शास्त्र के विद्वानों द्वारा अच्छा प्रशस्त कहा जाता है ॥ ७५-७६ ॥
―――❖―――

  • लिङ्गव्यत्ययः ।

हस्तलेख कापी संख्या ११-
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे-वह यह 'यन्त्रसर्वस्व' में कहा है-
कृष्णसीस चाञ्जनिक वज्रतुण्ड समांशत ।
संयोज्य मत्स्यमूषाया काकव्यासटिकान्तरे ॥ १ ॥
विन्यस्य शतकक्षोष्णवेगात् संगालयेत् तत ।
तद्रस यन्त्रमध्यास्ये निषिञ्चेद् विधिवच्छनै ॥ २ ॥
भवेत् तमोगर्भलोहस्सूक्ष्मश्शुद्धो लघुर्दृढ ।
एतल्लोहेनैव कार्यं तमोयन्त्र न चान्यथा ॥ ३ ॥
वितस्तित्रयमायाम वितस्त्यर्धोन्नति क्रमात् ।
चतुरस्रं वर्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ ४ ॥
तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कु तत्पुरोभागतस्तथा ।
निशाटद्रावकस्थान कल्पयित्वा तथैव हि ॥ ५ ॥
काला सीसा, सुरमा, वज्रतुण्ड-थूहर। ये तीनों समानरूप में मिलाकर मत्स्यमूषानामक बोतल
में डाल कर काकव्यासटिका नामक कुण्ड के अन्दर रख कर १०० दर्जे की उष्णता के वेग से
गलावे फिर उस पिघले रस को यन्त्रमध्य के मुख में धीरे से विधिवत् भर दे, वह तमोगर्भ लोह सूक्ष्म
शुद्ध लघु दृढ हो जावे । इस लोहे से ही तमोयन्त्र करना चाहिये अन्यथा नहीं । ३ बालिश्त लम्बा आधा
बालिश्त ऊंचाई चौकोण या गोल पीठ यथाविधि करे, उसके मध्य में तथा सामने शंकु स्थापित करे ।
निशाटद्रावक-गूगल के द्रावक का स्थान बना कर तथा--॥ १-५ ॥
तमो*द्रेकादर्शक केन्द्रस्थान तत्पश्चिमे क्रमात् ।
रश्म्याकर्षणनालस्य स्थान प्राच्या प्रकल्पयेत् ॥ ६ ॥
तदूर्ध्वं नालसन्धिस्थान प्रकल्प्य तत परम् ।
तन्त्रीसन्धानचक्रस्य स्थान मध्यकेन्द्रके ॥ ७ ॥
कीलोचालनचक्रस्य स्थान तद्दक्षिणे न्यसेत् ।
एव यन्त्रस्य रचनाक्रममुक्त्वा समासतः ॥ ८ ॥

  • तम उद्रेकात्-तमोद्रेक इति सन्धिराषं ।

१५६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तत्प्रयोगक्रमं वक्ष्ये सङ्ग्रहेण यथामति ।
आदौ सञ्चालयेत् कीलीं चक्राग्नेयस्थितां क्रमात् ।।६।।
तेन नालस्थद्विमुखीदर्पणाभ्रामणं भवेत् ।
किरणाकर्षणं भानोर्भवेन्नालस्थदर्पणात् ।। १० ।।
अन्धकार को उभारने वाला आदर्श का केन्द्रस्थान उसके पश्चिम, किरणाकर्षणनाल का स्थान
पूर्व में बनावे उनके ऊपर की नाल का सन्धिस्थान बना कर फिर तन्त्रोसन्धान चक्र—तार जिसमें लगे
ऐसे चक्र का स्थान मध्यकेन्द्र में, कीली - पेंचों को चलाने वाले चक्र का स्थान उसके दक्षिण में रखे ।
इस प्रकार यन्त्र का रचनाक्रम संक्षेप से यथामति कह कर उसका प्रयोग क्रम कहूंगा, आग्नेय चक्र में
स्थित कील को चलावे उससे नाल में स्थित दो मुखवाले दर्पण का घुमाना हो जावे उस नालस्थ दर्पण से
सूर्यकिरणों का आकर्षण हो जावे - हो जावेगा ।। ६-१० ।।
पश्चाद् वायव्यकेन्द्रस्थकीलीं सञ्चालयेद् दृढम् ।
