बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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रूपाकर्षणनिर्यास-गोन्द जिससे शास्त्रविधानद्वारा प्रतिबिम्बाकर्षण के लिये पटदर्पण बनाते
हैं अतः शास्त्रों को पूर्वोक्त आचार्य के कहे मार्ग से विचार करके संग्रह से निर्यासपटदर्पण
कहूंगा ॥८०-६१॥
तदुक्तं दर्पण प्रकरण-वह कहा है दर्पणप्रकरण में-
निर्यासाकपासप्रतोलिकान् कुरङ्गमातङ्गवराटिकानपि ।
क्षोगीरक घोलिकचापशर्करान् परोटिकावाध्युं विकाप्रियङ्गवान् ॥६२॥
झञ्झोटिकभीरुकरुक्मकेसरनिर्यासमृत्क्षारसुवर्चलोरुधान् ।
विडारतैल मुचुकुन्दपिष्टक सिह्नाणुरक्षालिकदारुकार्मुकान् ॥ ६३ ॥
शताष्टपञ्चाशतिरष्टविंशतिर्वेदार्कबाणानलशैलत्रिंशति ।
दिक्तारवस्वर्कमुनित्रयोदशद्वाविंशतिस्सप्तदशाष्टविंशति ॥ ६४ ॥
गुणावताराब्धिमुनित्रयोदशक्रमेण भागाशविधानतस्सुधी ।
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