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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

गुहागर्भादर्शयन्त्र ] [ १४७
चतुष्कोणादर्शमूलकेन्द्रशङ्कुमुलान्तरात् ॥६॥
यन्त्रपीठाग्नेयकेन्द्रशङ्कुमुलान्तरावधि ।
रविखर्परपञ्चास्यलोहमिश्रिततन्त्रिभि. ॥१०॥
सन्धारयेद् दृढ पश्चात् पारग्रन्थिकद्रावके ।
स्थापयेच्चुम्बकमणिं तन्त्रीमूलांश्च तन्मुखे ॥११॥
७२ वी संख्या वाले आदर्श को लेकर शास्त्रीति से त्रिकोण गोल चतुष्कोण आकार से यथा-
विधि तीन प्रकार करके [असिष्ठावृत्त ?—सूर्य—सूर्यावर्त वृत्त के काष्ठ से बने लम्ब कोश मै पूर्वोक्त
दर्पणों को सुदृढ़ लगाकर पञ्चधारा कृत्रिम लोहे से बने शंकुओं से बान्धकर पूर्वोक्त काष्ठयन्त्र मै नीचे
लगावे, गोल भाग नीचे करके लगावे, चतुष्कोण आदर्श-दर्पण ऊपर मुखवाला लगावे । त्रिकोण दर्पण
उसी प्रकार दोनों के पश्चिम की ओर पञ्चमुख कील के योग से यथाक्रम संस्थापित करे, चतुष्कोण
आदर्श मूलकेन्द्र के शंकु के मुख में से यन्त्रपीठ के आग्नेय केन्द्र के शंकुमूल तक । ताम्बा खपरिया
पञ्चास्य लोहों से मिले—बने तारों से लगावे पश्चात् पारग्रन्थिक द्रावक-पारागन्धक द्रावक मै चुम्बक-
मणि को और तारों के मूलों—सिरों को भी स्थापित करे ॥४-११॥
प्रसार्य विधिवत् तस्मात् तन्त्रीमन्यान् चतु ❀ क्रमात् ।
त्रिकोणादर्शमावृत्य ऊर्ध्वास्थ्यादर्शमध्यत ॥१२॥
अधोमुखादर्शमध्यकेन्द्रस्थाने दृढ यथा ।
सन्धार्य विधिवत् पश्चात् सूर्यांशून् पार्श्वत क्रमात् ॥१३॥
शक्तिपश्चिमदिग्भागान्नोदयेत् प्रमाणत ।
बिम्बाकर्षणनिर्यासलेपित पटदर्पणम् ॥१४॥
त्रिकोणाभिमुख (भवेद् ?) यथा तत्र नियोजयेत् ।
पूर्वोक्तसूर्यकिरणान् शक्त्या सह तत परम् ॥१५॥
अत अन्य चार तारों को विधिवत् फैलाकर त्रिकोण आदर्श को घेर कर ऊपर वाले आदर्श के
मध्य से नीचे वाले आदर्श के मध्य केन्द्रस्थान में विधिवत् दृढ लगाकर पश्चात् सूर्यकिरणों की पार्श्व—
शक्ति के पश्चिम दिशा की ओर से प्रमाण से प्रेरित करे, विम्ब—सूर्यविम्ब को आकर्षित करने वाले
निर्यास-गोन्द से लेपे हुए पटदर्पण-वस्त्ररूप दर्पण को त्रिकोण आदर्श के सम्मुख नियुक्त करे, फिर
पूर्वोक्त सूर्यकिरणों को शक्ति के साथ—॥१२-१५॥
द्रावकस्य मणौ सम्यग्योजयेत् सर्वतोमुखम् ।
अधोमुखे ततश्शुद्धे वर्तुलाकारदर्पणे ॥१६॥
मणिस्यानात् समाहृत्य तदशून् शक्तिमिश्रितान् ।
प्रसार्य सप्रमाणेण पश्चात् तन्मुखकेन्द्रत ॥१७॥
यानसञ्चारमार्गाधस्थितभूम्यां प्रयोजयेत् ।
पश्चात् तत्किरणास्तम्यक्श्वतधा सह स्ववेगतः ॥१८॥
❀ भविभक्तिकनिर्देश आर्षः ।