निशाद्रवपात्रस्थस्थापनं तस्माद् भवेत् स्वतः ।। ११ ।।
ऐशान्यकेन्द्रस्थकीलीं चालयेदिति सूक्ष्मतः ।
तेजोपकर्षणमणिस्तन्त्रीमुखात् स्वयम् ।। १२ ।।
निशाद्रवपात्रस्य मध्ये संस्थापितं भवेत् ।
तथा पश्चिमकेन्द्रस्थकीलसीञ्चालनाद् दृढम् ।। १३ ।।
स्वस्थाने स्थाप्यते सम्यक् तमोद्रेकाख्यदर्पणं ।
मध्यकीलीचालनेन नालमध्यस्थदर्पणात् ।। १४ ।।
आकृष्टासूर्यकिरणाः मणिमावृत्य वेगतः ।
स्थास्यन्ति मणिसंयोगात्सम्यक् चलनवर्जिताः ।। १५ ।।
पश्चात् वायव्य केन्द्रस्थ कीली को चलावे, गूग़लद्रवपात्रस्थ में स्थापन स्वत हो जावे, ईशान
केन्द्रस्थ कीली को अतिसूक्ष्मरूप से चलावे तो तेज को खींचने वाली मणि तन्त्रीमुख से स्वयं गूगल द्रव-
पात्र के मध्य में स्थापित हो जावे तथा पश्चिम केन्द्रस्थ कीली के सम्यक् चलाने से स्वस्थान में अन्धकार
को उभारने वाला दर्पण स्थापित किया जाता है, मध्यकील चलाने से नाल के मध्यस्थ दर्पण से सूर्य-
किरण आकृष्ट हुई हुई वेग से मणि को घेर कर मणि संयोग सम्यक् चलनरहित ठहर जावेंगी ।।११--१५।।
भ्रामयेदतिवेगेन मूलकीलकमत् परम् ।
ततोत्यन्ततमोद्रेकः प्रभवेन्नात्र संशयः ।। १६ ।।
तेनादृश्यं भवेत् व्योमयानं पश्चात् स्ववेगतः ।
विषधूमप्रकाशादीन् निश्शेषं नाशयेत् क्रमात् ।। १७ ।।
ततस्तद्दर्शनादेव शत्रूणां बुद्धिविप्लवः ।
भवेन्मेघोविनाशं च तत्क्षणान्नात्र संशयः ।। १८ ।।

पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र ] [ १५७
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तमोयन्त्रं यथाविधि ।
विमानवायव्यकेन्द्रे स्थापयेत् सुदृढं यथा ॥ १६ ॥ इत्यादि ॥
फिर अतिवेग से मूलकील को घुमावे तो अत्यन्तवेग से निस्संशय अन्धकार का उत्थान हो
जावे । उससे विमान अदृश्य हो जावे फिर अपने वेग से विषधूम प्रकाश आदि को क्रम से सर्वथा नष्ट
करदे । फिर उसके दर्शन से ही शत्रुओं की बुद्धि का विचलन हो जावे और धारणाशक्ति का नाश तुरन्त
हो जावे इसमें कुछ भी संशय नहीं । अतः सर्वप्रयत्न से यथाविधि तमोयन्त्र को विमान के वायव्य केन्द्र
में सुदृढ़ स्थापित करे ॥१६—१६॥
अथ पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र - अथ पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र कहते हैं—
एवमुक्त्वा तमोयन्त्रं सङ्ग्रहेण यथामति ।
पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्रमथ प्रचक्षते ॥२०॥
वृष्ण्यादिवातावरणमण्डलानि त्रयोदश ।
पक्तिराधसकेन्द्रस्थशक्तिसम्पर्कतं क्रमात् ॥२१॥
परस्परं स्वभावेन संलग्नानि भवन्ति हि ।
तस्मान्मण्डलमध्यस्थवातयोरुभयोरपि ॥२२॥
परस्परं भवेद् युद्धं घर्षणाद्यैर्विशेषतः ।
तस्मात् तत्र प्रजायन्तेत्यन्तघोरविषात्मका ॥२३॥
शक्तय पञ्चातिवेगात् शोषिणका (शोधिएका?) द्यास्स्वभावत ।
