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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 368 में से

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पृष्ठ 174

गुहागर्भदर्शयन्त्र ] [ १५१
पार वैणविकं चैव लम्बोदरमृत्कुण्डके ।
जटाग्रन्धि पार्वणिकं स्वर्णबीजं घटोद्गजम् ॥ ४३ ॥
सम्मेल्य विधिवच्छुद्धानेतान् तुल्यप्रमाणतः ।
द्रावकाकर्षणयन्त्रे द्रावकं तु समाहरेत् ॥ ४४ ॥
तद्द्रावकं हेमवर्णं सुशुद्धं सुप्रभं भवेत् ।
एतद् बिम्बाकर्षणादिप्रयोगेषु यथाविधि ॥ ४५ ॥
उपयुक्तं भवेत् तस्मात् पारगन्धिकद्रावकम् ।
सम्पादयेद् विशेषेण प्रतिबिम्बाकर्षणे ॥ ४६ ॥ इत्यादि ।
पारा, वंशलोचन या बांस का क्षार, लम्बेपेटवाले मिट्टी के कुण्ड में जटाग्रन्धि ?—जटामांसी
की ग्रन्थि, पार्वणिक वृक्ष, स्वर्णबीज—धतूरे के बीज, घटोद्गज ?—घटोत्कच—राक्षस—रोहेडा वृक्ष ?
विधिवत् शुद्ध इन को समान प्रमाण से द्रावक आकर्षणयन्त्र-द्रावक खींचनेवाले यन्त्र में मिलाकर द्रावक
को लेले वह द्रावक सुनहरा शुद्ध सुन्दर—प्रभावाला हो जावे, वह बिम्बाकर्षण आदि प्रयोगों में यथाविधि
उपयुक्त हो सके, अतः पारगन्धिक द्रावक विशेषरूप से प्रतिबिम्बाकर्षण के निमित्त सम्पादन करे—
बनावे ॥ ४३-४६ ॥
अथ चुम्बकमणिनिर्णय —अथ चुम्बकमणि का निर्णय देते हैं—
उक्तेषु मणिवर्गेषु प्रतिबिम्बाकर्षणे ।
शास्त्रज्ञैश्चुम्बकमणिःश्रेष्ठमित्युच्यते क्रमात् ॥४७॥
उक्त मणि वर्गों में प्रतिबिम्बाकर्षण के निमित्त शास्त्रज्ञविद्वानों द्वारा चुम्बक मणि श्रेष्ठ
कही है ॥४७॥
तदुक्तं मणिदीपिकायाम्—वह कहा है मणिदीपिका में—
चुम्बकश्शर्करादन्त्य शौण्डिकपारदपार्वणशुल्वम् ।
रञ्जकमाक्षिकगृधिकसौरि महिषखुर तद्विश्वकपालम् ॥४८॥
विधिवच्छुद्धीकृतसमभागान् कर्पटमूषामुखमध्यविले ।
सम्पूर्याक्षतव्यासटिकाया सस्थाप्योलूकिकभस्त्रमुखात् ॥४९॥
धमयेत् कथ्यशतोष्णिकवेगात् सङ्गाल्य रस वरयन्त्रमुखे ।
संसिच्चेद् यदि भवति सुरूप चुम्बकमणिरत्यन्तविशुद्धम् ॥५०॥ इत्यादि ॥
चुम्बक-कान्तलोह, शर्कर-रेत, टङ्कण-सुहागा, दन्त्य-हाथीदान्त का चूर्ण, शौण्डिक-पिप्पली ?
या लोहविशेष ?, पारा, पार्वण—पर्वणि—पर्ववाले वृक्ष का क्षार, शुल्व—ताम्बा, रञ्जक—हिङ्गुल—
शिंगरफ, सोनामाखी, गृधिक ?, सौरि—आदित्यभक्ता—हुलहुल, या भल्लातक ?, भैंस का खुर,
विश्वकपाल ? विधिवत् शुद्ध किए समभागों कर्पटमूषामुखमध्य बिल में भरकर अक्षत व्यासटिका में रख
कर उलूकिक भस्त्रमुख से धमन करे १०० डिग्री के वेग से गलाकर रस—पिंघले रस को वरयन्त्रमुख में
यदि सींच दे सुरूप चुम्बक मणि अत्यन्त विशुद्ध हो जाता है ॥ ४८-५०॥