बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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बिम्बाकर्षणनिर्यासनिर्णयः—बिम्बाकर्षणनिर्यास का निर्णय देते हैं—
षष्ट्युत्तरत्रिशतनिर्यासवर्गेषु शास्त्रतः ।
रूपाकर्षणनिर्हासं प्रतिबिम्बापकर्षणे ॥५१॥
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहुश्शास्त्रेषु ज्ञानवित्तमाः ।
रूपाकर्षणनिर्यासमतस्सम्पादयेत् सुधीः ॥५२॥
३६० निर्यास वर्गों में शास्त्र से रूपाकर्षण निर्यास प्रतिबिम्बापकर्षण में उच्च ज्ञानियों ने
शास्त्रों में अत्यन्त श्रेष्ठ कहा है, बुद्धिमान् रूपाकर्षणनिर्यास का सम्पादन करे ॥५१-५२॥
उक्तं हि निर्यासकल्पे—कहा ही निर्यासकल्प में—
ऐन्द्व क्रौञ्च वैणव क्षीरपञ्चकमेव च ।
चुम्बकं चोडुसारं च माधिमात्वग्विभावरिम् ॥५३॥
रयशोण्डं द्रोणसारं पारमम्बरमेव च ।
मुक्ताफल च वल्मीकसार सारस्वत नखम् ॥५४॥
षोडशैतान् पदार्थानत्यन्तशुद्धान् यथाविधि ।
समभागान् गृहीत्वाथ मयूराण्डरसे क्रमात् ॥५५॥
मासमेक मर्दयित्वा बिल्वतैले निवेशयेत् ।
निर्यासपाक(क्व?) यन्त्रेथ तद्घोल (गो?) स्थाप्य शास्त्रतः॥ ५६॥
पाचयेदग्निना सम्यक् पाकावधि यथाक्रमम् ।
यावन्निर्यासता याति तावद् यामचतुष्टयम् ॥५७॥
सम्पाच्य विधिवत् पश्चान्निर्यास संग्रहेच्छनै ।
रूपाकर्षणनिर्यासमिति चाहुर्मनीषिण ॥५८॥
बिम्बाकर्षणनिर्यासमित्याहु पण्डितोत्तमा ॥५९॥ इत्यादि ॥
ऐन्द्रव—चन्द्रकान्त, क्रौञ्च—लोहविशेष, वैणव—वंशलोचन या वेणुक्षार, क्षीरपञ्चक—बड़-
पीपल गूलर बेंत पिलखन का दूध, चुम्बक—अयस्कान्त, उडुसार ?, पारा, अभ्रक, मुक्ताफल—मोती या
कपूर, वल्मीक मिट्टी का सार, सारस्वत मालकंगनी का तैल, नख-नखद्रव्य । इन१६ पदार्थोंको अत्यन्त शुद्ध
यथाविधि समान भाग लेकर क्रम से मोर के अण्डे के रस में एक मास मर्दन करके बिल्वतैल में डालदे
गोन्द पकानेवाले यन्त्र में उस घोल को स्थापित करके शास्त्र से अग्नि से पकावे पाक अवधि तक जबतक
निर्यासता को प्राप्त होता है तब तक चारयाम विधिवत् पकाकर पश्चात् निर्यास धीरे से लेले इसे मनीषी
जन रूपाकर्षण निर्यास कहते हैं और ऊंचे पण्डित बिम्बाकर्षण निर्यास भी कहते हैं ॥५३-५८॥
पटदर्पणनिर्णयः—पटदर्पणनिर्णय देते हैं—
रूपाकर्षणनिर्हासाद् यतश्शास्त्रविधानतः ।
प्रतिबिम्बाकर्षणार्थं कुर्वन्ति पटदर्पणम् ॥६०॥
तस्माद् विचार्य शास्त्राणि पूर्वाचार्योक्तवर्त्मना ।
संग्रहेण प्रवक्ष्यामि निर्यासपटदर्पणम् ॥६१॥