तत्सम्पर्काद् व्योमयानविनाशो भवति क्रमात् ॥२४॥
तद्विज्ञायातिशीघ्रेण यानपश्चिमकेन्द्रके ।
पञ्चवातस्कन्धयन्त्रं सस्थापयेत् सुधी ॥२५॥
तस्माच्छो(रो?)ष्यादय पञ्च शक्तयस्तत्क्षणात् स्वतः ।
विनाशं यान्स्यत खेटयानसंरक्षणं भवेत् ॥२६॥ इति खेटविलास ॥
इस प्रकार तमोयन्त्र सङ्क्षेप से यथामति कहकर अथ पञ्चवातस्कन्ध नाल यन्त्र कहते हैं ।
वृष्णि आदि १३ वातावरण मण्डल हैं पंक्तिराधस ?-पंक्तियों के साधककेन्द्र में स्थित शक्ति के सम्पर्क
से क्रम से परस्पर स्वभाव से वे वातावरण मण्डल मिले हुए होते हैं अत मण्डल मध्यस्थ दोनों वायुओं
में भी घर्षण आदि से विशेष परस्पर युद्ध हो जावे अत' वहां घोर विषरूप पांच शोषिएक आदि
शक्तियां स्वभाव से प्रकट होजाती है उनके सम्पर्क से विमान का क्रम से नाश हो जाता है उसे जानकर
अति शीघ्र यान के पश्चिम केन्द्र में पञ्चवात स्कन्ध यन्त्र बुद्धिमान् स्थापित करे अतः शोषिण आदि
पांच शक्तियां तुरन्त स्वतः नाश को प्राप्त हो जाती हैं इससे खेटयान—विमान का संरक्षण हो जाता है ।
यह खेटविलास में कहा है—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्रस्य रचनाक्रमम् ।
यानसंरक्षणार्थाय कथ्यतेस्मान् यथाविधि ॥२७॥

"?
Look at the characters in L9:
च्छ-तो-ष्णै-क-द्व्य-ती-त-प्र-मा-णात्
Wait, look at the letters:
च्छ (ccha)
तो (to)
ष्ण (ṣṇa) with what? It has a virama? No, ष्ण with 'द्व'?
Wait! Could it be:
"क्रमाच्छतोष्णैकद्व्यतीतप्रमाणात्" -> wait, does it have 11 syllables?
च्छ-तो-ष्णै-क-द्व्य-ती-त-प्र-मा-णात्:

  1. छतो (2)
  2. ष्णैक (2)
  3. द्व्यतीत (3)
  4. प्रमाणात् (3)
    Total = 2 + 2 + 3 + 3 = 10 syllables. If "शतोष्णैकद्व्यतीतप्रमाणात्":
    श (1) तो (2) ष्णै (3) क (4) द्व्य (5) ती (6) त (7) प्र (8) मा (9) णात् (10).
    Wait, what if the letter after क is NOT द्व्य?
    Look at the image of L9 very carefully:
    क्रमाच्छतोष्णैकद्व्यतीतप्रमाणात् ।
    Let's look at the letters between ष्ण and प्र:
  5. क
  6. द्व्य
  7. ती
  8. त
    Wait, is it "कद्व

रौद्रीदर्पणयन्त्र ] [ १५६
५ नालों को संस्थापित करके पूर्वोक्त विषवायुओं के केन्द्र के सम्मुख गोल शुद्ध कील सहित दृढ़ भस्त्राओं भस्त्रामुखवाले को-॥३१-३७॥
नालानामेकैकमूले एकैकं सुदृढं यथा ।
धावर्तकीलकं सम्यक् स्थिरीकुर्याद् यथाविधि ॥३८॥
पश्चादेकं कभस्त्रास्यकीलकानतिवेगतः ।
चालयेदनुलोमेन यथाशास्त्रं पृथक् पृथक् ॥३९॥
भवेत् तस्मात् पञ्चविषशक्तीनामपकर्षणम् ।
भस्त्रिकास्ये पञ्चनालमुखेष्वत्यन्तवेगत ॥४०॥
प्रविश्याथ बहिर्यान्ति पञ्चधा विषशक्तय ।
पश्चाद् विनाशमायान्ति शो(रौ?)ष्णिकाद्यास्स्वत ॥४१॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यन्त्रमेतद् यथाविधि ।
