सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171

१४८ ]
[ शुद्ध विद्याप्रकाश
प्रविश्य भूमुखं तत्र सर्वत्र स्थापितं क्रमात् ।
महागोलाग्निगर्भादियन्त्रान् व्याप्याथ शक्तितः ॥१९॥
सम्यगावृत्य साङ्गानि तत्स्वरूपाण्यस्फुटम् ।
पूर्वोक्तद्रवमध्यस्थमणावूर्ध्वमुखं यथा ॥२०॥
द्रावक में स्थित मणि में सब ओर सम्यक् लगावे फिर नीचे की ओर शुद्ध गोलाकार दर्पण में
मणिस्थान से शक्तिमिश्रित उन किरणों को लेकर सप्रमाण फैलाकर पश्चात् उनके मुखकेन्द्र से विमान
के गतिमार्ग के नीचे स्थित भूमि में प्रेरित करे पश्चात् वे किरणें भली प्रकार शक्ति के साथ अपूर्व वेग
से भूमि के मुख में प्रविष्ट होकर वहां सर्वत्र स्थापित महागोल अग्निगर्भ आदि यन्त्रों को व्याप कर शक्ति
से भली प्रकार घेरकर अंगोंसहित उनके स्वरूपों को स्फुटरूप में पूर्वोक्त द्रवमध्यस्थ मणि में ऊर्ध्वमुख
जिस प्रकार हो ऐसे-॥१९-२०॥
आदर्श मुखवतेषा प्रतिबिम्बं प्रकुर्वति ।
त्रिकोणादर्शामिमुखमध्यतन्त्रग्रसस्थिते ॥२१॥
बि