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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१५० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
प्रतिबिम्बाकर्षणादिशक्तयः पञ्च सर्वदा ।
यतोञ्जिष्ठावृक्षगर्भे प्रकाश्यन्ते स्वभावतः ॥ ३६ ॥
ततस्सर्वेषु वृक्षेषु एतदञ्जिष्ठमेव हि ।
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहुरेतद्यन्त्रक्रियाविधौ ॥ ३७ ॥
इत्यादि-अगस्तत्वलहर्याम् ॥
प्रतिबिम्बाकर्षण आदि शक्तियां ५ सर्वदा जिस से अञ्जिष्ठ वर्ग में प्रसिद्ध हैं स्वभावतः । सब
वृक्षों में यह अञ्जिष्ठ ही को यन्त्रक्रियाविधि में अत्यन्त श्रेष्ठ कहते हैं । इत्यादि-अगस्तत्व लहरी मैं
कहा है ॥ ३६-३७ ॥
अथ पञ्चधारालोहनिर्णयः- अब पञ्चधारालोह का निर्णय करते हैं-
शङ्कवो बहवस्सन्ति नानायन्त्रक्रियाविधौ ।
पञ्च धारालोहकृतशङ्कवस्तेषु शास्त्रतः ॥ ३८ ॥
गुहागर्भदर्शयन्त्रदर्पणादिनिबन्धने ।
सुप्रशस्ता इति प्रोक्ता यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥ ३९ ॥
शङ्कु बहुत हैं नानायन्त्रक्रियाविधि में, पञ्चधारालोहे के बने शङ्कु उन में शास्त्र से प्रशस्त
कहे हैं ॥ ३८-३९ ॥
तदुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे-वह कहा है लोहतत्त्वप्रकरण में-
द्विवङ्गामाक्षिकिशुल्वकेन्द्ररुकान् शोधितान् । शास्त्रतस्सङ्गृह्याथ मृगेन्द्र-
मूषमुखतस्सम्पूर्थ्य मण्डोदरे । चञ्चूभस्त्रामुखाद् धमेत् त्रिशतकक्ष्योष्णप्रवेगात् ।
क्रमात् सञ्चाल्यापि च तद्रस समदल कृत्वा न्यसेद् यन्त्रके ॥ ४० ॥
धारापञ्चकसंयुक्त सुरुचिर भास्वत्स्वरूप दृढ लोहम् ।
भारयुत वदन्ति मुनयस्त पञ्चधाराभिधम् ॥ ४१ ॥
द्विवङ्क-लोहाविशेष, या जस्ता ? सोनामाखि, शुल्व-ताम्बा, इन्द्र-स्थावर विष-वज्र, रुरुक-लोहविशेष
या हरिण का सींग ?, शास्त्र से शोधे हुओं को लेकर मृगेन्द्रमूषामुख से मण्डोदर में भरकर चञ्चू—चूच-
भस्त्रामुख से ३०० दर्जे की उष्णता के वेग से धोंके क्रम से गलाकर उस पिंघले रस को बराबर करके
यन्त्र में रख दे । धारापञ्चकलोह से युक्त सुरुचिर चमकस्वरूपवाला दृढ भारवान् पञ्चकधारा नाम का
लोहा मुनि कहते हैं ॥ ४०-४१ ॥
अथ पारमन्थिकद्रावकनिर्णयः- अब पारमन्थिक द्रावक का निर्णय देते हैं-
मणिसंस्थापनार्थाय तन्त्रीमूलसमाकुलम् ।
कथ्यते सग्रहादत्र पारग्रन्थिकद्रावकम् ॥ ४२ ॥
मणि के संस्थापनार्थ तन्त्रीमूल से युक्त संक्षेप से पारमन्थिक द्रावक कहा जाता है ॥ ४२ ॥