विमाने स्थापयेत् सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय ॥४२॥ इत्यादि ॥
नालों में से एक एक नाल को एक एक मूल में घूमनेवाली कीलों के साथ स्थिर करे, पश्चात् एक एक भस्त्रास्य की कीलों को अतिवेग से सीधे यथाशास्त्र पृथक् पृथक् चलावे तो उससे पाँच विष-
शक्तियों का खींचना हो जावे, पांच विषशक्तियां भस्त्रिकास्यों से अत्यन्त वेग से पञ्चनालमुखों में प्रविष्ट होकर बाहिर चली जाती हैं। फिर शौष्णिक आदि विनाश को स्वतः प्राप्त हो जाती हैं अतः
समस्त प्रयत्न से इस यन्त्र को विमान में सम्यक् संस्थापित करें यह शास्त्र का निर्णय है ॥३८-४२॥
अथ रौद्रीदर्पणयन्त्रनिर्णय —अब रौद्रीदर्पण यन्त्र का निर्णय देते हैं—
एवमुक्त्वा पञ्चवातस्कन्धनालमतं परम् ।
रौद्रोदर्पणयन्त्रस्वरूपमथ निरूप्यते ॥ ४३ ॥
इस प्रकार पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र को कहकर इस से आगे रौद्रीदर्पण यन्त्र का स्वरूप अब निरूपित किया जाता है ॥४३॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
ईषादण्डस्य नैऋत्यकेन्द्रमार्गो विशेषत ।
ये सूर्यकिरणास्सम्यक् प्रसरन्ति विशेषत ॥ ४४ ॥
ते सर्वे ऋतुभेदेन शक्त्यावर्ते पतन्ति हि ।
तत्तत्यशक्तिसंयोगात् किरणेषु विशेषत ॥ ४५ ॥
आविर्भवन्ति वेगेन ज्वालास्त(तृ स?)वंविदाहका ।
तज्ज्वालासन्धिकेन्द्रेषु विमानस्सञ्चरेद् यदि ॥ ४६ ॥
तत्क्षणादेव तद्गोद् भस्मीभवति नान्यथा ।
अतस्तत्परिहाराय रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ॥ ४७ ॥

१६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यानस्याथ केन्द्रदेशे स्थापयेद् विधिवत् क्रमात् ।
तस्माद् विमानसंरक्षण भवेदिति निर्णयतम् ॥ ४८ ॥ इत्यादि ।
ईषादण्ड-पृथिवी और सूर्य की दृष्ट समान गति रेखा के निऋतिकोणवाले केन्द्र मागों से
बिशेषतः जो सूर्यकिरण सम्यक् प्रसार करती हैं वे सब ऋतु के भेद से शक्त्यावर्त-शक्ति के घुमेर में
गिरती हैं वहां के शक्तिसंयोग से किरणों में विशेषत. वेग से सर्वविदाहक ज्वालाएं प्रकट हो जाती हैं
उन ज्वालाओं के सन्धिकेन्द्रों में यदि विमान सञ्चार करे तो तुरन्त उनके वेग से भस्म हो जावे अत
उसके परिहार के लिये रौद्रीदर्पणयन्त्र विमान के नीचले केन्द्रदेश में विधिवत् स्थापित करे उस से
विमान का संरक्षण हो जावे यह निर्णय है ॥ ४४-४८ ॥
यन्त्रसर्वस्वेऽपि - यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है-
वसन्तग्रीष्मयोर्मध्यरेखाप्रान्तेषु भूरिश ।
आवृत्तशक्तिष्वंशूना प्रवेशो भवति यदा ॥ ४६ ॥
तदा सञ्जायते कोलाहलज्वालावती स्वत ।
आकाशपञ्चमकक्ष्ये विमानस्सञ्चरेद् यदि ॥ ५० ॥
तत्र कोलाहलज्वालावेगाद् भस्मीकृत भवेत् ।
तस्मात् तत्परिहाराय रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ॥ ५१ ॥
