बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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१४४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शङ्कुकीले बनावें उसे शीतरञ्जिकादर्शीतारों से लपेटकर मौञ्जिकापटकोश-मूञ्ज के टाट के थैले से पृष्ठ
भाग को ढक दे ॥ १४३-१४७ ॥
बाहुमात्रोर्ध्वतत्सूर्यकिरणाभिमुखं यथा ।
विद्युत्तन्त्रीसमायुक्तशङ्कुकीलद्वयादथ ॥ १४८ ॥
विमानदक्षिणकेन्द्रशलाकोर्ध्वमुखे दृढम् ।
स्थापयेत् पिञ्जुलादर्शं किरणाकर्षणोन्मुखम् ॥१४९॥
तेन मेघोभिवृद्धिश्च प्राणात्राणमेव च ।
आतपाशनिवेगापकर्षणाद्यानयन्तृणाम् ॥१५०॥
भवेत् स्वभावत पश्चात् तापशीतलता व्रजेत् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन व्योमयाने यथाविधि ॥१५१॥
स्थापयेत् पिञ्जुलादर्शं यन्तॄणां प्राणदायकम् ॥१५२॥ इत्यादि ॥
सूर्यकिरण के सामने विद्युत के दो तारों से युक्त बाहुमात्र ऊँचे दो शङ्कुकी