सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 169

हस्तलेख कापी संख्या १०—
गुहागर्भादर्शयन्त्रनिर्णयः—गुहागर्भादर्शयन्त्र का निर्णय करते हैं—
नालपञ्चकमुक्त्वैव सङ्ग्रहेण यथाविधि ।
गुहागर्भादर्शयन्त्रमिदानी सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार संक्षेप से नालपञ्चक कहकर अब गुहागर्भादर्शयन्त्र कहते हैं ॥१॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
विमानखण्डनार्थाय शत्रुभिर्भुमुखान्तरे ।
महागोलाग्निगर्भादियन्त्रपञ्चकमद्भुतम् ॥२॥
यत्र यत्र रहस्येन स्थापित सर्वतोमुखम् ।
तत्स्वरूपपरिज्ञानसिद्धयर्थं शास्त्रत क्रमात् ॥३॥
गुहागर्भादर्शयन्त्रं स्थापयेद् व्योमयानके ।
विमान के तोड़ने के अर्थ शत्रुओंद्वारा भूमि के मुख के अन्दर महागोल अग्निगर्भ आदि
अद्भुत पञ्चकयन्त्र जहां जहां गुप्तरूप से सब ओर मुख वाला स्थापित किया है, उसके स्वरूप परि-
ज्ञान की सिद्धि के अर्थ शास्त्र से क्रम से विमान में गुहागर्भादर्श स्थापित करे ॥२—३॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
द्वासप्ततिमसंख्याकादर्शमाहृत्य शास्त्रतः ॥४॥
त्रिकोणवर्तुलचतुष्कोणाकारंयथाविधि ।
त्रिधा कृत्वा ततोञ्जिष्ठवृक्षकाष्ठविनिर्मिते ॥५॥
नीडे सन्धार्य पूर्वोक्तदर्पणान् सुदृढ यथा ।
पञ्चधारालोहकृतशङ्कुभिस्सुदृढै क्रमात् ॥६॥
बन्धयित्वाथ पूर्वोक्तकाष्ठयन्त्रे नियोजयेत् ।
अधोमुखं वर्तुलादर्शमधस्तात् प्रकल्पयेत् ॥७॥
चतुष्कोणादर्शमूर्ध्वास्यं यथा सन्नियोजयेत् ।
त्रिकोणदर्पणं (तु) तद्द्वयो पश्चिमान्तरे ॥८॥
संस्थापयेत् पञ्चमुलकीलीयोगाद् यथाक्रमम् ।