विमाने स्थापयेत् तस्मात् तत्स्वरूपं विविच्यते ।
यन्त्रकोलाहलज्वालाविनाशार्थं यथाविधि ॥ ५२ ॥
कुर्याद् रौद्रीदर्पणेनैवेति शास्त्रविनिर्णय ।
अन्यथा यदि कुर्वीत प्रमादस्स्यान्न संशय ॥ ५३ ॥
वसन्त और ग्रीष्म की मध्यरेखा के सिरों में अत्यधिक घूमती हुई शक्तियों में जब किरणों का
प्रवेश होता है तो कोलाहल-गूंजनेवाली ज्वालामाला स्वत प्रकट हो जाती है, आकाश के पांचवें स्तर
में विमान यदि सञ्चार कर रहा हो तो वहां कोलाहल ज्वाला के वेग से भस्म हो जावे अत उसके परि-
हार के लिये रौद्रीदर्पण यन्त्र विमान में स्थापित करे अत उसके स्वरूप का विवेचन करते हैं। कोलाहल
ज्वालाके विनाशार्थ यथाविधि यन्त्र रौद्रीदर्पण से ही करे ऐसा शास्त्र का निर्णय है अन्यथा करे तो हानि
हो इसमें संशय नहीं ॥ ४६-५३ ॥
लोहासव चुम्बकवीरटङ्कणान् पञ्चानन शून्यमयूरसज्जकान् ।
माध्वीकचञ्चुमुखसूर्यवर्चुलान् रुक्मालिकाशार्करपञ्चपादुकांन् ॥ ५४ ॥
एतान् त्रिसंशोधितशुद्धवस्तून संगृह्य सन्तोल्य समाशत क्रमात् ।
पद्मास्यमूषामुखमध्यरन्ध्रे सम्पूर्य विश्वोदरकुण्डमध्ये ॥ ५५ ॥
संस्थाप्य पश्चाद् विंशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो भस्त्रामुखाद् यथाविधि ।
सगाल्य नेत्रान्तमत पर शनैस्सङ्गृह्य तद्यन्त्रमुखान्तराले ॥ ५६ ॥

रौद्रीदर्पणयन्त्र ] [ १६१
सम्पूरित चेत् सुदृढ सुसूक्ष्म वृष्ण विशुद्ध ज्वलान्तक लघु ।
अन्तःप्रकाश विमल मनोहर भवेद् रौद्रीदर्पणमद्भुत हि ॥ ५७ ॥
लोहास्त्र-लोहद्राव या लोहे का मार, चुम्बक, वोर-लोहा, सुहागा, पञ्चाननलोहा, शून्य-अभ्रक,
मयूरसञ्जक ?, माक्षीक-मधुद्राव, चञ्चू-चञ्चु-रक्तएरण्ड, मुख-वडइल, सौञ्चल नमक, रुक्म-स्वर्ण
या लोहा, अलिक-भ्रमर ?, शार्क-लोध, पद्म-कड़वा परवल, पादुक ? । तीन बार शोधी हुई इन
वस्तुओं को लेकर समान तोलकर पद्मास्य बोतल के मुखमध्यछिद्र में भरकर विश्वोदर कुण्ड के मध्य में
रख कर पश्चात् २० या १२० दर्जे माप की भस्त्रामुख से यथाविधि नेत्रपर्यन्त गलाकर धीरे से लेकर
उस यन्त्रमुख के अन्दर यदि भर दे तो सुदृढ अति सूक्ष्म वृष्ण विशुद्ध ज्वलनान्तक हल्का अन्दर प्रकाश
मान विमल मनोहर अद्भुत रौद्रीदर्पण हो जावे ॥ ५४-५७ ॥
एतद्रौद्रीदर्पणेन सुसूक्ष्मेण यथाविधि ।
वितस्तिषोडशायाम पीठ कुर्यात् सुवर्तुलम् ॥ ५८ ॥
यावद्वानप्रमाणस्यात् तावन्मात्र यथाविधि ।
पञ्चविंशत्यङ्गुलप्रमाणगात्र दृढ लघु ॥ ५९ ॥
कृत्वा दण्ड पीठमध्यकेन्द्रे संस्थापयेद् दृढम् ।
सङ्कोचनप्रसारणकीलकद्वयमद्भुतम् ॥ ६० ॥
अनुलोमविलोमाभ्या दण्डाग्रे स्थापयेत् क्रमात् ।
तदधश्शलाकावरणचक्र सन्धारयेत् क्रमात् ॥ ६१ ॥
यथा यानस्यावरक समग्र स्यात् तथैव हि ।
शलाकाद्वयमध्ये पञ्चाशदङ्गु लमन्तरम् ॥ ६२ ॥
कृत्वा शलाकान् परितश्चक्रे सन्धारयेत् क्रमात् ।
