बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनालपञ्चकयन्त्र ] [ १४५
भरकर वेग से सौ दर्जे की उष्णता से गलावे ऐसा करने पर तैल के लेप से शुद्ध हुआ वातायनी लोह
अतिमृदुल सूक्ष्म लघु सुवर्णरंगवाला सुदृढ बन जाता है ॥ १५४-१५७॥
द्वादशाङ्गुलविस्तीर्णं द्वादशाङ्गुलमुन्नतम् ।
कुर्याद् वातायनीलोहात् पञ्चनालान् यथाविधि ॥१५८॥
एकैकधूमप्रमाण नालमूलेषु पञ्चसु ।
सन्धार्य व्योमयानस्य वामपार्श्वमुखे क्रमात् ॥१५६॥
संस्थापयेत् पञ्चनालान् पञ्चसन्धिषु शास्त्रतः ।
मुखानि पञ्चनालाना दिक्षु पूर्वादिषु क्रमात् ॥१६०॥
स्थापयेद् विधिवत् पश्चादूर्ध्वं तूर्ध्वमुख यथा ।
नालमूलस्थमणयः पश्चाद् धूम शनैश्शनैः ॥१६१॥
आकृष्य नालमूलस्थमुखच्छिद्रेषु योजयेत् ।
ततो वातायनीनालमुखेभ्यो वेगतः क्रमात् ॥१६२॥
निक्षेपं याति तद्धूमो बाह्ये विलयमेधते ।
तेन यानस्थयन्तॄणां धूमनाशात् सुखं भवेत् ॥१६३॥
तस्माद् विमाने तन्नालपञ्चक विधिवन्न्यसेत् । इत्यादि ॥
१२ अङ्गुल चौडे १२ अङ्गुल ऊंचे वातायनीलोह से पांच नालें बनावें । एक एक धूम के
प्रमाण में पांचों नालमूलों में लगाकर विमान के वामपार्श्व भाग में क्रम से पाच सन्धियों में शास्त्र से
पांच नालों को संस्थापित करे । पांचों नालों के मुख पूर्व आदि दिशाओं में क्रम से विधिवत् स्थापित
करे पश्चात् ऊपर में जैसे नालमूलस्थ मणियां ऊर्ध्वमुख—ऊपर की ओर धीरे धीरे धूंए को खींचकर नाल
मुख में स्थित मुख छिद्रों में जोड दे फिर वातायनी नालमुखों से धूंवा वाहिर वेग से सर्वथा लय
को प्राप्त हो जाता है । इस से धूमनाश से विमान में स्थित यात्रियों को सुख होता है अतः विमान में
वह ५ नाल विधिवत् लगावे ॥ १५८-१६३ ॥
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