अकसीद्रोणसौरम्भभण्टिकातैलसंस्कृतम् ॥ ६३ ॥
इस अति सूक्ष्म रौद्रीदर्पण से यथाविधि १६ बालिश्त लम्बा गोल पीठ विमान के प्रमाणा-
नुसार बनावे, २५ अङ्गुल मोटा बनाकर दण्ड को पीठ के मध्य केन्द्र में संस्थापित करे, फिर सङ्कोचन
और प्रसारण के साधनभूत दो पेंचों को सीधे और उलटे ढंग से दण्ड के अग्रभाग पर लगावे । उसके
नीचे शलाकाओं को घेरने ढकने वाला चक्र लगावे जिस से समग्र विमान का आवरक-ढकने वाला हो
जावे । दो शलाकाओं के मध्य में १५ अङ्गुल का अन्तर दे कर शलाकाओं को सब ओर चक्र में लगावे
"अकसी-अलसी द्रोण-हरिचन्दन या द्रोणपुष्पी ? सौरम्भ-सौरभ-राल या शिलारस ? भण्टिका-
मजीठ" इन के तैल से संस्कृत-शुद्ध शोभायमान बनाया हुआ-॥ ५८-६३ ॥
रौद्रीदर्पणसंसिद्धपत्रायण्य पृथक् पृथक् ।
शलाकोपरि सन्धार्य बध्नीयात् सूक्ष्मकीलकै ॥ ६४ ॥
रौद्रीदर्पणसंसिद्धमणीन् पञ्चमुखान् तथा ।
सन्धारयेत् तैलशुद्धान् शलाकाग्रे पृथक् पृथक् ॥६५॥

१६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
तथैव पद्मपत्राकारपत्राणि यथाक्रमम् ।
शलाकाद्वयमध्येष्टादश संख्याप्रकारतः । ॥ ६६ ॥
भ्रामणीकीलकैर्युक्तान्यथाशास्त्रं नियोजयेत् ।
छत्रीवद्वर्तुलाकारं कुर्याद् यन्त्रं सुशोभनम् ॥ ६७ ॥
तत्र पत्रण्यथ दण्डाग्रे बध्नीयात् कीलकाष्टकैः ।
विमानाभिमुखं यावज्ज्वालाशक्तिर्भवेत् स्वतः ॥ ६८ ॥
तद्विज्ञायादर्शयन्त्रसामग्र्याद्यैर्विचक्षणः ।
तावत् प्रसारणीकीलं भ्रामयेदतिशीघ्रतः ॥ ६९ ॥
छत्रीवत् प्रभवेत् तेन यानस्यावरकं क्रमात् ।
आमुलाग्रं स्वभावेन यु(या ?)गपत्सर्वतोमुखम् ॥ ७० ॥
रौद्रीदर्पण से सिद्ध यन्त्र पृथक् पृथक् शलाकाओं के ऊपर लगा कर सूक्ष्म कीलों से बांध दे,
रौद्रीदर्पण से सिद्ध किये तैल से शुद्ध पद्ममुख मणियों को शलाका के अग्रभाग में पृथक् पृथक् लगावे,
तथा पद्माकार पत्रों को यथाक्रम दो शलाकाओं के मध्य में १८ संख्या की भ्रामणी कीलों से युक्त यथा-
शास्त्र लगावे, छत्री के समान गोलाकार सुन्दर यन्त्र बनावे वहां दण्ड के अग्रभाग में ८ कीलों से पत्रों को
बांधे जब तक विमान के सम्मुख ज्वालाशक्ति स्वतः होवे उसे आदर्शयन्त्र सामग्री आदि से बुद्धिमान्
जान कर-ज्ञान न ले तब तक प्रसारणी कील अति शीघ्र घुमावे, विमान का आवरक-आवरण करने-
वाला रक्षासाधन यन्त्र छत्री की भांति मूल से अग्र भाग तक स्वभाव से एक साथ-तुरन्त सर्वत्र फैल
जावे ॥ ६४-७० ॥
पद्मपत्रैश्च मणिभिस्तथावरणपत्रकैः ।
पूर्वोक्तशक्तिनिशेष तत्क्षणान्नाशमेधते ॥ ७१ ॥
पश्चात् सम्भ्रामयेत् सङ्कोचनकीलबिनिबन्धनम् ।
तेन सङ्कुचितं यानावरकं तत्क्षणाद् भवेत् ॥ ७२ ॥
सुरक्षितं भवेद् व्योमयानं पश्चात् स्वभावतः ।
तस्मादेतद्यन्त्रमत्र सङ्ग्रहेण निरूपितम् ॥ ७३ ॥ इत्यादि ॥
पद्मपत्रों मणियों और आवरणपत्रों से पूर्वोक्त शक्ति तुरन्त सर्वथा नाश को प्राप्त हो जाती है,
पश्चात् सङ्कोच कराने वाले पेंच के बन्धन को घुमावे उससे विमान का आवरक तुरन्त संकुचित हो जावे,
फिर विमान स्वभावतः सुरक्षित हो जावे अतः यह यन्त्र यहां संक्षेप से निरूपित किया है ॥ ७१-७३ ॥
अथ वातस्कन्धनालकीलकयन्त्रः-अथ वातस्कन्धनालकीलक यन्त्र कहते हैं-
एवमुक्त्वा सङ्ग्रहेण रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ।
अथेदानीं वातस्कन्धनालयन्त्रं विविच्यते ॥ ७४ ॥
इस प्रकार रौद्रीदर्पण यन्त्र संक्षेप से कह कर अब इस समय वातस्कन्धनाल यन्त्र का विवेचन
करते हैं ॥ ७४ ॥

वातस्कम्भनालकीलक्यन्त्र ] [ १६३
तदुक्तं गतिनिर्णयाध्याये – वह कहा है गतिनिर्णय के अध्याय में—
आवहादिमहावातमण्डलेषु स्वभावत ।
द्वाविशदुत्तरशतप्रभेदेन यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
पवमानगतिश्चित्रविचित्रत्वेन वर्णिता ।
तेष्वेकोनाशीतितमगतिर्वातायनाभिधा ॥ ७६ ॥
तद्गतिस्स्याद् विशेषेण वायौग्रीष्मऋतौ क्रमात् ।
चतुर्यकक्ष्यगगने यानसञ्चरते यदा ॥ ७७ ॥
तदा वातायनगतिवेगाद् बायोविशेषत ।
विमानस्य भवेद् वक्रगतिस्तस्मात् परस्परम् ॥ ७८ ॥
यन्त्रूणा प्रभवेत् कष्टमत्यन्तं सुदुस्सहं क्रमात् ।
अतस्तत्परिहाराय यानाथ. पार्श्वकेन्द्रके ॥ ७६ ॥
वातस्तम्भनालकीलकयन्त्र स्थापयेत् सुधी ।
तेनापायनिवृत्तिस्स्याद् यन्त्रृणा सुखद भवेत् ॥ ८० ॥ इत्यादि ॥
आवह आदि महावायुमण्डलों में स्वभावतः १२२ भेद से यथाक्रम वायुगति चित्रविचित्ररूप
से वर्णन की है, उन में ७६वीं गति वातायन नामक है, उस वायु की गतिविशेष करके ग्रीष्मऋतु में क्रम
से हो तो चतुर्थ कक्ष्यावाले गगनमण्डल में विमान सञ्चार करता है । तब वातायनगति वेगसे वायु का
विशेषत विमान को परस्पर वक्रगति हो जावे उस से चालक यात्रियों को अत्यन्त दुःसह कष्ट हो जावे,
अत उसके हटाने के लिये विमान के नीचे पार्श्वकेन्द्र में बुद्धिमान् जन वातस्तम्भनालकील यन्त्र स्थापित
करे उस से अनिष्ट की निवृत्ति तथा यात्रियों को सुखद हो ॥ ७५–८० ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
विमानवक्रगमनपरिहाराय केवलम् ।
वातस्कन्धनालकीलक यन्त्रमथ प्रचक्षते ॥ ८१ ॥
वातस्तम्भनलोहेनैव तद्यन्त्र प्रकल्पयेत् ।
अन्यथा निष्फलमिति प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ८२ ॥
विमान के वक्रगमन के दूर करने को वातस्कन्धनालकीलयन्त्र अब कहते हैं । वातस्तम्भन लोहे
से ही उस यन्त्र को बनावे अन्यथा निष्फल है ऐसा मनीषी (Thinker) कहते हैं ॥ ८१–८२ ॥
तदुक्तं लोहतत्त्वप्रकरणे—वह कहा है लोहतत्त्व प्रकरण में—
विशावर सुवर्चल मयूरलोहपञ्चकम् ।
भ्रु०शुण्डिक सुरक्षिक वराहकान्तिलोहकम् ॥
विरोहिण कुबेरक मुरारिकान्घ्रि रञ्जजम् ।
सुहसनेत्रजः दल वरालिक मुनालिकम् ॥ ८३ ॥